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मौत का एक दिन मुअय्यन है…

मेरी हथेली पर खुला नया पेज ब्लिंक कर रहा था. मायोकार्डियल इन्फेक्शन ! ये वो मेडिकल टर्म था, जिसने मेरी संभावित मौत को अपने आगोश में ले रखा था. टर्म क्लिकेबल था. ये जान सकते थे कि इसे आमफहम भाषा में क्या कहते हैं.

क्लीनिक पर भीड़ थी. मेरे पास वक्त. मैंने अपनी हथेली आंखों के आगे की. मीवन ऐप का हेल्थ डैशबोर्ड खुल गया हथेली पर. डेथ! हां यही टैग मैंने चुना. अब नये पेज पर एक्सीडेंट से लेकर आत्महत्या तक मौत के हर संभावित तरीके के ब्लॉक्स दिखने लगे. अलग- अलग रंग के ब्लॉक्स. ग्रीन, पिंक, ऑरेंज, रेड हां रेड! मुझे ये देखना चाहिए. ऐप के सजेशन में भी अमूमन यही रंग फ्लैश होता है. मैं हर तीसरे चौथे दिन इसपर जाता हूं. वो इंडिकेटर, जो सबसे ज्यादा संभावित और जल्द मौत होने को दिखाता था, उसे दबा दिया. ये पेज खुलने में तकरीबन पांच से सात सेकेंड लेता है. शायद उसे इस तरह से डिफॉल्ट सेटिंग दी गयी है कि आप अपने जीवन की सबसे खूबसूरत शय से मिलने जा रहे हैं इसलिए जरा ठहरिये… मैं मुस्कुराया या शायद मेरे मुंह से अपुष्ट रूप से ही सही यही वाक्य निकल गया होगा. मुझे महसूस हुआ कि मेरी बगल में बैठी लड़की मुझे आश्चर्य से देख रही थी. जबकि, उस समय तक आश्चर्य की मौत हुए कुछ अरसा बीत चुका था.

मेरी पांच-सात सेकेंड के लिए फारिग हुई निगाह क्लीनिक में चारों तरफ घूम गयी. मेरे ठीक सामने एक बुजुर्ग दंपति था. दोनों चुप थे और मुस्कुरा रहे थे और एक दूसरे को बीच-बीच में देखकर कुछ याद दिलाने की कोशिश कर रहे थे. उनके और मेरे आजू-बाजू बहुत से और भी लोग थे, वहां जो चुप थे, लेकिन उनके चेहरे पर बहुत ज्यादा बोल चुके होने की थकान थी. बायीं तरफ थोड़ी दूर पर रिसेप्शन था. रिसेप्शन के पीछे वाली दीवार पर दोनों डॉक्टरों के नाम से ज्यादा कुछ और लिखा चमक रहा था. एमडी, डीएम, एमसीएच साइकियाट्री और एमबीबीएस, डीपीएम, एमआईपीएस. साइकियाट्रिस्ट एंड काउंसलर. रिसेप्शन काउंटर पर बैठी लड़की को घेरे तीन लड़के खड़े थे, जिनके चेहरे और शरीर की अलग-अलग मुद्राओं से ये पता लगाना मुश्किल था कि वो अभी-अभी आये हैं या बस जाने ही वाले हैं. दीवार से सटी हुई बेंच पर एक नौजवान बैठा था, जो कहीं नहीं देख रहा था. उन तीनों और इस एक के बीच अभी-अभी कोई बात हुई लगती थी, क्योंकि क्लीनिक के उस इलाके की तरफ बहुत से लोगों ने अपनी निगाहें टिका दी थीं.

