वंचित वर्ग के हित में हमारा संविधान

Updated at : 02 Jul 2014 7:19 AM (IST)
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वंचित वर्ग के हित में हमारा संविधान

।। आरके नीरद ।। मित्रों, हमारे संविधान में सभी वर्ग, जाति, धर्म, लिंग और समूह के नागरिकों के हितों की रक्षा की गारंटी दी गयी है. इसी के तहत नागरिकों को वैसे कानूनी अधिकार मिले हैं, जो उनके मौलिक अधिकारों को लागू करने में सहायक हैं. लोकतंत्र की बुनियाद हमारा संविधान है और ऐसे प्रावधान […]

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।। आरके नीरद ।।

मित्रों,

हमारे संविधान में सभी वर्ग, जाति, धर्म, लिंग और समूह के नागरिकों के हितों की रक्षा की गारंटी दी गयी है. इसी के तहत नागरिकों को वैसे कानूनी अधिकार मिले हैं, जो उनके मौलिक अधिकारों को लागू करने में सहायक हैं. लोकतंत्र की बुनियाद हमारा संविधान है और ऐसे प्रावधान हैं, जो ं वंचित व आदिवासी समाज को ताकत देते हैं. इस अंक में हम उन्हीं संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कर रहे हैं.

शोषण के खिलाफ अधिकार

हमारे संविधान में राज्य या व्यक्तियों द्वारा समाज के कमजोर वर्गों का शोषण रोकने के लिए कुछ प्रावधान किए गये हैं. अनुच्छेद 23 के प्रावधान के अनुसार मानव तस्करी प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है. किसी व्यक्ति का आर्थिक शोषण नहीं किया जा सकता. बिना मजदूरी के किसी से काम नहीं लिया जा सकता. कोई व्यक्ति स्वेच्छा से ऐसा कर सकता है, लेकिन कोई व्यक्ति किसी से जबरन ऐसा नहीं करा सकता, लेकिन किसी सर्वजनिक उद्देश्य और अनिवार्य सेवा के लिए सरकार ऐसी सेवा ले सकती है. बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 को इस अनुच्छेद में प्रभावी करने के लिए संसद द्वारा अधिनियमति किया गया है. कारखानों और अन्य खतरनाक नौकरियों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम कराना प्रतिबंधित है.

समानता का अधिकार

भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया गया है. यह धर्म, जाति, वंश, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों में किसी भी तरह के विभेद को रोकता है. यह संवैधानिक गारंटी है, जो वंचित वर्ग के लोगों को बड़ी ताकत देता है, लेकिन शासन को महिलाओं और बच्चों, अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों तथा सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिकों को विशेष सुविधा व अवसर देने के लिए आरक्षण देने से नहीं रोकता. समानता का अधिकार के तहत छुआछूत को एक दंडनीय अपराध घोषित किया गया है. इन अधिकारों के जरिये ही राष्ट्र का बड़ा से बड़ा व्यक्ति और गांव का साधारण किसान-मजदूर देश में बराबरी का स्तर रखता है.

सूचना का अधिकार

सूचना का अधिकार 2005 में लागू हुआ. यह देश के नागरिकों को मिला एक ऐसा अधिकार है, जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता है. इसके जरिये हर नागरिक को सरकार, सरकारी तंत्र और सरकारी धन से या सरकारी नियम के तहत चलने वाले संस्थानों के सभी तरह के कामकाज की जानकारी मांगने तथा उनकी निगरानी का अधिकार मिला है. अब देश का कोई नागरिक दस रुपया सूचना शुल्क देकर सरकार व ऐसे संगठनों-कार्यालयों से सूचना की मांग कर सकता है. यह भ्रष्टाचार को रोकने और पारदर्शिता लाने में तो सहायक है ही, नागरिकों के अधिकारों के हनन को रोकने में कारगर है. चूंकि वंचित समाज राजनीतिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है. इसलिए उसके लिए यह कानून बड़ा हथियार है. इसमें बीपीएल परिवारों से किसी तरह की फीस नहीं लेने का प्रावधान है.

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार

भारत धर्मनिर्पेक्ष राज्य है. केंद्र या कोई राज्य किसी खास धर्म का न तो पक्षधर है, न विरोधी. हर नागरिक को अपने हिसाब से धर्म चुनने और उसके अनुसार आचरण करने का अधिकार है. उन्हें धर्म के मामले में अपने विवेक का इस्तेमाल करने, अपनी पसंद के धर्म के उपदेश, अभ्यास और प्रचार की स्वतंत्रता की गारंटी है. ऐसे करता हुइ कोई नागरिक किसी दूसरे के धर्म या संप्रदाय या उससे जुड़ी भावना को अहत नहीं कर सकता. यह हमारे संविधान की सबसे बड़ी गारंटी है. सभी धार्मिक संप्रदायों तथा पंथों को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता तथा स्वास्थ्य के अधीन अपने धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन करने, अपने स्तर पर धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाएं स्थापित करने और कानून के अनुसार संपित्त रखने, प्राप्त करने और उसका प्रबंधन करने के अधिकार की गारंटी देता है. सरकार से मिले धन से चलने वाले किसी शिक्षण संस्थान में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती.

