दूध संग जलेबी जायका भी, खाना भी
Updated at : 19 Jan 2020 3:04 AM (IST)
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जलेबी सिर्फ अपनी मिठास के लिए ही नहीं, पेट-भराउ व्यंजन के रूप में भी जानी जाती है. दूध और दही के साथ जलेबी के नाश्ते के कहना ही क्या. कभी देहाती मिठास समझी जानेवाली जलेबी आज विदेशों में झंडे फहरा रही है. स र्दियों में शादी वाले दावतों वगैरह में मुंह मीठा करने के लिए […]
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जलेबी सिर्फ अपनी मिठास के लिए ही नहीं, पेट-भराउ व्यंजन के रूप में भी जानी जाती है. दूध और दही के साथ जलेबी के नाश्ते के कहना ही क्या. कभी देहाती मिठास समझी जानेवाली जलेबी आज विदेशों में झंडे फहरा रही है.
स र्दियों में शादी वाले दावतों वगैरह में मुंह मीठा करने के लिए लगभग हर जगह हलवे, गुलाब जामुन और आइसक्रीम के साथ जलेबी नजर आने लगती है. किसी को मुलायम गुदगुदी जलेबी ललचाती है, तो किसी को कुरकुरी. आमतौर पर जलेबी की जुगलबंदी फीकी रबड़ी के साथ साधी जाती है. नफासत पसंद लोग पनीर की नाजुक जलेबी की फरमाइश भी करते हैं. कहीं-कहीं केसरिया जलेबी भी नजर आती है.
मेरा बचपन उत्तराखंड के जिस पहाड़ी कस्बे में बीता है, वहां जलेबी ही आम और खास की मनपसंद मिठाई थी. पहाड़ी गाय और भैंसे अपनी मैदानी बहनों की तुलना में कम दूध देती हैं, अत: वहां मावा-खोया दुर्लभ था और छेने की बंगाली मिठाइयां तब तक वहां पहुंची नहीं थीं. वहां गरमागरम जलेबियों को गुनगुने दूध में डुबो के खाने का रिवाज था.
आधी सदी पहले नैनीताल में बखरुआ हलवाई अपनी तेल की जलेबियों के लिए मशहूर था. इन जलेबियों की खासियत ‘बक्खर’ (मैदे के गाढ़े घोल) में उठा मजेदार खमीर माना जाता था. एक पुरानी कहावत के अनुसार, अय्याश फिजूलखर्च रईस अपने घोड़ों को दूध-जलेबी खिलाते हैं, जबकि उनके बदहाल खिदमतगार बिना सब्जी रूखी रोटियों को तरसते हैं!
दूध के अलावा दही भी जलेबी का साथ बखूबी निभाती है- उसकी मिठास को अपनी हल्की खटास से काटती है, तो मन तृप्त हो जाता है.
उपन्यासकार नमिता गोखले मानती हैं कि जलेबी पहाड़ों तक रोहिल्ला अफगानों के साथ 19वीं सदी के पूर्वार्ध में ही पहुंची. यह बात तर्कसंगत लगती है, क्योंकि दक्षिण भारत में जलेबी ‘जांगिर’ कहलाती है, जिसका मूल ‘जहांगीरी’ है. खान-पान के इतिहासकारों का मानना है कि यह मुगलों के साथ नहीं, बल्कि अरबों के साथ भारत पहुंची. मध्य एशिया में यह ‘जलेबिया’ नाम से लोकप्रिय है.
पुरानी दिल्ली में चांदनी चौक में बड़े आकार के ‘जलेबा’ के दर्शन होते हैं, जिसे घी में पकाया जाता है. हरियाणा प्रदेश में गोना कस्बे की शान घी में तले जलेबे (यानी जलेबियां) हैं. बनारस का पारंपरिक नाश्ता कचौरी जलेबी का ही है, तो वहीं मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में, खासकर इंदौर और उज्जैन में पोहे के साथ जलेबी का आनंद लिया जाता है.
कभी देहाती मिठास समझी जानेवाली जलेबी आज विदेशों में झंडे फहरा रही है. विश्वविख्यात मिशेलिन सितारों से अलंकृत शेफ विनीत भाटिया ने अपने ग्राहकों को पुदीने, हरे धनिये और छोटी इलायची की हरी जलेबी खिलाकर मंत्रमुग्ध कर दिया है. चौकोर परतदार जलेबी भी इन्हीं की ईजाद है. मुंबई की ‘बॉम्बे कैंटीन’ तथा ‘मसाला लायब्रेरी’ जैसे फैशनेबल रेस्त्रां के मेनू में जलेबी की संतानों ने जगह बना ली है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भोजन को प्रतिष्ठित करने में जुटे युवा प्रतिभाशाली झारखंडी शैफ निशांत चौबे ने पूर्व और पश्चिमी मिठास का संगम दर्शानेवाली अनूठी मिठाइयों में जलेबी के विभिन्न अवतारों का प्रयोग किया है, कहीं ‘क्रंबल’ में, तो कहीं किसी ‘टार्ट’ या ‘बेक’ में.
टोक्यो और दुबई में जो भारतीय मिठाई की दूकानें उन्होंने खोली हैं, वहां जलेबी ने अपना जलवा दिखाया है. उनका वादा है कि जल्दी ही वह हमें फलधारी जलेबी चखायेंगे. देखते हैं कि जोश कितना बाजू इस हलवाई के हैं!
हमारा मानना है कि जलेबी का आकर्षण 21वीं सदी में बरकरार रहेगा. जहां दूसरी कई मिठाइयां आप घर पर बना सकते हैं, लेकिन बनाने के लिए अनुभव से हासिल कौशल और धीरज की दरकार है.
रोचक तथ्य
खान-पान के इतिहासकारों का मानना है कि जलेबी मुगलों के साथ नहीं, बल्कि अरबों के साथ भारत पहुंची.
मध्य एशिया में ‘जलेबिया’ नाम से यह लोकप्रिय है.
उपन्यासकार नमिता गोखले मानती हैं कि जलेबी पहाड़ों तक रोहिल्ला अफगानों के साथ 19वीं सदी के पूर्वार्ध में पहुंची.
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