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मेरी हथेली पर खुला नया पेज ब्लिंक कर रहा था. मायोकार्डियल इन्फेक्शन ! ये वो मेडिकल टर्म था, जिसने मेरी संभावित मौत को अपने आगोश में ले रखा था. टर्म क्लिकेबल था. ये जान सकते थे कि इसे आमफहम भाषा में क्या कहते हैं. मुझे अंदेशा तो था पर मैं जानना नहीं चाहता था. ऐसी बहुत सी चीजों के बारे में जानने की इच्छा समाप्त हो जाती है, जब मैं ऐप के इस रंगीन पन्ने पर पहुंचता हूं. आठ साल दो माह और बीस दिन! तारीख भी लिखी थी. समय का पहर भी. लम्बवत कॉलम पर मेटाबोलिक सिंड्रोम, डायट हैबिट, टोबैको, अल्कोहल, फिजिकल वर्क आउट, प्रेजेंट लेवल ऑफ आथ्रोस्कलूरोसिस जैसे अनेक बिंदु थे, जिनमें से किसी एक पर बॉल सेट कर उन्हें घटाया- बढ़ाया जा सकता था. मैने स्क्रोलर बॉल को सरकाना शुरू किया. क्षैतिज रो पर रेड निशान आगे- पीछे होने लगा. प्रतिदिन पांच सिगरेट पर फिक्स करने पर ये मौत सरककर पांच साल तीन माह आठ दिन तक पहुंच गयी. आठ अक्टूबर सन दो हजार चौंतीस! आह! दिमाग में कहीं कुछ तिड़क के टूटा. तारीखों से अटैच टाइम- डेट प्लानर कैलेंडर इवेंट में उस तारीख की पचासवीं वर्षगांठ उभर आई, जो मेरे जेहन में एक गांठ की तरह फंसी हुई थी. इससे बेहतर क्या दिन होगा मरने का. मैंने मुस्कुराने की शहीदाना अदा अपने चेहरे पर उगती देखी. राहत की सांस ली और सिगरेट सुलगा ली.

क्लीनिक की दीवारों पर जगह-जगह लगी कॉलिंग स्क्रीन पर एक नंबर चल रहा था, जो मेरे वेटिंग नंबर से दूर था. पैंतीस मिनट अट्ठारह सेकेंड लगेंगे. ‘मैं बुदबुदाया.’ मेरी बगल में बैठी लड़की आश्चर्य से मुझे देख रही थी. अब मुझे इस वाक्य को दोबारा लिखना चाहिए. मेरी बगल में बैठी लड़की मुझे देख रही थी, क्योंकि आश्चर्य की मौत हुए कुछ अरसा बीत चुका था. मुस्कुराते हुए मैंने चारों तरफ दोबारा नजर दौड़ाई. बुजुर्ग दंपत्ति अभी उकताए हुए नहीं लग रहे थे, जबकि अन्य लोगों के चेहरे पर किसी उबाऊ फिल्म के ठीक मध्य में पहुंचे होने की अकुलाहट थी. दरवाजे के पास खड़े तीन लड़के बेंच पर बैठे नौजवान की तरफ देख रहे थे, जो अब घड़ी की तरफ देख रहा था. अचानक वो उठा और उसने काउंटर पर बैठी लड़की से दुबारा दरयाफ्त की. उसने कहा कि उसकी नमाज का वक्त हो रहा है और अगर अभी वो डॉक्टर से मिल नहीं पाया, तो शायद डॉक्टर साहब उसके इबादत से लौटने तक लंच पर चले जाएं. हालांकि, उसकी आवाज में कोई खास आकर्षण पैदा करने वाली बात नहीं थी, लेकिन वहां बैठे लोगों ने उसकी तरफ देखना शुरू कर दिया था. दरवाजे के पास खड़े तीन लड़कों ने पहले काउंटर पर बैठी लड़की को घूरा और फिर बेंच से उठकर आये व्यक्ति से कहा कि क्या वो यहां तेल लेने आये हैं.

‘हुजूर मैं आपसे मुखातिब नहीं हूं’ बेंच से उठकर आया व्यक्ति दोबारा बेंच पर बैठते हुए बोला. ‘मैम प्लीज मैंने आपसे पहले ही…’

‘हां इन्होंने कहा था’ लड़की मुस्कुराने का भरसक प्रयास कर रही थी, हांलाकि अब उसकी घबराहट आवाज और आंखों के रास्ते झांक रही थी.’