भोजन का अधिकार

देश के लोगों को हाल के सालों में जो बड़े और मानवीय अधिकार मिले हैं, उनमें भोजन का अधिकार भी शामिल है. इसके तहत यह गारंटी दी गयी है कि किसी व्यक्ति को अब भूख से मरने नहीं दिया जायेगा. सरकार ऐसे सभी परिवारों को सस्ते दर पर अनाज देगी. भोजन का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के मुताबिक मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आता है. यह कानून इसी साल लागू हुआ है. इसके जीत देश की तकरीबन 70 फीसदी आबादी को लाभान्वित किया जाना है. इसमें अनाज के अलावा दूसरी वस्तुएं भी उपलब्ध कराया जानी है. इससे वैसे वर्गो को ज्यादा राहत मिलेगी, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं. यह कानून देश के अन्य राज्यों की तरह झारखंड और बिहार में भी लागू है.

रोजगार गारंटी

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के जरिये गांव के सभी तबके के लोगों को उनके ही गांव में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान बनाया गया है. हालांकि इन कानून को ठीक से लागू नहीं किये जाने के कारण इसका लाभ अब तक लोगों को ठीक से नहीं मिल पाया है. मगर आने वाले समय में यह गांव के लोगों के लिए बड़ा बदलाव लेकर आयेगा.

इस कानून के तहत हर इंसान को सौ दिन का रोजगार दिये जाने की गारंटी है और अगर सरकार किसी को रोजगार उपलब्ध कराने में विफल रहती है तो उसे उस व्यक्ति को बेरोजगारी भत्ता के तहत मजदूरी उपलब्ध कराना है. हालांकि आज भी देश में मजदूरों को बमुश्किल साल में 25-30 दिनों का ही रोजगार मिल पाता है, मगर लोग जागरूकता के अभाव में बेरोजगारी भत्ता भी प्राप्त करने में विफल रहते हैं. अगर मनरेगा का ठीक से अनुपालन हो तो गांव से गरीबी और बेरोजगारी को खत्म करने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है.

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

इसके तहत अगर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता हो तो वह सर्वोच्च न्यायालय में इसके खिलाफ अपील कर सकता है. सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा प्रादेश जारी करने का अधिकार दिया गया है, जबकि उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न होने पर भी इन विशेषाधिकार प्रादेशों को जारी करने का अधिकार दिया गया है. निजी संस्थाओं के खिलाफ भी मौलिक अधिकार को लागू करना तथा उल्लंघन के मामले में प्रभावित व्यक्ति को समुचित मुआवजे का आदेश जारी करना सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्रिधकार में है. सर्वोच्च न्यायालय अपनी प्रेरणा से या जनिहत याचिका के आधार पर अपने क्षेत्रिधकार का प्रयोग कर सकता है.

शिक्षा का अधिकार

हालांकि इस अधिकार को स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल किया गया है, मगर इस पर अलग से चर्चा करने की जरूरत है. यह अधिकार न सिर्फ शत-प्रतिशत शिक्षा का उपाय करती है, बल्कि बच्चों को बेहतर जीवन अवसर उपलब्ध कराने में भी मदद करती है. बाल श्रम और दूसरे तरह के शोषण से भी उसे बचाती है. इस अधिकार के तहत छह से 14 साल तक के बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य रूप से स्कूल भेजना जरूरी है. इस संबंध में अभिभावक समेत जो लोग भी जिम्मेदार होंगे, उन्हें दंडित करने की बात की गयी है. बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए इस कानून के तहत कई प्रावधान किये गये हैं. जैसे मध्याह्न भोजन, ड्रेस, मुफ्त किताबें और कई राज्यों में साइकिल तक बांटी जाती हैं. इस अधिकार से आने वाले सालों में गांवों की सूरत बदल जायेगी.

वनाधिकार अधिनियम

झारखंड के संदर्भ में यह कानून बड़ा महत्वपूर्ण है. इस कानून के तहत यह माना गया है कि जंगलों की सुरक्षा और उसका संवर्धन उसके साथ रहने वाले लोग ही कर सकते हैं. अत: यह अधिकार उन्हीं को दे दिया जाये. हालांकि इस कानून को लागू करने में भी काफी हीला-हवाला होता रहा है. इस कानून के तहत वनों में रहने वाले लोगों को न सिर्फ जमीन के पट्टे वितरित किये जाने हैं बल्कि पूरे के पूरे गांव को उनके इलाके के वन क्षेत्र के प्रबंधन का अधिकार भी दिया जाना है. अभी लोगों को व्यक्तिगत पट्टे ही दिये जा रहे हैं, इसके बाद सामूहिक पट्टे भी दिये जायेंगे. एक बार लोगों को पट्टे दे दिया गये तो इससे लोगों की ताकत में बड़ा इजाफा होगा और वनों की सुरक्षा भी ठीक से हो सकेगी.

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

सांस्कृतिक रूप से समाज के सभी वर्ग, जाति, धर्म और संप्रदाय के समूह की अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं. उनके बीच सौहाद्र्र और समन्वय की गारंटी हमारा संविधान देता है. प्राय: कम आबादी वाले लोग बहुसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक दबाव में आते हैं. ऐसा उनके सांस्कृतिक अधिकार का हनन है. इसे रोकने की व्यवस्था हमारे संविधान में है. उन्हें भी अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का समान अधिकार है. प्रत्येक नागरिक अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण व उसका विकास कर सकता है. इसके लिए अपने पसंद की शैक्षिक संस्थाएं स्थापित की जा सकती है. हालांकि शब्द अल्पसंख्यक को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गयी व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ है कोई भी समुदाय जिसके सदस्यों की संख्या, उस राज्य की जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम हो.

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