नयी किताब : मिथकों का पुनर्पाठ

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नयी किताब : मिथकों का पुनर्पाठ

मिथक और पौराणिकता पर लिखी पुस्तकें अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचनी चाहिए, क्योंकि हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में धर्म और पौराणिकता का विशेष स्थान है. देवदत्त पट्टनायक कई वर्षों से भारतीय मिथकों और पौराणिकता को सहज और सरस विश्लेषण के साथ आम जन तक पहुंचा रहे हैं. अब तक वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 600 […]

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मिथक और पौराणिकता पर लिखी पुस्तकें अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचनी चाहिए, क्योंकि हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में धर्म और पौराणिकता का विशेष स्थान है.
देवदत्त पट्टनायक कई वर्षों से भारतीय मिथकों और पौराणिकता को सहज और सरस विश्लेषण के साथ आम जन तक पहुंचा रहे हैं. अब तक वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 600 से अधिक लेख और 30 पुस्तकें लिख चुके हैं.
टेलीविजन चैनल एपिक पर ‘देवलोक’ सीरीज के माध्यम से भी वे जानकारी देते रहे हैं. इस सीरीज पर आधारित उनकी तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. तीसरी पुस्तक में ग्राम देवता, रामायण के विविध संस्करणों, सूर्य देव, राधा, द्वारिका, योग, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, रावण, शबरी, विवाहों के प्रकार, खजुराहो के मंदिर, संस्कार आदि के बारे में चर्चा के साथ बाइबिल और ईसाई धर्म तथा यूनानी मिथकों से जुड़ी बातें हैं.
देवदत्त पट्टनायक की एक विशेषता यह भी है कि वे कथाओं के धार्मिक और आध्यात्मिक आयामों के साथ उनके प्रासंगिक संदेशों का भी विश्लेषण करते हैं.
आम तौर पर देखा जाता है कि कर्मकांडों और आस्थाओं की जड़ता धार्मिक और पौराणिक आख्यानों को रूढ़िवादी जामा पहना देती है. इसी प्रवृत्ति के कारण धर्म और उससे संबंधित व्यवहार, व्याख्या और समझ में कट्टरता और मूढ़ता के तत्व हावी हो जाते हैं.
भारतीय धर्म और दर्शन में टीका और शास्त्रार्थ की बड़ी समृद्ध परंपरा रही है. दुर्भाग्य से इस परंपरा में लंबे समय से ठहराव का माहौल है. नयी पीढ़ी और नयी संवेदना के अनुरूप भाषा और रोचकता का समावेश करते हुए पट्टनायक उस ठहराव को तोड़ने में आवश्यक और महत्वपूर्ण हस्तक्षेप कर रहे हैं.
किस्सागोई यानी कथावाचन तथा प्रश्न और उत्तर के रूप में यह पुस्तक-प्रस्तुति रोचक, ज्ञानवर्द्धक और मनोरंजक भी है. टेलीविजन के कार्यक्रम को पुस्तक के तौर पर रचना भोला ‘यामिनी’ ने शानदार रूपांतरण किया है. इसे पेंग्विन बुक्स और मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है.
आज जब धार्मिकता और आध्यत्मिकता पर कट्टरता, सांप्रदायिकता और हिंसा का ग्रहण लगा हुआ है, ऐसे प्रयासों का भरपूर स्वागत होना चाहिए, ताकि शंकाओं और भ्रम का समुचित निवारण हो सके. ऐसी पुस्तकें अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचनी चाहिए, क्योंकि हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में धर्म और पौराणिकता का विशेष स्थान है.
अज्ञानता और अंधविश्वास के कोहरे से इतर उसके मर्म का स्पष्टीकरण हमारे जीवन, विचार और व्यवहार को बेहतर करने के लिए बहुत आवश्यक है. इस प्रक्रिया में देवदत्त पट्टनायक और उनकी पुस्तकें हमें सहयोग देती हैं.
प्रकाश के रे
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