तेलंगाना: क्या खोया और क्या पाया

Updated at : 03 Jun 2014 11:16 AM (IST)
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तेलंगाना: क्या खोया और क्या पाया

ज़ुबैर अहमद बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद/तेलंगाना से नया राज्य, नई सरकार, नया मुख्यमंत्री और एक नई शुरुआत. सूरज की पहली किरण के साथ ही तेलंगाना के लोगों के लिए वाकई एक नई सुबह हुई है. वो एक नए राज्य की आबोहवा में सांस ले रहे हैं. लेकिन सब कुछ नया होने के बावजूद भारत के इस […]

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नया राज्य, नई सरकार, नया मुख्यमंत्री और एक नई शुरुआत. सूरज की पहली किरण के साथ ही तेलंगाना के लोगों के लिए वाकई एक नई सुबह हुई है. वो एक नए राज्य की आबोहवा में सांस ले रहे हैं.

लेकिन सब कुछ नया होने के बावजूद भारत के इस 29वें राज्य में काफी कुछ पुराना और ख़ासा जाना और पहचाना भी है. ये नया राज्य तो है, लेकिन विशेषज्ञों के विचार में आंध्र प्रदेश की तुलना में अविभाजित राज्य की काफ़ी अहम चीज़ें नए राज्य की झोली में गिरी हैं.

उदाहरण के लिए अविभाजित आंध्र प्रदेश के गर्व और राजधानी हैदराबाद को लीजिए. अविभाजित राज्य का सबसे बड़ा शहर तेलंगाना के पास गया. कम से कम 40 फ़ीसदी राजस्व इसी शहर से आता है.

यह शहर आईटी और दवा कंपनियों का गढ़ है. अब ये तेलंगाना की राजधानी है. दस साल तक ये आंध्र प्रदेश की भी राजधानी रहेगा, लेकिन इसके बाद आंध्र प्रदेश को एक नई राजधानी बनानी पड़ेगी.

इसी तरह से आंध्र प्रदेश के वनों का लगभग 50 फीसदी हिस्सा तेलंगाना को गया है. कोयले के सभी भंडार तेलंगाना के हिस्से में आए हैं. कृष्णा और गोदावरी नदियों के उपजाऊ इलाक़ों का एक बड़ा हिस्सा तेलंगाना के पास है.

विशेष पैकेज की मांग

आंध्र प्रदेश के हिस्से में अधिक कुछ नहीं आया है. एक लंबे तटीय क्षेत्र के अलावा आंध्र में कोई ख़ास अहम इलाक़े नहीं शामिल किए गए.

शायद इसीलिए 8 जून को आंध्र के मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेने वाले चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र सरकार से विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की है.

हैदराबाद में रौनक और बेहतर बुनियादी ढांचा पहले निज़ाम और आज के दौर में नायडू की वजह से है.

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तेलंगाना वाले भी इसी तरह के एक विशेष आर्थिक पैकेज की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि ये एक नया राज्य है और इसके विकास के लिए पूंजी चाहिए.

आंध्र के लोग इस बात से ख़ुश नहीं है कि उनके राज्य मे ओडिशा से लगने वाले चार ऐसे ज़िले हैं जहाँ नक्सली सक्रिय हैं. तेलंगाना में अब ये समस्या बहुत कम है.

हैदराबाद से 40 किलोमीटर दूर एक दलित गाँव की एक लड़की ने कहा कि उसे नौकरी ज़रूर चाहिए, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तब भी वो तेलंगाना के अलग होने से काफी खुश हैं. उन्होंने कहा, "हम गर्व से अब अपने राज्य में सांस ले सकते हैं.”

काम आएगा नायडू का अनुभव

यहां के लोग ख़ुश नज़र आते हैं. उनकी ये मांग काफी पुरानी थी. जब 1956 में तेलंगाना को आंध्र प्रदेश में शामिल कर दिया गया तो उस समय स्थानीय लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया था.

इसके बाद 1969 में आंदोलन ने तूल पकड़ा और उसी साल इस आंदोलन में शामिल एक भीड़ पर गोलियां चलाई गईं, जिसमें 300 से अधिक आंदोलनकारी मारे गए थे.

आज उसी जगह पर एक स्मारक है, जहाँ लोगों की एक भारी संख्या नए राज्य बनने पर इकट्ठा हुई और जश्न मनाया गया.

उधर आंध्र प्रदेश को इस बँटवारे से काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा. एक तरह से नया राज्य आंध्र प्रदेश होगा क्योंकि इसे नए सिरे से एक राजधानी बनानी पड़ेगी और सब कुछ नए तरीके से करना पड़ेगा.

वैसे आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए चंद्र बाबू नायडू ने हैदराबाद में बुनियादी ढांचे को सही करने के लिए काफी काम किए हैं. उनके अनुभव की काफ़ी ज़रूरत पड़ेगी.

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