यह प्यार का रिश्ता है उस्ताद अमजद अली खां
Updated at : 23 Dec 2018 9:37 AM (IST)
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भरत तिवारी कला समीक्षक पिछले दिनों इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में मेंबर सेक्रेटरी के दफ्तर की लॉबी में बैठा था. उनके कमरे का दरवाजा खुला और बाहर को आये डॉ सच्चीदानंद जोशी, अचल पांड्या और उनके साथ थे उस्ताद अमजद अली खां साब. जब तक मैं खड़ा हो ही रहा हूं, खां साब […]
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भरत तिवारी
कला समीक्षक
पिछले दिनों इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में मेंबर सेक्रेटरी के दफ्तर की लॉबी में बैठा था. उनके कमरे का दरवाजा खुला और बाहर को आये डॉ सच्चीदानंद जोशी, अचल पांड्या और उनके साथ थे उस्ताद अमजद अली खां साब. जब तक मैं खड़ा हो ही रहा हूं, खां साब वहीं से नाम लेते हुए कुछ ऐसा बोले, जो मेरे अंदर के कलाकार की प्रशंसा थी. क्या मैं हक्का-बक्का रह गया? क्या सरलता इतनी विरल हो चुकी है कि सामना होने पर हम चौंक जाते हैं? उसके बाद सब साथ ही रहे काफी देर तक. उनके मूड और हाव-भाव से यह अहसास हो रहा था कि वह आईजीएनसीए जिस कारण से भी आये होंगे, वह बहुत अच्छा ही रहा होगा. हुआ भी ऐसा ही.
उनकी संस्था ‘सरोद घर’ और आईजीएनसीए ने मिलकर 21, 22 और 23 दिसंबर को उनकी रागों का उत्सव मना रहे हैं. ‘दीक्षा: गुरु-शिष्य परंपरा शृंखला’ में उस्ताद अमजद अली खां के शिष्य देश के विभिन्न हिस्सों से जमा हुए हैं और तीन शामें- अपने गुरु के सानिध्य में गुरु की ही बनायी धुनों से- संगीत से सजा रहे हैं. ऐसा शायद ही पहले कभी किया गया हो. खां साब में एक अनोखी दिव्यता है- दिव्य मेरे लिए बड़ा सम्माननीय शब्द है और उनकी शख्सियत के साथ इस ‘दिव्य’ लिखने से पहले जेहन में कई ऐसे वाकये गुजरे और ठहरे हैं, जो ‘उनकी दिव्यता’ को दर्शाते हैं.
उस रोज उनके घर पर बातें हो रही थीं. खां साब बोले- ‘आज की दुनिया में एक सीमेंटेड बिल्डिंग को इंस्टीट्यूशन कहा जाता है. पहले के जमाने में एक विद्वान आदमी को इंस्टीट्यूशन समझा जाता था. और इसलिए गुरु-शिष्य परंपरा बनी; शिष्य गुरु के साथ रहते थे, गुरु के साथ खाते थे और गुरु की सेवा करते थे.
सेवा जैसे कोई सेवादार करता है: ‘जाओ भाई पान ले आओ’, ‘हाथ दबा दो’, ‘पांव दबा दो’ और शागिर्द खुशी के साथ, समर्पण भाव से करता था. आज हर कला इंस्टीट्यूशनलाइज्ड हो गयी है. सीखनेवाला फीस देता है और सिखानेवाले को तनख्वाह मिलती है, तो यह एक बहुत फॉर्मल रिलेशन बनता है…’
मैंने सवाल उठाया: दो लोग हैं एक गुरु-शिष्य परंपरा से सीखता है और दूसरा एक ‘फीस और तनख्वाह वाली’ संस्था से, ऐसे में दोनों की कला में फर्क-सा नजर क्यों आता है?
‘मेरे बुजुर्गों का मानना था कि ‘एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाये’! तब हम ग्वालियर में थे. पिताजी के साथ मैं वहां के सिंधिया स्कूल में गया. प्रिंसिपल ने पिताजी से कहा कि इन्हें हम पढ़ाना चाहेंगे, इन्हें बोर्डिंग में भर्ती कर दीजिए. पिताजी ने सवाल किया, ‘अगर यह बोर्डिंग में होंगे तो इन्हें मैं सिखाऊंगा कब?’ उनकी सोच थी कि पढ़ाई और संगीत एक साथ मुश्किल है. मेरी सोच यह नहीं है. मैं ईश्वरीय सत्ता में भरोसा रखता हूं और ईश्वर जर्रे को आफताब बना सकता है.
जब आप किसी पीएचडीधारक को सुनते हैं, जो कि बेशक बहुत अच्छा सुना रहा है, लेकिन आपको क्यों लगता है कि कोई पीएचडीधारक सुना रहा है. क्योंकि, कहीं-न-कहीं कुछ छूट जाता है. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि दुनिया किसको अपनाती है. आज दुनिया बिस्मिल्ला खां को मिस कर रही है; वह सिर्फ शहनाई के लिए दुनिया में आये थे. यह प्यार का रिश्ता है. दुनिया जिसे प्यार दे, वही सबसे बड़ा कलाकार है.’
खां साब कह रहे थे- दुनिया में धार्मिक इमारतें बहुत बन चुकी हैं, मुझे नहीं लगता कि हमें अब और बनाने की जरूरत है. टीवी खोलते ही हिंदू-मुस्लिम की बहस को देखकर मुझे चिंता होती है कि हमारे बच्चों और युवा पीढ़ी पर इसका क्या असर हो रहा होगा? यह मेरी अपील है लोगों से कि हर शहर में अच्छे से अच्छे हॉस्पिटल बनाये जायें, ताकि गरीब आदमी का भी इलाज हो सके. आज इतने फाइव स्टार हॉस्पिटल बन गये हैं कि जहां हमारे देश में गरीब इंसान जा ही नहीं सकता.
उस्ताद अमजद अली खां साब में वह शक्ति है, जिसे मैं दिव्य मानता हूं और मैं आप से यह कह सकता हूं कि आप में भी वही शक्ति है. तो क्या आप ने उस शक्ति के होने को नकार दिया है? यह सनद रहे- ‘संगीत ईश्वर है.’
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