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कांकेः जहाँ खुला था देश का पहला मानसिक चिकित्सालय

Updated at : 13 Oct 2019 2:54 PM (IST)
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कांकेः जहाँ खुला था देश का पहला मानसिक चिकित्सालय

देश में मानसिक रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों की कमी है. न केवल साइकियाट्रिक बल्कि क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट और उनकी मदद करने वाली नर्सों और दूसरे क्लीनिकल सहयोगियों की संख्या भी ज़रूरत के मुताबिक़ नहीं है. इसका असर मानसिक अस्पतालों की व्यवस्था पर पड़ता है. इसी कारण अस्पतालों में रोगियों की भीड़ है और डॉक्टरों […]

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देश में मानसिक रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों की कमी है. न केवल साइकियाट्रिक बल्कि क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट और उनकी मदद करने वाली नर्सों और दूसरे क्लीनिकल सहयोगियों की संख्या भी ज़रूरत के मुताबिक़ नहीं है. इसका असर मानसिक अस्पतालों की व्यवस्था पर पड़ता है.

इसी कारण अस्पतालों में रोगियों की भीड़ है और डॉक्टरों पर काम का दबाव है.

इस बात का पता भारत सरकार द्वारा साल 2015-16 में देश के 12 राज्यों में कराए गए नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे (एनएमएचएस) से हुआ. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, देश की कुल आबादी का 10.6 फ़ीसदी हिस्सा मानसिक बीमारियों से ग्रसित लोगों का है. इनके इलाज के लिए 15,000 साइकियाट्रिस्ट्स की जरुरत है. भारत में अभी साइकियाट्रिस्ट्स की संख्या 4000 से भी कम है.

इसकी पढ़ाई करने वालों की संख्या भी कम है. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती ज़रूरत के मुताबिक़ मनोचिकित्सकों की बहाली और उन्हें पढ़ाने के लिए ज़रूरी संसाधनों के इंतज़ाम की है.

झारखंड के कांके गांव में स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री (सीआइपी) के निदेशक डॉक्टर डी राम मानते हैं कि लोगों को मानसिक तौर पर स्वस्थ रखना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यह संख्या देश की हेल्थ इकोनॉमी की सूचक है. इससे परिवार, समाज और देश पर असर पड़ता है.

सीआइपी भारत के मानसिक रोगियों के अस्पतालों में शामिल है. यहां 643 बिस्तर है. इनमें से 222 बिस्तर महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं. अभी यहां के 87 फ़ीसदी बिस्तर मरीज़ों से भरे हैं. इनके लिए कई वॉर्ड बनाए गए हैं. इनमें से अधिकतर वॉर्डों का नामकरण उन ब्रिटिश डॉक्टरों के नाम पर किया गया है, जिन्होंने कभी यहां रिसर्च की थी.

डॉ डी राम ने बीबीसी से कहा "भारत में बनी दवाइयों से दुनिया के कई देशों में मानसिक रोगियों का इलाज किया जाता है. भारतीय कंपनियों द्वारा बनायी गई दवाइयां ख़रीदने वालों में श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अमरीका जैसे देशों के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) भी शामिल है. यहां मानसिक रोगियों के लिए बने दुनिया के कुछ बेहतरीन अस्पताल भी हैं. मानसिक रोगियों के इलाज की सबसे अच्छी और सुरक्षित विधि इसीटी (इलेक्ट्रो कनवर्जल थेरेपी) का सफलतम प्रयोग भारत में ही हुआ है."

यहां बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के मरीज़ों की बहुतायत है.

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक साल 2018 में यहां की ओपीडी (आउट पेशेंट डिस्पेंसरी) में कुल 92,901 मरीज़ों ने इलाज कराया. इनमें से 4018 मरीज़ भर्ती किए गए. पहले से भर्ती 3955 मरीज़ों को डिस्चार्ज किया गया.

साल 2007 में यहां की ओपीडी में सिर्फ 55903 मरीज़ों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया था. उस साल दस मरीज़ों की इलाज के दौरान मौत हुई थी. पिछले साल यहां सिर्फ़ दो मरीज़ों की मौत हुई. स्पष्ट है कि मरीज़ों की संख्या बढ़ने के बाद कैजुएलिटी पर क़रीब-क़रीब नियंत्रण पा लिया गया है.

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सीआइपी के निदेशक डॉक्टर डी राम इसे अच्छा संकेत मानते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा,’मानसिक रोगियों का इलाज सिर्फ़ दवाइयों से नहीं होता. उन्हें अनुकूल माहौल देना और उनसे बातचीत कर उनकी काउंसलिंग करना समानांतर तौर पर चलता है. मरीज़ों के लिए साल 1928 से ही यहां थिएटर (सिनेमा घर) संचालित है. एक बड़ी लाइब्रेरी है, जिसमें फिक्शन और नॉन फिक्शन साहित्य के साथ ही हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला के प्रमुख अख़बार भी रखे गए हैं.’

डॉक्टर डी राम ने यह भी बताया कि महिलाओं के लिए क्लब है. यहां वे सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, पेंटिंग आदि गतिविधियों में व्यस्त रहती हैं. इसके अलावा पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग खेल के मैदान हैं. बैडमिंटन कोर्ट है. वार्डों में एफ़एम और टीवी है ताकि मरीजों का मनोरंजन हो सके.

