Gita Jayanti 2023: सफल जीवन के लिए दिव्यामृत है श्रीमद्भगवद्गीता, आज गीता जयंती पर पढ़ें विशेष लेख

Published by : Radheshyam Kushwaha Updated At : 22 Dec 2023 7:48 AM

विज्ञापन

Gita Jayanti 2023: हर साल मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन गीता जयंती मनाई जाती है. माना जाता है कि महाभारत में कुरुक्षेत्र के युद्ध के दौरान श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिए थे.

विज्ञापन

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।

[अन्य सभी धर्मों (कर्तव्यों) का त्याग करके मात्र मेरी ही शरण में रहो; मैं (उन कम आवश्यक कर्तव्यों को न करने से उत्पन्न) सब पापों से तुम्हें मुक्त कर दूँगा। शोक मत करो!]

– अध्याय 18, श्लोक 66

महान योगी श्री श्री परमहंस योगानन्द ने अपनी पुस्तक “ईश्वर-अर्जुन संवाद (महर्षि वेदव्यास विरचित श्रीमद्भगवद्गीता का अनुवाद एवं व्यापक व्याख्या) में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अपने आदर्श शिष्य अर्जुन को प्रदान किये गए, इस वचन का अनुवाद इन शब्दों में किया है. यदि तुम सभी अहं-प्रेरित कर्तव्यों को त्याग कर मेरे निर्देशानुसार सभी दिव्य कर्तव्यों को पूर्ण करते हुए. मेरे साथ समाधि में रहते हो, तो तुम मुक्त हो जाओगे.

धर्म की खबरें

योगानन्दजी- जो आध्यात्मिक गौरव ग्रन्थ, योगी कथामृत,” के लेखक हैं और जिन्होंने एक शताब्दी से भी अधिक पूर्व योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया/सेल्फ़ रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की स्थापना की थी. कहते हैं कि गीता के मात्र सात सौ श्लोकों में ब्रह्माण्ड का सम्पूर्ण ज्ञान समाया हुआ है और “ईश्वर की ओर वापसी के पथ पर व्यक्ति जहां कहीं भी हो, उसकी यात्रा के उस खण्ड पर गीता अपना प्रकाश डालेगी.

योगानन्दजी का गीता की व्याख्या का कार्य अनेक वर्षों पूर्व उनके गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी और परमगुरुओं श्री श्री लाहिड़ी महाशय और महावतार बाबाजी के अन्तर्ज्ञानात्मक मार्गदर्शन में प्रारम्भ हुआ था. बाबाजी ने उसी पवित्र क्रियायोग प्रविधि को पुनरुज्जीवित किया था, जिसका भगवान श्रीकृष्ण द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में दो बार उल्लेख किया गया है. जैसा कि योगानन्दजी ने स्पष्ट किया है. “एक ईश्वर-प्राप्त गुरु की सहायता से व्यक्ति अन्तर्ज्ञानात्मक बोध की कुंजी के प्रयोग के द्वारा भाषा और अस्पष्टता के कठोर कवच को खोल कर धर्मग्रन्थों के वचनों में निहित सत्य के मूल तक पहुंचना सीखता है.

गुरुदेव ने गीता की गहन दार्शनिक अवधारणाओं की अन्तिम समीक्षा और विस्तृत विवरण 1952 में अपनी महासमाधि से पूर्व के कुछ महीनों में कैलिफ़ोर्निया के मोहावि रेगिस्तान में स्थित एक छोटे से आश्रम में एकान्त में की थी. वहां के बारे में स्मरण करते हुए एक संन्यासी ने बताया कि (जहां योगानन्दजी कार्य कर रहे थे) उस कमरे का स्पन्दन अविश्वसनीय था. वह ईश्वर में प्रवेश करने जैसा था.

योगानन्दजी के इस अनूठे प्रयास का उद्देश्य गीता को अपनी अवधारणाओं के अनुसार या “बौद्धिक रूप से तोड़-मरोड़ कर” समझना और समझाना नहीं था, अपितु संसार को श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य वास्तविक संवाद की व्याख्या प्रदान करना था जिसे स्वयं महर्षि व्यास ने अनुभव किया था तथा भक्तिमय अन्तर्ज्ञान में “परमानन्द की विभिन्न अवस्थाओं में” प्रकट किया था.

Also Read: Ekadashi 2024: क्या है एकादशी व्रत की महिमा, जानें इस दिन का नियम, कथा और महत्व

अतः “ईश्वर-अर्जुन संवाद” सर्वव्यापी ब्रह्म (जिसके प्रतीक श्रीकृष्ण हैं) और आदर्श भक्त की आत्मा (जिसके प्रतीक अर्जुन हैं) के मध्य संवाद का वर्णन है. एक विवेकशील भक्त के लिए पहले अध्याय से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा (पांडु के वंश) के साथ समस्वर शुद्ध विवेकशील बुद्धि तथा अहंकार द्वारा भ्रमित इन्द्रियों के बन्धन में जकड़े हुए अन्धे मन (अन्धे राजा धृतराष्ट्र और उनकी दुष्ट सन्तानों) के मध्य निरन्तर होने वाले आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक युद्ध को दर्शाने के लिए किया गया है.

भगवान् श्रीकृष्ण (गुरु अथवा जाग्रत आत्मचेतना अथवा ध्यान से उत्पन्न अन्तर्ज्ञान) की सहायता से, “अपने राज्य को अहंकार और उसकी बुरी मानसिक प्रवृत्तियों की सेना के अधिकार से मुक्त कराने के लिए” और ब्रह्म की सर्वसंतुष्टिदायक सम्प्रभुता स्थापित करने के लिए भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक युद्ध आवश्यक है, जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने निराश अर्जुन को असीम सांत्वना प्रदान की थी, उसी प्रकार योगानन्दजी प्रत्येक सच्चे साधक में विद्यमान अर्जुन भक्त को अपने अवर्णनीय शब्दों में यह परामर्श देते हैं, “प्रत्येक व्यक्ति को कुरुक्षेत्र का अपना युद्ध स्वयं लड़ना है. यह युद्ध मात्र जीतने के योग्य ही नहीं है. अपितु ब्रह्माण्ड तथा आत्मा एवं परमात्मा के शाश्वत सम्बन्ध की दिव्य व्यवस्थाओं के अनुरूप भी है. यह एक ऐसा युद्ध है जिसे कभी न कभी तो जीतना ही पड़ेगा.

लेखिका : सन्ध्या एस. नायर

विज्ञापन
Radheshyam Kushwaha

लेखक के बारे में

By Radheshyam Kushwaha

राधेश्याम कुशवाहा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से MJ (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत भोपाल से प्रकाशित राज एक्सप्रेस समाचार पत्र से की. इसके बाद उन्होंने समय जगत, राजस्थान पत्रिका और हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं. वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में धर्म, अध्यात्म एवं राशिफल डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 13 वर्षों का अनुभव रखने वाले राधेश्याम कुशवाहा को ज्योतिष शास्त्र, पंचांग गणना, ग्रह गोचर, नक्षत्र परिवर्तन, व्रत-त्योहारों की तिथियों तथा शुभ मुहूर्तों का गहन ज्ञान है. अपनी विशेषज्ञता के आधार पर वे धर्म-अध्यात्म और राशिफल से जुड़ी सटीक, तथ्यपरक एवं विश्वसनीय खबरें लिखते हैं. धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि है. इसके अलावा राजनीति, अपराध और प्रेरणादायक (पॉजिटिव) विषयों पर लेखन में भी उनकी गहरी रुचि है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola