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Jharkhand: बहरागोड़ा के तीन हजार साल पुराने चित्रेश्वर धाम में खंडित शिवलिंग की होती है पूजा, उमड़ी भीड़

Updated at : 18 Jul 2022 12:58 PM (IST)
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Jharkhand: बहरागोड़ा के तीन हजार साल पुराने चित्रेश्वर धाम में खंडित शिवलिंग की होती है पूजा, उमड़ी भीड़

पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला अनुमंडल के बहरागोड़ा प्रखंड से 13 किलोमीटर दूर है चित्रेश्वर धाम. इसे कोल्हान प्रमंडल का बाबा धाम के नाम से भी जाना जाता है. यहां भगवान भोलेनाथ की खंडित शिवलिंग है. जिसकी लाखों श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं. सावन के पहले सोमवार को बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे.

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East Singhbhum News: कोरोना संक्रमण काल के कारण दो वर्ष के बाद बहरागोड़ा के चित्रेस्वर बाबा धाम में रौनक़ लौट आयी है. श्रावण माह की पहली सोमवारी को बाबा भोलेनाथ की पूजा अर्चना व जलाभिषेक के लिए श्रद्धालु शिवभक्त कांवड़ियों का आज सुबह से तांता लगा रहा. शिवभक्तों में भारी उत्सास देखने को मिला. वहीं दो वर्षों से बंद श्रावणी मेले में भी लगे. विभिन्न प्रकार के दुकानो में भी रौनक देखने को मिल रहा है.

बहरागोड़ा प्रखंड से 13 किमी दूर है चित्रेश्वर धाम

पूर्बी सिंहभूम जिले के घाटशिला अनुमंडल के बहरागोड़ा प्रखंड से 13 किलोमीटर दूर है चित्रेश्वर धाम. इसे कोल्हान प्रमंडल का बाबा धाम के नाम से भी जाना जाता है. यहां भगवान भोलेनाथ की खंडित शिवलिंग है. जिसकी लाखों श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं. इनपर लाखों श्रद्धालुओं को अटूट विश्वास है. ऐसे तो बाबा भोलेनाथ की पूजा सालों भर चलती है, लेकिन सावन के महीने में यहां भोले बाबा के भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है. चित्रेश्वर की हरी-भरी वादियों के बीच महादेव साल धाम में सावन के महीनें में केसरिया वस्त्र धारण किये कांवरियों और श्रद्धालुओं की भीड़ देखते बनती है. बोल बम और बाबा भोलेनाथ की जय-जयकार से पूरा इलाका एक महीने तक गूंजता रहता है. लोगों की आस्था इतनी गहरी है कि हर वर्ष महादेव साल में श्रद्धालुओं का भीड़ बढ़ती जा रही है.

तीन हजार साल पुराना है चित्रेश्वर धाम

इस मंदिर को लेकर ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है. बुजुर्ग और मंदिर के पुजारी परिवार के बुजुर्ग सदस्यों के मुताबिक इस मंदिर का इतिहास 3000 साल पुराना है. इस मंदिर का शिवलिंग देश का सबसे बड़ा प्राकृतिक शिवलिंग है. इसका वर्णन ओड़िया स्कंद पुराण में भी है. शिवलिंग का ऊपरी भाग 2 भाग में विभक्त है, कहा जाता है कि आजादी के पूर्वोत्तर क्षेत्र धालभूम स्टेट के अधीन हुआ करता था. वहीं पश्चिम बंगाल के गोपीबल्लबपुर में बंगाल के शासक राज्य करते थे. मंदिर पर वर्चस्व को लेकर दोनों स्टेट के राजाओं के बीच विवाद और युद्ध की स्थिति उत्पन्न होने कारण शिवलिंग आप रूपी दो भागों में विभक्त हो गया है. यहां भी दंत कथा सुनी जाती है कि पूजा को लेकर ब्राह्मणों में हुए विवाद के कारण शिवलिंग सत दो भागों में विभक्त हो गया है. तब से यहां खंडित शिवलिंग की पूजा होती आ रही है.

पर्यटन स्थल का मिला दर्जा

तत्कालीन विधायक डॉ दिनेश सारंगी के कार्यकाल में इस मंदिर को पर्यटन स्थल का दर्जा मिला. पर्यटन विभाग की ओर से विकास कार्य भी शुरू हुए, मगर विकास की कहानी अधूरी रह गई है. इसका गवाह मंदिर परिसर में प्रवेश का अधूरा मुख्य द्वारा है. वहीं बनाया गया शौचालय और दुकान के शेड सब बेकार पड़े हुए हैं.

यात्री सुविधाओं की है दरकार

इस मंदिर परिसर में यात्री सुविधाओं का घोर अभाव है. चित्रेश्वर मोड़ से मंदिर तक सड़क बदतर है. बरसात में आवागमन ठप हो जाता है. मंदिर के तालाब का जीर्णोद्धार नहीं हुआ है . ग्रामीणों ने महाशिवरात्रि के मद्देनजर श्रमदान से तालाब की सफाई की थी. मंदिर परिसर में पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है. पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है. इससे श्रद्धालुओं का परेशानी होती है.

रिपोर्ट: गौरव पाल

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