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‘कहा था का क्या मतलब… हम भी तो कह ही रहे हैं’ कहते हुए एक लड़के ने तीनों की तरफ से बात कहने के साथ-साथ वहां मौजूद बहुसंख्य लोगों की तरफ से भी बात कहने का रुआब पैदा कर लिया. उसकी आंख के निचले हिस्से का ऊपर आना और पुतलियों का घूमकर अपने साथियों के चेहरे से फिसलते हुए बाकी जनता की तरफ हो जाना ये बताने के लिए काफी था कि उस का ‘कह रहे हैं’ कहना किसी भी क्षण मात्र में ही कहने से ज्यादा हो सकता है. मुझे सिर में बुलबुले उठते महसूस हुए. ठीक उसी क्षण मुझे लगा कि मुझे कुछ बोलना चाहिए-‘ वक्त कीमती है उसका सम्मान करो, वक्त नाजुक है हवा का रुख देख कर चलो, वक्त से पहले कुछ नहीं मिलता इंतजार करो…’ मुझे झुंझलाहट होने लगी. ये मैं क्या अनर्गल बोलने की सोच रहा हूं. वक्त, वक्त वक्त…

एक वक्फे के बाद बेंच पर बैठा हुआ व्यक्ति बेंच पर अपनी घेर को कम करते हुए बोल उठा- ‘बिला वजह बात बढ़ा रहे हैं आप जनाब… आपका तो अभी नंबर भी नहीं लगा’ और फिर काउंटर पर बैठी लड़की को देखकर कहा- ‘देखिये अगर मैं अगले बीस एक मिनट में नहीं निकल पाया तो… यहां, उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई. काउंटर के बाईं तरफ एक गलियारा था, गलियारे के पीछे एक प्राइवेट रूम के पीछे का हिस्सा था, जहां दो एक टूटी कुर्सियां और कुछ अन्य कबाड़ पड़ा था. उस स्थान की तरफ देखते हुए व्यक्ति ने भीगी हुई आवाज में बात आगे बढ़ाई. ‘हां वहां! लेकिन मसला तो उसमें भी है. कुछ लोगों को तो हमारी किसी भी बात से एतराज हो सकता है.’

मैंने उस स्थान पर खड़े, घुटनों के बल बैठे और फिर घुटनों पर ही झुकते इंसान की कल्पना कर ली. मेरा दावा है कि वहां मौजूद बहुत से अन्य लोगों ने भी इसकी कल्पना की होगी. उन तीन लड़कों ने भी. उनमें से तीसरे ने पैंट की कमर में खोंसी हुई कोई चीज निकाल ली थी.

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-‘हां होगी. होगी ही! तुम लोगों से तो दुनिया भर को एतराज है. दिक्कत है और ऐसे ही नहीं है.’ तीसरे ने पैंट की कमर से निकाली हुई चीज दूसरे के हवाले कर दी थी.

उस वक्त मुझे आंख के बीच वाले हिस्से में तेज चुभन महसूस होने लगी. ऐसा लगा जैसे खून का कोई थक्का आंख के बीचों- बीच जबरन घुस रहा हो. मुझे लगा कि इस वक्त जरूर मुझे कुछ बोलना चाहिए- ‘जो हुआ सो हुआ. गड़े मुर्दे क्या उखाड़ने. मिट्टी पाओ.’ मुझे झुंझलाहट होने लगी. ये मैं क्या अनर्गल और बेसूद बोलने का सोच रहा हूं. बेपेंदी का लोटा… गला खुश्क हो गया मेरा. गर्मी बढ़ गयी थी. मैंने रुमाल निकाल लिया. बुजुर्ग दंपत्ति अब ऊंघ रहे थे. मेरी बगल में बैठी लड़की ने पहले से निकाला रुमाल अपने मुंह पर रख लिया था. बहुत से लोगों ने अपने रुमाल निकाल लिए थे और उसके किसी अच्छे इस्तेमाल को लेकर असमंजस में थे.

-‘मैम वुड यू प्लीज…’ बेंच पर बैठे हुए व्यक्ति ने पसीने से भरी हुई अपनी हथेलियां रुमाल से पोंछी और कहना चाहा और ‘प्लीज मैम!’ बस इतना कहकर रह गया.

दूसरे ने तीसरे से मिली उस चीज को पहले लड़के को थमा दिया था. मुझे उसका हाथ हिलता हुआ दिखा पर वो चीज नहीं दिखी, जो उसने पकड़ रखी थी. मैंने अपने सिर का सारा खून पैरों की तरफ दौड़ता महसूस किया-‘मैं सही और गलत की विभाजक रेखा पर सिर के बल खड़ा हूं.’ ये सोचते हुए भी मुझे अब कुछ भी बोलना नहीं सूझ रहा था. मैं तत्काल वहां से निकल भागने के बारे में सोच रहा था.

