झारखंड के किसानों को आत्मनिर्भर बना रहा औषधीय गुणों से भरपूर शकरकंद, बनते हैं कई स्वादिष्ट व्यंजन

झारखंड का शकरकंद आज पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा सहित कई प्रदेशों में जाता है. जी हां, रामगढ़ जिला के गोला, दुलमी, चितरपुर क्षेत्र में शकरकंद की खेती करके किसान अच्छी-खासी आमदनी कर रहे हैं और आत्मनिर्भर बन रहे हैं. गोला प्रखंड क्षेत्र के पूरबडीह, कोरांबे, लिपिया, सरला, बरियातू, बेटुल, कुम्हरदगा, सोनडीमरा, नावाडीह में बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती ह.
रजरप्पा (सुरेंद्र कुमार/शंकर पोद्दार) : जिस समय बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य अस्तित्व में आया था, उस समय एक गीत काफी प्रचलित हुआ था. मिसरी-मलाई खइलू, कइलू तन बुलंद… अब खइह शकरकंद… अलग भइल झारखंड अब खइह शकरकंद. इस गीत के विपरीत आज शकरकंद की खेती कर झारखंड के किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं. यही शकरकंद बिहार में भी बड़े चाव से लोग खाते हैं.
झारखंड का शकरकंद आज पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा सहित कई प्रदेशों में जाता है. जी हां, रामगढ़ जिला के गोला, दुलमी, चितरपुर क्षेत्र में शकरकंद की खेती करके किसान अच्छी-खासी आमदनी कर रहे हैं और आत्मनिर्भर बन रहे हैं. गोला प्रखंड क्षेत्र के पूरबडीह, कोरांबे, लिपिया, सरला, बरियातू, बेटुल, कुम्हरदगा, सोनडीमरा, नावाडीह में बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती ह.
दुलमी और चितरपुर प्रखंड के इचातु, लोलो, बगरई, चटाक, होन्हें, कुल्ही, बयांग, मारंगमरचा, बोरोबिंग, बड़कीपोना, छोटकीपोना के अलावे सभी गांवों में कमोबेश शकरकंद की खेती होती है. प्रतिदिन इन क्षेत्रों से कम से कम 10 ट्रक शकरकंद विभिन्न राज्यों में भेजे जा रहे हैं. शुरू में किसानों ने 25 से 30 रुपये प्रति किलो की दर से शकरकंद की बिक्री की. अब इसकी कीमत 10 रुपये किलो तक गिर गयी है.
किसानों की मानें, तो पूरे क्षेत्र में एक सीजन में लगभग 20 हजार टन शकरकंद की उपज हो जाती है. शकरकंद की फसल से इस क्षेत्र के किसान लाखों रुपये कमा रहे हैं. इनकी आर्थिक स्थित तो सुदृढ़ हो ही रही है, किसान कई लोगों को खेत में रोजगार दे रहा है, तो कई लोगों को उपज के बाद शकरकंद बेचकर उसमें मुनाफा कमाने का भी अवसर दे रहा है.
शकरकंद की बढ़ती मांग को देखते हुए गोला प्रखंड अंतर्गत बेटुलखुर्द के किसान महेंद्र प्रसाद ने तीन एकड़ भूमि लीज पर लिया. इस वर्ष उन्होंने 200 क्विंटल शकरकंद उपजाये और उसकी बिक्री की. इससे उन्होंने हजारों रुपये आय की आमदनी हुई. इसी तरह दुलमी के बयांग निवासी मनोज महतो ने भी 110 क्विंटल शकरकंद बेचकर अच्छी-खासी कमाई की. टोनागातू निवासी रवींद्र महतो की खेतों से 90 क्विंटल शकरकंद निकले. रामसेवक महतो ने कहा कि लॉकडाउन के कारण इस बार खेती कम हुई. फसल की उचित कीमत भी नहीं मिल रही.
कृषक कृष्णा दांगी ने कहा कि यहां के शकरकंद को दूसरे प्रदेशों में भेजा जाता है. शकरकंद का उपयोग कई चीजों में किया जाता है. अगर इस पर आधारित उद्योग रामगढ़ जिला में लग जाये, तो स्थानीय किसानों के साथ-साथ यहां के लोगों को भी इसका फायदा होगा.
शकरकंद में कैलोरी और स्टार्च की मात्रा सामान्य होती है. भरपूर मात्रा में विटामिन बी पाया जाता है, जो शरीर में होमोसिस्टीन नामक अमिनो एसिड के स्तर को कम करने में सहायक होता है. यह विटामिन डी का बहुत अच्छा सोर्स है. शकरकंद में भरपूर मात्रा में आयरन होता है. डायबिटीज, कैंसर, अस्थमा, गठिया, हृदय रोग आदि बीमारी को होने से रोकता है. इतना ही नहीं, इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता है, तो वजन बढ़ाने और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने में भी सहायक साबित होता है. इससे पाचन तंत्र सुधरता है. बालों व त्वचा के लिए भी शकरकंद फायदेमंद है. शकरकंद से कई प्रकार की सब्जियां बना सकते हैं. इसका हलवा भी बनता है.
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शकरकंद का वानस्पतिक नाम ईपोमोइया बटाटस है. यह फसल मुख्य रूप से अपने मीठे स्वाद और स्टार्ची जड़ों के लिए जाना जाता है. इसकी गांठें बीटा-केरोटीन की स्रोत होती हैं. एंटी-ऑक्सीडेंट के रूप में प्रयोग की जाती है. शकरकंद में बहुत सारे पौष्टिक तत्व जैसे कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, विटामीन-सी, विटामीन-बी, फास्पोरस पाये जाते हैं. इसका उपयोग सिरा, सिरका, आटा, स्टार्च, पेक्टिन में किया जाता है. भारत के कई राज्यों में इसकी खेती होती है.
Posted By : Mithilesh Jha
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