धनबाद के SNMMCH बदहाल, इलाज की उम्मीद में पहुंचे मरीज की जेब कटवा देते हैं चिकित्सक

Updated at : 11 Nov 2022 8:57 AM (IST)
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धनबाद के SNMMCH बदहाल, इलाज की उम्मीद में पहुंचे मरीज की जेब कटवा देते हैं चिकित्सक

धनबाद के SNMMCH में कई चिकित्सक बेहतर इलाज का झांसा देकर प्राइवेट अस्पताल व चिकित्सकों के पास मरीज को जाने के लिए तैयार कर देते हैं. हद तो यह है कि जब मरीज या उनके परिजन बात नहीं मानते तो उन्हें बेहतर इलाज के नाम पर रेफर कर दिया जाता है.

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कोयलांचल का सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य केंद्र शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (SNMMCH) जहां गरीब मरीजों के लिए वरदान है. वहीं अपने ही कुछ लोगों के कारण बदनाम भी हाेता है. आज की कड़ी में पढ़े रेफर व जांच के नाम पर परेशान करने के खेल के संबंध में. जानकारों व प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई चिकित्सक मेडिकल कॉलेज अस्पताल की जांच को मानने से इनकार कर बाहर निजी जांच केंद्रों में भेजने की जुगत लगाने से बाज नहीं आते, तो दूसरी ओर कई चिकित्सक बेहतर इलाज का झांसा देकर प्राइवेट अस्पताल व चिकित्सकों के पास मरीज को जाने के लिए तैयार कर देते हैं. हद तो यह है कि जब मरीज या उनके परिजन बात नहीं मानते तो उन्हें बेहतर इलाज के नाम पर रेफर कर दिया जाता है. प्रभात खबर की टीम ने इसकी पड़ताल गुरुवार को ओपीडी पहुंच कर की, तो कई सच सामने आये.

रेजिडेंट डॉक्टरों के भरोसे दोपहर की ओपीडी :

एसएनएमएमसीएच में दोपहर के वक्त संचालित होने वाली ओपीडी गुरुवार को रेजिडेंट डॉक्टर के भरोसे संचालित हुई. दोपर तीन बजे से शाम छह बजे तक चलने वाली ओपीडी में ड्यूटी निर्धारित होने के बावजूद एक भी सीनियर डॉक्टर नहीं पहुंचे. अस्पताल के जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर ओपीडी पहुंचे मरीजों का इलाज करते दिखे. चिकित्सा कर्मियों से पूछने पर पता चला की दोपहर के ओपीडी के वक्त कभी कभार ही सीनियर डॉक्टर पहुंचते है. सुबह ओपीडी समाप्त होने के बाद ज्यादातर डॉक्टर चले जाते हैं.

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जांच घर मरीज भेजने के नाम पर देते हैं कमीशन

ओपीडी में तैनात कुछ चिकित्सा कर्मियों से पूछताछ करने पर पता चला कि विभिन्न लैब संचालकों द्वारा जांच के लिए मरीज भेजने पर चिकित्सक व चिकित्सा कर्मियों को कमिशन देते है. जांच की राशि जितनी ज्यादा उतनी उसके हिसाब से कमिशन फिक्स है. यही वजह है कि कुछ चिकित्सकों के साथ अस्पताल के चिकित्साकर्मी भी मरीजों को लैब तक पहुंचाने में मद्द करते है.

समय का पालन नहीं करना भी बड़ा कारण

एसएनएमएमसीएच के डॉक्टर समय से पहले ही चले जाते हैं. यह काफी पुरानी समस्या है. चिकित्सक. अस्पताल से ज्यादा अपने प्राइवेट अस्पताल में देते हैं समय. यही वजह है कि दोपहर के ओपीडी के वक्त कोई भी सीनियर डॉकटर चेंबर में नहीं दिखते.

पुरजा लिखने में भी गड़बड़ी

पुरजा लिखने में भी चिकित्सक गड़बड़ी करते हैं. कई बार के निर्देश के बाद भी स्पष्ट लिखा नहीं होता. एनएमसी व एमसीआइ के गाइडलाइन के अनुसार डॉक्टरों को दवा की पर्ची हमेशा स्पष्ट लिखनी है. पर्ची में दवा का नाम स्पष्ट होना जरूरी है. नियम के अनुसार डॉक्टरों को कैपिटल लेटर में दवा की पर्ची लिखनी है, ताकि दवा दुकानदार के साथ मरीज भी आसानी से इसे पढ़ सकें.

जेनेरिक की उपेक्षा गरीब की शामत

अस्पताल में कई डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक दवाओं की उपेक्षा की जा रही है. अस्पताल के जनऔषधि केंद्र में 200 से ज्यादा प्रकार की दवाएं उपलब्ध है. बावजूद डॉक्टरों द्वारा नहीं लिखा जाता. ऐसे में किसी बीमारी के लिए पांच से दस रुपये में मिलने वाली दवाओं के लिए गरीब मरीजों को सौ से दो सौ रुपये तक चुकाना पड़ता है.

अधीक्षक ने रिसीव नहीं किया कॉल, मैसेज का नहीं दिया जवाब

समस्या के बारे में एसएनएमएमसीएच के अधीक्षक डॉ अरुण कुमार बरनवाल से मोबाइल के जरिए संपर्क किया गया. लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया. बाद में मैसेज भी किया गया. इसका भी उनके द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया.

बेहाल-ए-एसएनएमएमसीएच

अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ रहती है. मरीज की संतुष्टि व उनकी बीमारी की जानकारी के लिए चिकित्सक को एक मरीज को कम से कम चार से पांच मिनट का समय देना चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है. वहीं दूसरी ओर एमआर के लिए चिकित्सक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. इस वजह से सबको परेशानी होती है.

केस-वन

पेट में दर्द की शिकायत के बाद गुरुवार को गिरिडीह के रहने वाले बबलू गुप्ता एसएनएमएमसीएच की ओपीडी पहुंचे. मेडिसिन विभाग में डॉक्टर से चिकित्सीय परामर्श ली. डॉक्टर ने जांच के उपरांत उनको अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी. इसके लिए एक निजी नर्सिंग होम का पता दिया.

केस-02

सरायढेला निवासी भास्कर मंडल अपने गले का इलाज करने अस्पताल के इएनटी विभाग पहुंचे. डॉक्टर ने पहले तो उन्हें ब्लड जांच और अल्ट्रासाउंड कराने को कहा. उन्होंने अस्पताल में पीपीपी मोड पर संचालित लैब में ब्लड जांच व अल्ट्रासाउंड कराया. आठ नवंबर को रिपोर्ट दिखाने पर एक निजी लैब का नाम बताया. दोबारा जांच कराकर आने को कहा. डॉक्टर के इस रवैया से भास्कर बिना इलाज कराये ही लौट गये.

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