VIDEO: आज भी अनसुलझी पहेली है तिरुलडीह गोलीकांड, पुलिस के जुल्म के बाद बदली झारखंड की राजनीति

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1982 को क्षेत्र में भयंकर सुखाड़ पड़ा था. पुलिस जुल्म चरम पर था, ऐसे में छात्र नौजवान सुखाड़ घोषित करने की मांग समेत कई मांगो को लेकर आंदोलन कर रहे थे. अचानक गोली चलने की आवाज सुनाई दी. जिसमें अजीत और धनंजय महतो शहीद हो गए. घटना के बाद पूरे क्षेत्र में सन्नाटा पसर गया.

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21 अक्टूबर को हर साल कुकड़ू प्रखंड के तिरुलडीह सहित राज्य के कई स्थानों में शहीद अजीत और धनंजय महतो का शहादत दिवस मनाया जाता है. शहादत दिवस में मंत्री, नेता सभी शामिल होते हैं. शहीद परिवार के लिए कई वायदे भी किये जाते हैं, लेकिन यह सब सिर्फ मंच तक ही सिमित रहता है. कई बार सरकार शहीद परिवार को नौकरी का आश्वासन मिला है, अखबारों में खबरें भी छपीं, लेकिन आजतक ना तो उन्हें सरकारी नौकरी मिली है, ना ही कोई मुआवाजा राशि और न ही शहीद का दर्जा. शहीद के नाम पर उनके परिवार को किसी तरह का सम्मा�� या प्रशस्ति पत्र भी नहीं दिया गया है. झारखंड अलग राज्य बनने के बाद साल 2007 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की घर आकर शहीद परिवार से मिले थे और मंत्रीजी ने शहीद के बेटे उपेन महतो के सारे प्रमाणपत्र लिये और शिक्षा विभाग में नौकरी दिलाने का वादा किया., लेकिन वो घोषणा भी घोषणा ही रह गई. इसके कारण शहीद परिवार के लोग आज तक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. तिरुलडीह में 21 अक्टूबर 1982 को हुए गोली कांड की घटना अब भी एक अनसुलझी पहेली बनकर रह गई है. बता दें कि 21 अक्टूबर साल 1982 में ईचागढ़ प्रखंड के तत्कालीन मुख्यालय तिरुलडीह में शांतिपूर्वक धरना दे रहे क्रांतिकारी छात्र युवा मोर्चा के सदस्यों पर पुलिस ने निर्ममता के साथ गोली चला दी थी, जिससे दो छात्र अजीत महतो और धनंजय महतो शहीद हो गए. बताया जाता है कि साल 1982 में क्षेत्र में भयंकर सुखाड़ पड़ा था. पुलिस का जुल्म चरम पर था.

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