ये सारी सुविधाएं सिर्फ़ दस रुपये रोज़ के ख़र्च पर उपलब्ध हैं. इसी पैसे में उनकी दवाइयां, खाना-पीना, इलाज और रहने का इंतज़ाम कराया जाता है. खाने के लिए शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के भोजन का इंतज़ाम हैं. अलग-अलग दिनों के लिए अलग-अलग खाना होता है.

खूबसूरत दुनिया

मानसिक चिकित्सालय के अंदर एक शानदार दुनिया बसती है. जहां हर शख्स खुश है. वह बड़े सपने देखता है और यहां से निकलने के बाद उसे नयी ज़िंदगी शुरू करनी है. बीबीसी की टीम ने कुछ ऐसे लोगों से बात की और उनके साथ समय भी बिताया.

महिला वार्ड में हमारी मुलाकात सोनी (बदला हुआ नाम) से हुई. सिर्फ 24 साल की सोनी के दोनों हाथों में लाल रंग की चूड़ियां और माथे पर सिंदूर था. उन्होंने बताया कि वे एक महीने पहले यहां आयी थीं और अब ठीक हो गई हैं. उन्हें उनके बच्चे की याद आती है.

जब हम पुरुष वार्ड में पहुंचे, तो कुछ रोगी टीवी पर क्रिकेट मैच देख रहे थे. कुछ एफ़एम को लेकर शिकायत कर रहे थे जो एक दिन पहले ख़राब हो गया था. हर वार्ड दरअसल एक कॉटेज में संचालित है. हर कॉटेज में कई कमरे हैं. एक कमरे में छह और कुछ में इससे अधिक रोगियों के सोने-रहने की व्यवस्था है.

वे दिन में कैंपस के अंदर घूम-टहल सकते हैं. शाम होते ही उन्हें अपने कमरे में वापस आना पड़ता है.

यहां मिले अनिर्बान घोष (बदला हुआ नाम) उस नर्स को लेकर परेशान थे, जो पिछले कुछ दिनों से उनकी देखरेख कर रही थीं. उस दिन वे छुट्टी पर थीं. यहीं पर एक एनआरआई मिले. उन्होंने अपनी बीमारियों की जानकारी के लिए डायरेक्टर को कई मेल लिख डाले थे.

कैसे दिया जाता है बिजली का झटका

साल 1943 से ही यहां इलेक्ट्रो कनर्वजल थेरेपी (इसीटी) से इलाज किया जाता है. यह हिन्दी फ़िल्मों मे दिखाए जाने वाले इलेक्ट्रिक शॉक से बिल्कुल अलग है. डॉक्टर डी राम के मुताबिक यह मानसिक रोगियों के इलाज की सबसे सफल और सुरक्षित विधि है.

इस पद्धति से इलाज करने के पहले मरीजों को बेहोश कर दिया जाता है. बिजली के यह झटके एक मिनट तक के होते हैं. इसके लिए मरीजों के वार्ड में ही इसकी मशीन लायी जाती है और उनका इलाज किया जाता है.

जिनका कोई नहीं..

मानसिक रोगियों के ठीक हो जाने के बावजूद कुछ मरीजों के परिजन उन्हें वापस ले जाने नहीं आते. सीआइपी में अभी 28 पुरुष और 26 महिला मरीज़ ऐसे ही हैं. उनकी बीमारी ठीक हो चुकी है लेकिन उन्हें ले जाने वाला कोई नहीं है.

वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने किसी अपने को भर्ती कराने के बाद यहीं पर किराये का घर ले लिया है. ताकि वे जब चाहें उन्हें देख सकें.

बिहार के बेतिया से आए रामध्यान (बदला हुआ नाम) भी ऐसे ही एक शख्स हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि उनकी पत्नी यहां 15 दिनों से भर्ती है. इस कारण उन्होंने किराए पर एक घर ले लिया है ताकि स्वस्थ होने पर अपनी पत्नी को वापस घर ले जा सकें.

कई दिक्कतें भी हैं

वैसे कांके स्थित सीआइपी की हालत से सभी अस्पतालों की हालत मेल नहीं खाती. आगरा और बरेली के अलावा रांची के ही दूसरे मानिसक अस्पताल रिनपास में कई दिक्कतें हैं.

रिनपास में मरीज़ों को सिर्फ़ एक महीने की दवा दी जाती है. इस कारण ओपीडी में मरीज़ों की भीड़ लगी रहती है. दरअसल, यहां दवा की आपूर्ति करने वाली कंपनियों में भुगतान के समय को लेकर भी नाराज़गी है. इसका असर दवाइयों की आपूर्ति और अंततः मरीजों पर पड़ता है.

रिनपास का विवाद बिहार सरकार से भी चल रहा है. बिहार के स्वास्थ्य सचिव संजय कुमार ने रिनपास प्रबंधन को पत्र लिखकर कहा है कि वे बिहार के मरीजों को भर्ती नहीं करें क्योंकि बिहार सरकार कोईलवर मानसिक अस्पताल खोल रही है.

इसके बाद से रिनपास में इलाज कराने आने वाले बिहार के मरीजों को परेशानी हो रही है. दरअसल, रिनपास का बिहार सरकार पर करोड़ों रुपया बकाया है. यह पैसा मांगे जाने पर बिहार सरकार ने ताजा विवाद उत्पन्न हुआ है.

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