समलैंगिकता अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Updated at : 06 Sep 2018 12:45 PM (IST)
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समलैंगिकता अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

<p>देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. इसके अनुसार आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा. </p><p>सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की […]

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<p>देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. इसके अनुसार आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा. </p><p>सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की.</p><p>धारा 377 को पहली बार कोर्ट में 1994 में चुनौती दी गई थी. 24 साल और कई अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अंतिम फ़ैसला दिया है.</p><h3>कोर्ट ने क्या कहा कहा?</h3> <ul> <li>चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि जो भी जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. </li> </ul> <ul> <li>उन्होंने कहा कि समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है. संवैधानिक पीठ ने माना कि समलैंगिकता अपराध नहीं है और इसे लेकर लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी.</li> </ul> <ul> <li>आत्म अभिव्यक्ति से इनकार करना मौत को आमंत्रित करना है.</li> </ul> <ul> <li>व्यक्तित्व को बदला नहीं जा सकता.</li> </ul> <ul> <li>यह खुद को परिभाषित करता है, यह व्यक्तित्व का गौरवशाली रूप है.</li> <li>शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या है. वास्तव में इसका मतलब था कि जो मायने रखता है वो महत्वपूर्ण गुण और मौलिक विशेषताएं हैं न कि किसी व्यक्ति को क्या कहा जाता है.</li> <li>नाम व्यक्ति की पहचान का एक सुविधाजनक तरीका हो सकता है लेकिन उसके गुण ही उसकी पहचान हैं.</li> </ul><h3>धारा 377</h3><p>इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया था.</p><p>भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध माना गया था. आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक, जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सज़ा या आजीवन कारावास का प्रावधान रखा गया था. इसमें जुर्माने का भी प्रावधान था और इसे ग़ैर ज़मानती अपराध की श्रेणी में रखा गया था.</p><p>इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को इसके विरोध में कई याचिकाएं मिलीं. आईआईटी के 20 छात्रों ने नाज़ फाउंडेशन के साथ मिलकर याचिका डाली थी. इसके अलावा अलग-अलग लोगों ने भी समलैंगिक संबंधों को लेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसमें ‘द ललित होटल्स’ के केशव सूरी भी शामिल हैं. </p><p>सुप्रीम कोर्ट को धारा-377 के ख़िलाफ़ 30 से ज़्यादा याचिकाएँ मिली.</p><p>याचिका दायर करने वालों में सबसे पुराना नाम नाज़ फाउंडेशन का है, जिसने 2001 में भी धारा-377 को आपराधिक श्रेणी से हटाए जाने की मांग की थी.</p><p><strong>(बीबीसी हिन्दी के </strong><a href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi">एंड्रॉएड ऐप</a><strong> के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें </strong><a href="https://www.facebook.com/BBCnewsHindi">फ़ेसबुक</a><strong> और </strong><a href="https://twitter.com/BBCHindi">ट्विटर</a><strong> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</strong></p>

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