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...जब ''सत्ता का लालची'' कहने पर भड़क गये थे वाजपेयी, जानिये भारत रत्न से जुडीं 11 खास बातें...

Updated at : 16 Aug 2018 6:57 PM (IST)
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...जब ''सत्ता का लालची'' कहने पर भड़क गये थे वाजपेयी, जानिये भारत रत्न से जुडीं 11 खास बातें...

नयी दिल्ली : पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं रहे. उन्होंने अपने जीवन में न केवल खुद के लिए, बल्कि भारतीय राजनीति और मानवता के लिए भी एक नये रास्ते गढ़े और कीर्तिमान स्थापित किये. राजनीति और अपने जीवन के संस्कार में वे जितने सख्त और संस्कारी थे, उतने […]

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नयी दिल्ली : पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं रहे. उन्होंने अपने जीवन में न केवल खुद के लिए, बल्कि भारतीय राजनीति और मानवता के लिए भी एक नये रास्ते गढ़े और कीर्तिमान स्थापित किये. राजनीति और अपने जीवन के संस्कार में वे जितने सख्त और संस्कारी थे, उतने ही वे हरफनमौला भी थे. एक समय वह भी था, जब राजनीति में उन्हें सत्ता का लालची भी कहा गया था. इस आरोप पर उन्होंने करारा जवाब दिया.

पार्टी तोड़ कर सरकार बनानी पड़ी, तो ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन के कई ऐसे प्रसंग हैं, जो लोगों को आज भी प्रेरित करते हैं. ऐसा ही एक प्रसंग है कि जब उनके ऊपर सत्ता का लालची होने का आरोप लगा था. इसके जवाब में उन्होंने संसद में कहा था कि मुझे ‘सत्ता का लालची’ बताया गया है. सदन में अटल जी ने कहा था कि मुझ पर आरोप लगाया गया है. आरोप यह है कि मुझे सत्ता का लोभ हो गया है और मैंने पिछले 10 दिन में जो कुछ किया है, वह सब सत्ता के लोभ के कारण किया है.

अभी थोड़ी देर पहले मैंने उल्लेख किया कि 40 साल से सदन का सदस्य हूं. सदस्यों ने मेरा व्यवहार देखा है. मेरा आचरण देखा है. जनता दल के मित्रों के साथ मैं सत्ता में भी रहा हूं. कभी हम सत्ता के लोभ से गलत काम करने के लिए तैयार नहीं हुए. गठबंधन कर के अगर सत्ता हाथ में आती है तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा.

उन्होंने आगे कहा कि यहां शरद पवार और जसवंत सिंह दोनों बैठे हैं. जसवंत सिंह कह रहे थे कि किस तरह से शरद पवार ने अपनी पार्टी तोड़कर मेरे साथ सरकार बनायी थी. सत्ता के लिए बनायी थी या महाराष्ट्र के भले के लिए बनायी थी, यह अलग बात है कि उन्होंने अपनी पार्टी तोड़कर मेरे साथ सहयोग किया. मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया. बार-बार चर्चा में यह सुनायी दिया है कि वाजपेयी तो अच्छे हैं, लेकिन उनकी पार्टी ठीक नहीं है. उनके इस बयान पर सदन में मौजूद सांसदों ने कहा कि यह सही बात है.

इसके बाद वाजपेयी जी ने आगे कहा कि पार्टी तोड़कर सत्ता के लिए नया गठबंधन कर के अगर सत्ता हाथ में आती है तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा. भगवान राम ने कहा था कि मैं मृत्यु से नहीं डरता. डरता हूं तो बदनामी से डरता हूं.

कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में कहा जाता है कि वे कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे और अपनी राजनीति के आरंभ में वे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े. इसी बात को लेकर वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा ने एक इंटरव्यू के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी से कम्युनिस्ट वाली बात को लेकर सवाल किया. इस पर उन्होंने साफ तौर पर कहा कि एक बालक के नाते मैं आर्यकुमार सभा का सदस्य बना. इसके कुछ समय बाद मैं आरएसएस के संपर्क में आया था. कम्युनिज्म को मैंने एक विचारधारा के रूप में पढ़ा और इससे सीखा है. मैं अधिकारिक रूप से कभी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं रहा, लेकिन छात्र आंदोलन में मेरी हमेशा रुचि थी, क्योंकि कम्युनिस्ट एक ऐसी पार्टी थी, जो छात्रों को संगठित करके आगे बढ़ती थी. इसलिए छात्र जीवन में उनके के संपर्क में आया और कॉलेज की छात्र राजनीति में भाग लिया.

