केके बिरला फाउंडेशन ने इस वर्ष का बिहारी पुरस्कार डाॅ माधव हाड़ा को दिये जाने की घोषणा की

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 29 Sep 2022 8:21 PM

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बिहारी पुरस्कार के रूप में एक प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और ढाई लाख रुपये की राशि भेंट की जाती है. यह पुरस्कार महाकवि बिहारी के नाम पर प्रतिवर्ष दिया जाता है. केके बिरला फाउंडेशन द्वारा यह पुरस्कार राजस्थान के हिंदी और राजस्थानी लेखकों को दिया जाता है.

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केके बिरला फाउंडेशन ने 32वें बिहारी पुरस्कार की घोषणा कर दी है. वर्ष 2022 में यह पुरस्कार राजस्थान के प्रसिद्ध लेखक डाॅ माधव हाड़ा की साहित्यिक आलोचना कृति ‘पचरंग चोला पहर सखी री’ को दिया जा रहा है. माधव हाड़ा की पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2015 में हुआ था. माधव हाड़ा साहित्यिक आलोचक के रूप में जाने जाते हैं. उनका जन्म 1958 में हुआ है.

पुरस्कार के रूप में दी जाती है ढाई लाख रुपये तक की राशि

बिहारी पुरस्कार के रूप में एक प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और ढाई लाख रुपये की राशि भेंट की जाती है. यह पुरस्कार महाकवि बिहारी के नाम पर प्रतिवर्ष दिया जाता है. केके बिरला फाउंडेशन द्वारा यह पुरस्कार राजस्थान के हिंदी और राजस्थानी लेखकों को दिया जाता है. यह पुरस्कार पिछले दस वर्ष में प्रकाशित हिंदी अथवा राजस्थानी कृति के लिये दिया जाता है.

निर्णायक समिति करती है बिहारी पुरस्कार का चयन

बिहारी पुरस्कार का चयन एक निर्णायक समिति करती है. इस समिति के अध्यक्ष हेमंत शेष हैं. इस निर्णायक समिति के अन्य सदस्य हैं मुरलीधर वैष्णव, मनीषा कुलश्रेष्ठ, अंबिका दत्त, डाॅ इंदुशेखर तत्पुरुष एवं डाॅ सुरेश ऋतुपर्ण . इस पुरस्कार की शुरुआत 1991 में हुई थी.

अब तक बिहारी पुरस्कार पाने वालों की सूची

1991 में यह पुरस्कार डाॅ जयसिंह नीरज को उनकी कृति ढाणी का आदमी के लिए दिया गया था. 1992 में नंद चतुर्वेदी को, 1993 में हरीश भादानी, 1994 में डाॅ नंदकिशोर आचार्य, 1995 में डाॅ हमीमुल्ला, 1996 में विजेंद्र, 1997 में ऋतुराज, 1998 में डाॅ विश्वम्भरनाथ, 1999 में डाॅ प्रभा खेतान, 2000 बशीर अहमद मयूख, 2001 प्रो कल्याणमल लोढ़ा, 2002 विजयदान देथा, 2003 में यह पुरस्कार नहीं दिया गया. 2004 में यह पुरस्कार मरुधर मृदुल, 2005 में पुरस्कार नहीं दिया गया. 2006 में यह पुरस्कार अलका सरावगी को दिया गया. 2007 में यशवंत व्यास, 2008 में नंद भारद्वाज, 2009 में हेमंत शेष, 2010 में गिरधर राठी, 2011 में अर्जुनदेव चारण, 2012 में हरीराम मीणा, 2013 में चंद्रप्रकाश देवल, 2014 में ओम थानवी, 2015 में डाॅ भगवतीलाल व्यास, 2016 में डाॅ सत्यनारायण, 2017 में विजय वर्मा, 2018 में मनीषा कुलश्रेष्ठ, 2019 में डाॅ आईदान सिंह भाटी, 2020 में मोहनकृष्ण बोहरा एवं 2021 में मधु कांकरिया को यह पुरस्कार दिया गया.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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