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आजादी का अमृत महोत्सव: भगवान बिरसा ने अंग्रेजों और सूदखोरों के खिलाफ छेड़ी थी जंग

Updated at : 03 Jun 2022 9:40 AM (IST)
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आजादी का अमृत महोत्सव: भगवान बिरसा ने अंग्रेजों और सूदखोरों के खिलाफ छेड़ी थी जंग

आजादी का अमृत महोत्सव: अंग्रेजी हुकूमत के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बिरसा ने आदिवासियों की सेना बना कर अंग्रेजों के खिलाफ छापामार लड़ाई शुरू कर दी. वर्ष 1895 से 1900 के बीच मुंडा आदिवासियों ने बिरसा के नेतृत्व में छापामार लड़ाई द्वारा अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था.

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आजादी का अमृत महोत्सव: ब्रिटिश सरकार और उनके द्वारा नियुक्त जमींदार आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-जमीन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल कर रहे थे. 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों द्वारा लागू की गयी जमींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी. उन्होंने सूदखोर महाजनों के खिलाफ भी जंग का एलान किया. ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, कर्ज के बदले उनकी जमीन पर कब्जा कर लेते थे. यह सिर्फ विद्रोह नहीं था, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, स्वायत्तता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था.

15 नवंबर, 1875 को खूंटी जिले के उलिहातु गांव में जन्मे बिरसा मुंडा का जीवन बेहद गरीबी में बीता. उनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था. बिरसा की शुरुआती शिक्षा साल्गा गांव, चाईबासा जीइएल चर्च (गोस्नर एवंजिलकल लुथार) विद्यालय से हुई. उन दिनों अंग्रेज आदिवासियों का शारीरिक और मानसिक रूप से शोषण कर रहे थे. बिरसा ने ब्रिटिश राज की नीतियों का हमेशा विरोध किया और लोगों को एकजुट होकर लड़ने के लिए प्रेरित किया. बड़ी संख्या में लोग उनकी बातों से प्रभावित हो रहे थे.

अंधविश्वास से लड़े, कहलाये ‘धरती आबा’

बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आदिवासी समाज अंधविश्वासों और आस्था की कुरीतियों के शिकंजे में कैद है. सामाजिक कुरीतियों के कारण ही आदिवासी समाज अज्ञानता का शिकार है. उस समय ब्रिटिश शासकों और जमींदारों के शोषण से आदिवासी समाज झुलस रहा था. बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें तीन स्तरों पर संगठित करना शुरू किया- सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक, जिसके तहत उन्होंने आदिवासी समाज को अंधविश्वासों और ढकोसलों के चंगुल से बाहर निकालने पर काम किया.

वहीं, आर्थिक स्तर पर हो रहे शोषण के खिलाफ भी चेतना पैदा की, जिसके फलस्वरूप सारे आदिवासी शोषण के खिलाफ संगठित होने लगे और बिरसा मुंडा ने उनके नेतृत्व की कमान संभाली. देखते-देखते बिरसा मुंडा लोगों के लिए धरती आबा यानी धरती पिता हो गये.

छापामार लड़ाई से अंग्रेजों के छुड़ाये पसीने

अंग्रेजी हुकूमत के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बिरसा ने आदिवासियों की सेना बना कर अंग्रेजों के खिलाफ छापामार लड़ाई शुरू कर दी. वर्ष 1895 से 1900 के बीच मुंडा आदिवासियों ने बिरसा के नेतृत्व में छापामार लड़ाई द्वारा अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. अगस्त, 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोल दिया. वर्ष 1898 में तजना नदी के किनारे बिरसा ने अंग्रेजी सेना पर हमला किया और अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. बाद में अतिरिक्त अंग्रेजी सेनाओं के आने के बाद आदिवासियों की पराजय हुई और कई आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया गया. 3 फरवरी, 1900 को अंग्रेजी सेना ने बिरसा को उसके समर्थकों के साथ जंगल से गिरफ्तार कर लिया.

जेल में संदेहास्पद स्थिति में बिरसा मुंडा की मौत

भगवान बिरसा की 9 जून, 1900 को जेल में संदेहास्पद अवस्था में मौत हो गयी. अंग्रेजी हुकूमत ने बताया कि हैजा के चलते उनकी मौत हुई है. महज 25 साल की उम्र में मातृ-भूमि के लिए शहीद होकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को उद्वेलित किया, जिसके चलते देश आजाद हुआ. भगवान बिरसा के संघर्ष और बलिदान की वजह से उन्हें आज हम ‘धरती आबा’ के नाम से पूजते हैं.

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