''अब्बू गए कहाँ गए हैं जो घर नहीं लौटते''

Updated at : 04 Jun 2014 1:22 PM (IST)
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''अब्बू गए कहाँ गए हैं जो घर नहीं लौटते''

नितिन श्रीवास्तव बीबीसी संवाददाता, आज़मगढ़ से उत्तर प्रदेश राज्य में आज़मगढ़ ज़िले के कई ऐसे युवा हैं जिनके ख़िलाफ़ कथित चरमपंथी गतिविधियों से जुड़े होने के मामले दर्ज हैं. इन्हीं में से एक हैं रानी की सराय नाम के गाँव के पास रहने वाले हक़ीम तारिक़. अक्षरधाम: ‘मेरा नाम सुरेश, रमेश या … होता तो […]

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उत्तर प्रदेश राज्य में आज़मगढ़ ज़िले के कई ऐसे युवा हैं जिनके ख़िलाफ़ कथित चरमपंथी गतिविधियों से जुड़े होने के मामले दर्ज हैं.

इन्हीं में से एक हैं रानी की सराय नाम के गाँव के पास रहने वाले हक़ीम तारिक़.

अक्षरधाम: ‘मेरा नाम सुरेश, रमेश या … होता तो ये नहीं होता’

देवबंद से मौलवी की पढ़ाई करने के बाद तारिक़ ने मुज़फ्फरपुर से हक़ीम बनने की डिग्री प्राप्त की और अपने गांव में यूनानी दवाओं की दुकान चलाते थे.

उनके परिवार के मुताबिक़ हक़ीम तारिक़ को 12 दिसंबर, 2007 की शाम आज़मगढ़ की महमूदपुर चेक पोस्ट से पकड़ लिया गया.

हालांकि उनके परिवार में किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं मिली.

गुमशुदगी की एफ़आईआर दर्ज कराई गई, आला अफ़सरों के पास शिकायत दर्ज हुई लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला.

22 दिसंबर, 2007 को उत्तर प्रदेश पुलिस के स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने एक प्रेस वार्ता में जानकारी दी कि बाराबंकी ज़िले से हक़ीम तारिक़ और जौनपुर निवासी ख़ालिद मुजाहिद को असलहों के साथ गिरफ़्तार किया गया है.

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार इन दोनों का हाथ सितंबर, 2007 में लखनऊ, फैज़ाबाद और गोरखपुर की अदालतों में हुए बम धमाकों में था और दोनों प्रतिबंधित संगठन हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी यानी हुजी के लिए काम कर रहे थे.

लंबी लड़ाई

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आज़मगढ़ में हक़ीम तारिक़ का घर का पैतृक घर.

पिछले लगभग सात वर्षों से हक़ीम तारिक़ प्रदेश की विभिन्न जेलों में रह चुके हैं और इन दिनों उन्हें लखनऊ में अतिरिक्त सुरक्षा वाली जेल में रखा गया है.

तारिक़ के साथ गिरफ़्तार हुए जौनपुर के खालिद मुजाहिद की मई, 2013 में एक कोर्ट में पेशी के लिए ले जाते समय मौत हो गई थी.

‘देश के क़ानून के भरोसे रहा जेल में ज़िंदा’

ख़ालिद के परिवार वालों ने भी 2007 में बाराबंकी में गिरफ़्तारी के मामले को चुनौती देते हुए अदालत में कहा था कि ख़ालिद को जौनपुर के मढ़ियाहूँ से पकड़ा गया था और वो भी कई दिन पहले.

बहरहाल ख़ालिद की मौत के बाद उनके परिवार ने 42 पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करवाई है.

इधर हक़ीम तारिक़ के ख़िलाफ़ चार अदालतों में सुनवाई चल रही है.

उनके परिवार को मलाल इस बात का भी है कि उनमें से कोई भी सुनवाई में मौजूद नहीं रह पाता क्योंकि प्रक्रिया सुरक्षा कारणों से जेल के भीतर ही होती है.

परिवार

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हक़ीम तारिक़ के चाचा बताते हैं कि मुकदमे पर हर महीने तक़रीबन 50,000 रुपए ख़र्च होते हैं.

उनके गाँव में माता-पिता, बीवी और तीन छोटे बच्चे रहते हैं.

