बीमारी नहीं है स्लो लर्निग

Updated at : 01 Jul 2014 1:37 PM (IST)
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बीमारी नहीं है स्लो लर्निग

कई बार आपने देखा होगा कि आपके बच्चे को कुछ बातें कई बार दोहराने के बाद याद होती हैं. वह कई चीजें भूल जाता है. पढ़ाई में भी उसे अध्याय धीरे-धीरे याद होता है. अगर ऐसा है तो आपका बच्चा स्लो लर्नर हैं. ऐसे बच्चों को माता पिता के साथ की अधिक जरूरत पड़ती है. […]

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कई बार आपने देखा होगा कि आपके बच्चे को कुछ बातें कई बार दोहराने के बाद याद होती हैं. वह कई चीजें भूल जाता है. पढ़ाई में भी उसे अध्याय धीरे-धीरे याद होता है. अगर ऐसा है तो आपका बच्चा स्लो लर्नर हैं. ऐसे बच्चों को माता पिता के साथ की अधिक जरूरत पड़ती है. जानते हैं कि कैसे बन सकते हैं आप अपने स्लो लर्नर बच्चों के दोस्त..

दोस्त बनें
यदि आपका बच्चा जल्दी किसी बात को समझ नहीं पाता, तो यह जरूरी है कि आप सबसे पहले उसके दोस्त बनें. चूंकि जब तक आप उसके दोस्त नहीं बनेंगे. आपका बच्चा आपसे अपनी परेशानी बताने में कतरायेगा.

खासतौर से इस बात का ख्याल तो जरूर रखें कि उन पर गुस्सा न करें. ऐसे बच्चे पहले से ही काफी परेशान रहते हैं. आपके कड़क स्वभाव से वे और तनाव महसूस करने लगेंगे. यह बेहद जरूरी है कि आप अपने बच्चे की कमजोरियों को समङों. उनके दोस्त बन कर उन पर गौर करें कि उन्हें ये परेशानी क्यों हो रही है? आखिर वे किन-किन जगहों पर फंसते हैं. उनके मन में क्या चल रहा है. आप अपने बच्चे के दोस्त बनेंगे तभी आप उनकी मदद कर पायेंगे.

खेल-खेल में समझाएं
बचपन में जब हम कई बार कुछ चीजों को याद नहीं कर पाते थे तो हमारे माता पिता हमें ट्रिक से पढ़ाई करना सिखाते थे. स्लो लर्नर के लिए यह प्रक्रिया किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं. आप उन्हें खेल-खेल में पढ़ाने की कोशिश करें. उनका अध्याय आप इस तरह रोचक बना दें कि वे उसे याद कर लें. कभी अध्याय के की-वर्डस को माध्यम बनाएं. कभी किस्से, कहानियां सुना दें तो वे निश्चित तौर पर इन चीजों को समङोंगे और उसे इंज्वॉय करके पढ़ेंगे. स्लो लर्निग कोई लर्निग डिसेबिलिटी नहीं है. अभिभावकों को यह समझना बेहद जरूरी है. यह एक सामान्य सा शब्द है, जो उन बच्चों के इस्तेमाल किया जाता है, जो किसी भी चीजों को समझने में वक्त लगाते हैं. न सिर्फ एकेडेमिक, बल्कि बाकी चीजें भी समझने में उन्हें वक्त लगता है. ऐसे बच्चों के साथ अगर आप बार-बार चीजों को दोहरायेंगे तभी उन्हें वे याद हो पायेंगी. ऐसे बच्चों के साथ माता पिता को ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहिए. साथ ही अभिभावकों को यह समझना बहुत जरूरी है कि स्लो लर्नर का मतलब बैड लर्नर होना कतई नहीं होता.

प्रैक्टिकल पर दें ध्यान
आमतौर पर स्लो लर्नर के साथ परेशानी यह आती है कि वह क्लासरूम में उस तरह से बर्ताव नहीं कर पाते, जैसा बाकी बच्चे करते हैं. ऐसे में स्कूल में उन्हें खास तवज्जो नहीं मिलती और इससे उनका नुकसान होता है. अगर आप अभिभावक हैं और आप इस बात को समझ रहे हैं कि आपके बच्चे के साथ यह परेशानी है तो आपको उनकी मदद घर पर करनी चाहिए. उन्हें जबरन थ्योरी की चीजें या किताबी भाषा में पढ़ाने की कोशिश न करें. प्रैक्टिल चीजों की तरफ उनका ध्यान आकर्षित कराएं. कई बार ऐसा भी देखा गया है कि स्लो लर्नर बच्चे प्रैक्टिल चीजों को जल्दी सीख पाते हैं.

माहौल बनाएं
यह बेहद जरूरी है कि स्लो लर्नर बच्चों को कभी भी इंफ्योरिटी कांप्लेक्स न हो. उनकी तुलना कभी भी तेज दिमाग के बच्चों से नहीं करनी चाहिए. ऐसे करने पर स्लो लर्नर बच्चे खुद को कमजोर मानने लगते हैं और फिर अंदर ही अंदर घूटते रहते हैं. सो, यह बेहद जरूरी है कि उन्हें वैसे माहौल में रखा जाये. जहां उन्हें प्यार और खुशियां मिले.

बाहरी दुनिया की सैर
स्लो लर्नर बच्चों के लिए यह बेहद जरूरी है कि उन्हें किताबी ज्ञान की बजाय बाहरी दुनिया की सैर कराई जाये. गरमी की छुट्टियों में उन्हें घूमाने-फिराने ले जाएं, जो बातें किताबों में लिखी हैं वह आप उन्हें प्रैक्टिल रूप से दिखा सकते हैं तो जरूर दिखाएं. चूंकि इसकी मदद से वे चीजों को याद रख पायेंगे. उन जगहों को याद रख पायेंगे. इसीलिए जब भी मौका मिले उन्हें नयी जगहों पर लेकर जाएं.

खुद को करें अपडेट
अभिभावक मनोचिकित्सक से मिलें. बच्चों की समस्या को सुलझाने का सही तरीका जानें. रिसर्च करें कि ऐसे बच्चों के साथ किस तरह डील किया जा सकता है. अभिभावक खुद को अपडेट करते रहें. इससे बच्चों के विकास में मदद मिलेगी.

अनुप्रिया अनंत

फीचर डेस्क, मुंबई

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