रंग महोत्सव से दूर होते दर्शक
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Feb 2020 9:03 AM (IST)
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अमितेश, रंगकर्म समीक्षक रतन थियम निर्देशित और लिखित प्रस्तुति ‘लाइरेम्गीबी एशी’(अप्सराओं के गीत) से इक्कीसवें भारत रंग महोत्सव का समापन हुआ. रतन थियम ने इस तथ्य को दृढ़ किया कि नाटकीय दृश्य को रचने का कौशल और दृष्टि जो उनके पास है, अन्यत्र दुर्लभ है. उनकी दृश्य भाषा में कविता की तरलता है. अभिनेताओं के […]
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अमितेश, रंगकर्म समीक्षक
रतन थियम निर्देशित और लिखित प्रस्तुति ‘लाइरेम्गीबी एशी’(अप्सराओं के गीत) से इक्कीसवें भारत रंग महोत्सव का समापन हुआ. रतन थियम ने इस तथ्य को दृढ़ किया कि नाटकीय दृश्य को रचने का कौशल और दृष्टि जो उनके पास है, अन्यत्र दुर्लभ है.
उनकी दृश्य भाषा में कविता की तरलता है. अभिनेताओं के नियंत्रित और अनुशासित देह, आवाज के अलग अलग लय पर संप्रेषण, संगीत से उनकी संगति और प्रकाश की कल्पनाशील परिकल्पना के तालमेल से जो दृश्य भाषा बनती है, उनमें नाटकीय सामग्रियों का योगदान भी होता है.
जैसे इस प्रस्तुति के एक दृश्य में अभिनेत्रियां काले बक्से में से निकलती हैं चश्मा पहने हुए, ये अप्सराएं हैं, जो अतीत से भविष्य की यात्रा पर हैं. सदी की यात्रा में मनुष्य ने तकनीक के साहचर्य में समय की अनिवार्यता का हवाला देकर जिस विकास का रास्ता चुना है, उसमें वह वैश्विक तो हुआ है, लेकिन अपने बक्से में बंद भी. उसका दुनियावी संपर्क जीवंत कम आभासी अधिक है.
और इस क्रम में प्रकृति से असंबद्धता के कारण संस्कृति के जैविक तत्वों से दूर होता गया है. यह काला बक्सा एक संकीर्ण दुनिया का प्रतीक है, तो बाद में एक अलग दृश्य बिंब में सीढ़ियों में बदल जाता है, जो अप्सराओं को बाइसवीं सदी में ले जाता है. वह दुनिया कैसी होगी? दृश्य बिंबों की ऐसी शृंखला इस प्रस्तुति में है कि मणिपुरी न समझ पानेवाले दर्शक प्रेक्षागृह में जमे रहते हैं. यह प्रस्तुति थियम की पिछली प्रस्तुति ‘मैकबेथ’ की कड़ी में है, जिसमें उन्होंने मैकबेथ की महत्वाकांक्षा को एक ऐसे मानवीय होड़ से जोड़ा था, जिसका असर परिवेश पर भी पड़ा है. अपने वक्तव्यों में भी वे निरंतर प्रकृति के क्षरण की चिंता करते रहे हैं, इस प्रस्तुति में उन्होंने इस चिंता को साकार किया है.
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर देश की राजधानी में मणिपुरी भाषा के मंचन से राष्ट्रीय रंग महोत्सव का समापन सुखद संयोग है. भारंगम की शुरुआत अमोल पालेकर निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘कुसूर’ से हुई थी, जो मनुष्य के अपराध बोध और पूर्वग्रह के बारे में है.
इक्कीस दिनों तक चले इस महोत्सव का मुख्य केंद्र दिल्ली था, जबकि पुदुच्चेरी, देहरादून, शिलांग और नागपुर अन्य केंद्र थे. सभी केंद्रों को मिला कर 91 नाट्य दलों ने 101 नाट्य प्रस्तुतियां कीं. भारंगम के समापन समारोह की अध्यक्षता कर रहे रुद्र प्रसाद सेनगुप्ता ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की केंद्रीय स्थिति की चर्चा करते हुए कहा कि जरूरत है, यह संस्था खोज करके अच्छी चीजों को केंद्र में लेकर आये.
सेनगुप्ता जिस चीज की तरफ इशारा कर रहे थे, वह है नैतिक बल. अगर रंगकर्मी नैतिक बल से रंगमंच नहीं करेगा, तो सच कहने का साहस कैसे कर पायेगा?
रानवि के निदेशक सुरेश शर्मा ने कहा कि भारंगम में भारतीय रंगमंच की विविधता का प्रतिनिधित्व प्रतिबिंबित हो, इसलिए चयन में सतर्कता और पारदर्शिता बरतने का प्रयास होता है.
दरअसल भारंगम जिस तेजी से अपनी ब्रांड वैल्यू खोता जा रहा है, उस पर रानावि को विचार करना चाहिए कि भारी-भरकम चयन समिति बनाने के बावजूद भारंगम में देश के प्रतिभाशील निर्देशकों की चर्चित प्रस्तुतियां क्यों नहीं आ पातीं, वहीं ऐसी प्रस्तुतियां चुनी जाती हैं, जिसका स्तर नहीं रहता. पिछले कुछ वर्षों से भारंगम से दर्शक लगातार दूर होते गये हैं.
मनोरंजन के बजाय प्रस्तुतियों से मानसिक थकान लेने दर्शक आयें भी क्यों? दर्शक किस कदर नयापन चाहते हैं, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि रानावि छात्रों की डिप्लोमा प्रस्तुतियां हाउसफूल रहीं, क्योंकि दर्शक आश्वस्त थे कि इसमें कुछ नया करने की कोशिश होगी. पिछले वर्ष से एक और बदलाव किया गया है कि उपकेंद्रों में जो प्रस्तुतियां भेजी जाती हैं, वह दिल्ली में नहीं होतीं. इससे भारंगम का स्वरूप खंडित होता है. यह जरूरी है कि दिल्ली में सभी प्रस्तुतियां हों, ताकि भारंगम का स्वरूप मुकम्मल रहे. रतन थियम लिखते हैं कि अच्छे रंगमंच में दर्शकों की सोच और भावनाओं पर एक छाप छोड़ने की क्षमता होती है, भारंगम को ऐसे नाटकों से लैस करना पड़ेगा, तब दर्शक भारंगम तक लौटेंगे.
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