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Azadi Ka Amrit Mahotsav: शिव प्रसाद शर्मा तिरंगा फहराने और वंदे मातरम कहने पर गये थे जेल

Updated at : 09 Aug 2022 6:00 PM (IST)
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Azadi Ka Amrit Mahotsav: शिव प्रसाद शर्मा तिरंगा फहराने और वंदे मातरम कहने पर गये थे जेल

भारत की स्वतंत्रता की 75वींं वर्षगांठ पर हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. ऐसे ही सुरमाओं की वीरता की गाथा की कड़ी में घाटशिला के स्वतंत्रता सेनानी शिव प्रसाद शर्मा पर प्रस्तुत है अजय कुमार पांडेय की रिपोर्ट.

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Azadi Ka Amrit Mahotsav: घाटशिला के प्रथम मुखिया, प्रमुख और स्वतंत्रता सेनानी शिव प्रसाद शर्मा ने छात्र जीवन में ही अंग्रेजी हुकूमत के िखलाफ िबगुल फूंक दिया था. उस समय उनकी उम्र मात्र 16 साल थी. वे घर छोड़ कर भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे. दो बार जेल गये. भागलपुर न्यायालय में जज पर चप्पल फेंकने के आरोप में सजा हुई थी. गृह मंत्रालय ने उन्हें पेंशन देने की घोषणा की थी. मगर उन्होंने पेंशन लेने से इनकार कर दिया था. शिव प्रसाद शर्मा के भतीजे राजेंद्र प्रसाद शर्मा बताते हैं कि 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन जोरों पर था. 7 सितंबर 1942 को उनके चाचा ने जगदीश चंद्र सेकेंडरी हाइस्कूल में तिरंगा झंडा फहराया था. साथ ही वंदे मातरम के नारे लगाये थे.

चाचा इसी स्कूल में सेकेंडरी स्कूल के छात्र थे. पुलिस ने झंडा फहराने व नारे लगाने के आरोप में उनके चाचा (शिव प्रसाद शर्मा) को गिरफ्तार कर लिया था. वहां से पुलिस उन्हें घाटशिला थाना ले गयी. उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ साथी थाना गये, तो उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया. चाचा को डीआइआर 35 (8) का आरोप लगा कर गिरफ्तार किया गया था. जमशेदपुर के तत्कालीन एसडीओ ने इस मामले में 17 सितंबर 1942 को छह माह की सजा सुनायी थी. उन्हें भागलपुर जेल भेजा गया था. भागलपुर न्यायालय में जज पर चप्पल फेंकने के आरोप में उन्हें दो साल 9 माह की सजा सुनायी थी. हालांकि उन्हें दो वर्ष छह माह बाद जेल से रिहा किया गया था.

कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्र पत्र से सम्मानित किया था. 16 मई 1973 को गृह मंत्रालय से स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन की स्वीकृति मिली थी. शिव प्रसाद शर्मा को 200 रुपये पेंशन देने की स्वीकृति मिली. मगर उन्होंने पेंशन लेने से इनकार कर दिया था. उनका निधन 10 जुलाई 1981 को हुआ था. चाचा ने घाटशिला के चेंगजोड़ा में खड़िया बस्ती और महुलिया हाइस्कूल के निर्माण में अहम भूमिका अदा की थी.

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