मेरी हथेली पर खुला ऐप ब्लिंक कर रहा था. मेरी लोकेशन उसके पास थी. मैं सिहर उठा. शायद इमिडियेट कंसर्न है कोई. अभी कोई अलर्ट जेनेरेट होगा और मेरे डॉक्टर के पास चला जायेगा. मैंने बहुत ध्यान से देखा. नहीं! बहुत देर से बैठे होने का बीप था, जो माहौल की गर्मी से इंटेंस हो गया सुनाई देता था. अभी भी बॉल पांच साल तीन माह आठ दिन पर टिकी थी. मेरी चाल में गिरावट, कदमों की संख्या, लोकेशन, ड्यूरेशन ऑफ स्टे, रक्तचाप, नमक मसाले शराब सिगरेट, फेफड़ों का इंटरनल स्कैन… ऐप के पास अब भी सबकुछ था.

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काउंटर पर बैठी लड़की ने अब तीसरी तरफ भी निगाह डालनी शुरू कर दी थी. उस तरफ शीशे का बड़ा दरवाजा था और उसके पार पोर्टिको. शायद वो मेन गेट की तरफ देख रही थी, जहां नीली वर्दी धारी सिक्याेरिटी के जवान अंदर आने वाली गाड़ी को किसी तरफ जाने के इशारे कर रहे थे. वो बेंच पर बैठे व्यक्ति और उन लड़कों की तरफ बारी-बारी से भरसक मुस्कुरा कर देख रही थी. उसके दोनों हाथ कंप्यूटर के की. बोर्ड पर थे. बेंच पर बैठा व्यक्ति थोड़ी देर से चुप था. अब वो बेंच की बगल में जमीन पर पड़े अपने बैग को उठा रहा था. उसमें से उसने रुमाल निकाल लिया था. ‘नहीं रुमाल नहीं होगा…’ मैंने अपनी नजर को स्थिर किया- ‘रुमाल तो उसकी हथेलियों में पहले से है. कुछ और है शायद.’ उसने एक लंबी सांस ली. अब उसके चेहरे पर किसी निर्णय पर पहुंचने की रंगत उभर रही थी. किसी को शायद मैसेज किया था या शायद कोई अलर्ट भेजा होगा. गलियारे के पास वाली खाली जगह को देखते हुए अब वो उठने का उपक्रम कर रहा था.

लड़कों ने गलियारे से गुजरते हुए एक खाली स्ट्रेचर को रोक लिया था और गलियारे के पास वाले उस खाली स्थान पर लगा रहे थे. गर्मी और बढ़ गयी थी. थूक गटकने के साथ ही गला और खुश्क हो गया. मुझे पानी की जरूरत महसूस होने लगी, जबकि अगर मापा जाता तो मेरे खून में पानी की मात्रा बहुत बढ़ी हुई मिलती.

मैंने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ा दिया. हद है! मेरी खुली हथेली पर खुला ऐप अब भी मेरी मृत्यु का सबसे संभावित कारण माइयोकार्डियल इंफेक्शन और मौत का दिन वही आठ अक्टूबर सन दो हजार चौंतीस बता रहा था, जो आज से ठीक पांच साल तीन माह आठ दिन बाद पड़ने वाला था, जबकि आज अभी-अभी… मैंने ऐप अनइंस्टॉल कर दिया!

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अमित श्रीवास्तव

संपर्क : कमाडेंट आईआरबी -2, एचएन- 03, पुलिस ऑफिसर कॉलोनी, पीएस वसंत विहार, देहरादून – 248006, ई-मेल : taravamitsrivastava@gmail.com

भारतीय पुलिस सेवा में हैं. गद्य एवं पद्य दोनों ही विधाओं में समान दखल रखते हैं. बाहर मैं, मैं अंदर (कविता संग्रह), पहला दखल (संस्मरण), गहन है यह अंधकारा (उपन्यास), कोतवाल का हुक्का (कहानी संग्रह), शेपिंग ऑफ अ कॉप (संस्मरण), कोविड ब्लूज (विचार) प्रकाशित.

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