अमिताभ बच्चन पर भी साधा था निशाना, रेखा पर ली थी चुटकी

अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान एक कुशल वक्ता के तौर पर रही है. शब्दों के चुटीले बाण चलाने में वे निपुण थे. बात 1987 की है. अमिताभ बच्चन साल 1984 में उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद संसदीय सीट से जीत कर लोकसभा में आये थे, लेकिन तीन साल बाद यानी 1987 में बोफोर्स घोटाले में अमिताभ का नाम सामने आने से राजनीतिक गलियारे में सनसनी मच गयी. घोटाले में नाम आने के बाद अमिताभ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

अमिताभ के इस्तीफे के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के साथ एक साक्षात्कार के दौरान बोफोर्स घोटाले में अमिताभ बच्चन का नाम सामने आने को लेकर सवाल पूछा गया, तो अटल जी ने कहा कि, ‘उनके विरुद्ध भी आरोप लगे. विशेषकर उनके भाई के विरुद्ध. वह भारत में अपना फैला हुआ धंधा छोड़कर अचानक स्विट्जरलैंड चले गये. क्यों चले गये? वहां वह क्या कर रहे हैं?

बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उन बच्चों की फीस कैसे दी जा रही है? ये सवाल पार्लियामेंट में और पार्लियामेंट के बाहर उठे हैं. कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया. इससे प्रधानमंत्री की छवि धूमिल हुई है. शायद प्रधानमंत्री को बचाने के लिए अमिताभ बच्चन ने इस्तीफा दिया हो.

इतना ही नहीं अमिताभ बच्चन पर निशाना साधते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने मशहूर अभिनेत्री रेखा पर चुटकी ली और कहा था कि चुनाव से पहले मुझसे पूछा गया था कि यदि अमिताभ बच्चन आपके खिलाफ उतरेंगे, तो आप क्या करेंगे? इस पर मैंने कहा कि मुझे रेखा से प्रार्थना करनी होगी कि वह हमारी तरफ से चुनाव लड़ें. मैं अभिनेताओं का तो सामना नहीं कर सकता. अभिनेताओं से दोस्ती करना अच्छा है, लेकिन उस दोस्ती से राजनीति खराब करना अच्छा नहीं है.

वाजपेयी जी ने 25 बार देखी थी फिल्म ‘सीता और गीता’

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को फिल्म देखने का भी शौक था. अटल बिहारी वाजपेयी को अभिनेत्री हेमा मालिनी की एक फिल्म ‘सीता और गीता’ इतनी भायी कि उन्होंने इस फिल्म को 25 बार देख डाला. इस फिल्म में हेमा मालिनी ने सीता और गीता दोनों का रोल प्ले किया था. इसी कारण उन्हें यह फिल्म पसंद आयी.

वाजपेयी की हाजिरजवाबी और चुटीले अंदाज का जवाब नहीं

कश्‍मीर मसले पर एक बार मजाकिया अंदाज में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में उन्‍होंने कहा था कि भारत और पाकिस्तान को साथ लाने का एक तरीका यह हो सकता है कि दोनों देशों में सिंधी बोलने वाले प्रधानमंत्री हो जायें. पाकिस्तान में तो हो गया, पर भारत में मेरी इच्‍छा पूरी होनी बाकी है. उनका इशारा किसी और की ओर नहीं, बल्कि लालकृष्‍ण आडवाणी की ओर था. आडवाणी सिंधी हैं.

मैं तो औरों के दलदल में अपना कमल खिलाता हूं.

एक टीवी शो में उनसे पूछा गया कि कहा जाता है भाजपा में दो दल हैं- नरम दल और गरम दल. एक अटल का दल और एक आडवाणी का. इस पर उन्‍होंने जवाब देते हुए कहा कि जी नहीं, मैं किसी दलदल में नहीं हूं. मैं तो औरों के दलदल में अपना कमल खिलाता हूं.

मैं तो अपने आपको आपके सवालों से बचाने आया हूं

जब गुजरात दंगों के दौरान अटल बिहारी राज्‍य के दौरे पर गये थे, तो प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आप मुख्यमंत्री को बचाने आये हैं या भाजपा की सरकार को बचाने आये हैं? उन्‍होंने जवाब दिया कि मैं तो अपने आपको आपके सवालों से बचाने आया हूं.

इंदिरा के पांच मिनट में बाल तो संवारने पर उठाया सवाल

एक बार सदन में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि वह जनसंघ जैसे संगठन से पांच मिनट में निपट सकती हैं. वाजपेयी की बोलने की बारी आयी, तो उन्‍होंने कहा कि प्रधानमंत्री की यह भाषा कैसी है? यह लोकतांत्रिक कही जा सकती है क्‍या? वह पांच मिनट में अपने बाल नहीं संवार सकतीं और जनसंघ से निबटने की बात करती हैं.

यार तुम श्मशान में हो, मैं तेरे से क्या बात करूं

नरेंद्र मोदी के गुजरात का सीएम बनने की कहानी के बारे में खुद नरेंद्र मोदी बताते हैं कि अचानक गुजरात में सीएम की जिम्मेदारी आ गयी. मुझे याद है, जब मुझे मुख्यमंत्री का दायित्व मिला था, तो अटल जी प्रधानमंत्री थे. उनका टेलिफोन आया. बोले- कहां हो? मैंने उनको कहा, मैं श्मशान में हूं, तो वह हंस पड़े. बोले- यार तुम श्मशान में हो, मैं तेरे से क्या बात करूं.

होली में मोदी के साथ किया था डांस, लगाये थे ठुमके

यूट्यूब पर एक वीडियो में नरेंद्र मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी साथ डांस करते नजर आते हैं. यह वीडियो 9 मार्च, 1999 का है. मौका था होली का. वाजपेयी ने होली मिलन समारोह का आयोजन किया था. ढोल-मजीरे बज रहे थे. पहले तो वाजपेयी अकेले कुछ देर तक थिरकते रहे. इसके बाद उनके साथ आये विजय गोयल. इसके बाद नरेंद्र मोदी आये और दोनों ने खूब ठुमके लगाये.

वाजपेयी के लिए दिलीप कुमार ने की थी नवाज से बात, शराफत में रहने की दी थी सलाह

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार के आपसी रिश्ते काफी अच्छे थे. कारगिल युद्ध के दौरान दिलीप कुमार ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जमकर फटकार लगायी थी. उन्होंने शरीफ को ‘शराफत’ में रहने की नसीहत तक दे डाली. इस बात का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब ‘हार नहीं मानूंगा-अटल एक जीवन गाथा’ में किया गया है.

कारगिल घुसपैठ से नाराज वाजपेयी ने दिलीप कुमार से नवाज शरीफ के व्यवहार के प्रति दुख व्यक्त किया था. इससे गुस्साये दिलीप कुमार ने खुद नवाज शरीफ से फोन पर बात की थी. पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी की किताब ‘नीदर ए हॉक नॉर ए डव’ के मुताबिक, वाजपेयी ने जब शरीफ को शिकायत भरा फोन किया, तो अचानक उन्होंने रिसीवर दिलीप कुमार को पकड़ा दिया. दिलीप कुमार की अवाज सुनकर नवाज शरीफ भी घबरा गये, मगर दिलीप ने शिकायत भरे लहजे में तत्कालीन पीएम नवाज से कहा कि मियां साहिब, आपने हमेशा अमन का बड़ा समर्थक होने का दावा किया है, इसलिए हम आपसे जंग की उम्मीद नहीं करते. तनाव के माहौल में भारत के मुसलमान बहुत असुरक्षित हो जाते हैं. इसलिए हालात को काबू में करने के लिए कुछ कीजिये. शराफत में रहिये.’

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