बहुत मनाने पर तारिक़ की पत्नी आयशा ने परदे के पीछे से बीबीसी हिन्दी से बात की.

उन्होंने कहा, "हमारे पति बहुत भले आदमी हैं, अपने बच्चों को प्यार करते थे. जब उन्हें पकड़ने को लेकर ही ग़लत बयानी हुई है तो कैसे मान लें वे गुनहगार हैं. जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया हमारी छोटी बेटी छह महीने की थी. अब सातवां साल पूरा करेगी लेकिन रोज़ पूछती है, अब्बू गए कहाँ हैं जो घर ही नहीं लौटते. क्या जवाब दें".

हक़ीम तारिक़ के हिरासत में रहने के अलावा परिवार पर एक लंबी क़ानूनी लड़ाई का ज़िम्मा भी आ गया है.

तारिक़ के चाचा मुमताज़ अहमद ने बताया, "हर महीने चार अदालतों में जिरह कराने में क़रीब 50,000 रुपए ख़र्च होते हैं. हमारे देश में ऐसे मामलों में वकील भी ढूंढना मुश्किल है. दो बार हमारे वकीलों पर हमले भी हुए हैं".

मामला

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हक़ीम तारिक़ के ससुर बताते हैं कि हक़ीम की गिरफ़्तारी के बाद उन्हें तीन-चार लाख रुपए की दवाइयाँ फेंकनी पड़ी.

हक़ीम तारिक़ और खालिद मुजाहिद के परिवारों ने सरकार से लगातार गुहार लगाई थी कि दोनों की ‘संदिग्ध’ जगहों पर गिरफ़्तारी की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

वर्ष 2008 में बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने जांच के लिए जस्टिस आरडी निमेश की अध्यक्षता वाले निमेश कमीशन का गठन किया जिसने मामले की दोबारा जांच की.

वर्ष 2012 में क़रीब 1,000 पन्नों वाली इस रिपोर्ट को प्रदेश सरकार को सौंप दिया गया.

उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं

लगभग 110 गवाहों और कागज़ी प्रमाण जमा करने वाले इस कमीशन ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े किए थे.

जून, 2013 में दबाव के बीच प्रदेश सरकार ने इस कमीशन के सुझावों को स्वीकार किया और अदालत में अपनी बात रखी.

फ़िलहाल मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँच चुका है और सरकार की आरोपों को वापस लेने की राय पर बहस जारी है.

विवाद

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हालांकि तमाम लोग ऐसे हैं जो मानते हैं कि केस में अब ज़्यादा दम नहीं बचा.

राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब इस मामले को संसद में भी उठा चुके हैं.

उन्होंने कहा, "ये तब की घटना है जब सुरक्षा एजेंसियां ताबड़तोड़ गिरफ़्तारियां कर रहीं थीं. कई दूसरे मामलों की तरह आज़मगढ़ के भी कुछ बेगुनाह इस ऑपरेशन की चपेट में आ गए."

आज़मगढ़ में ही हक़ीम तारिक़ की ससुराल भी है. उनके ससुर मोहम्मद असलम बताते हैं कि तारिक़ के जेल जाने के बाद से परिवार को तीन-चार लाख रुपए की तो दवाइयाँ फेंकनी पड़ी हैं जिनका प्रयोग हक़ीम अपनी क्लीनिक में करते थे.

‘मुसलमान न कभी डरा है, न कभी डरेगा’

उन्होंने बताया, "हमारे परिवारों पर जो बीती है हम ही जानते हैं. उम्मीद करते हैं कि केंद्र में आई नई सरकार ऐसे मामलों के निबटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखेगी".

क्योंकि मामला बहुत पुराना है और न्यायालय में है इसलिए ज़िला पुलिस ने इस पर टिप्पणी करने से मना कर दिया.

आज़मगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनंत देव ने कहा कि इस पर जांच एजेंसियां बेहतर जानकारी दे सकतीं हैं.

लेकिन हक़ीम तारिक़ के परिवार वालों में निमेश कमीशन की रिपोर्ट और अक्षरधाम मंदिर हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले के बाद उम्मीद की एक नई किरण ज़रूर जगा दी है.

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