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Azadi Ka Amrit Mahotsav : जेल में रहते हुए कन्हाई लाल दत्त ने अंग्रेजों के मुखबिर को उतारा था मौत के घाट

Updated at : 03 Aug 2022 9:00 PM (IST)
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Azadi Ka Amrit Mahotsav : जेल में रहते हुए कन्हाई लाल दत्त ने अंग्रेजों के मुखबिर को उतारा था मौत के घाट

भारत की आजादी के लिए फांसी के फंदे पर झूलने वाले अमीर शहीदों में से एक थे कन्हाई लाल दत्त. खुदीराम बोस की तरह कन्हाई लाल फांसी पर चढ़ गए थे. दरअसल, जेल में रहते हुए क्रांतिकारी कन्हाई लाल दत्त ने ब्रिटिश पुलिस की आंखों के सामने उनके गवाही की हत्या कर दी थी.

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आजादी का अमृत महोत्सव: खुदीराम बोस की तरह फांसी के फंदे पर झूलने वाले क्रांतिकारी कन्हाई लाल दत्त का जन्म 30 अगस्त, 1888 को बंगाल में हुगली जिले के चंदन नगर में हुआ था. उनकी शुरुआती शिक्षा बंबई में हुई थी. उनके पिता चुन्नीलाल ब्रिटिश सरकार के नौसेना विभाग में अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे. अनपी प्रारंभिक शिक्षा आर्य शिक्षा सोसायटी स्कूल में पूरी करने के बाद कन्हाई चंदन नगर आ गये. उन्होंने यहां पर हुगली के कॉलेज में दाखिला ले लिया. ग्रेजुएशन के दिनों में उनकी मुलाकात प्रोफेसर चारुचंद्र रॉय से हुई. प्रो. रॉय के क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव कनाई पर भी पड़ने लगा. इस बीच युगांतर पार्टी से जुड़ने के बाद वे कई क्रांतिकारियों के संपर्क में आये. वह दौर बंगाल विभाजन का था. अंग्रेजी हुकूमत ने बंगाल को बांटने का फरमान जारी कर दिया था और युवाओं ने इसके खिलाफ क्रांति छेड़ दी थी. क्रांतिकारी गतिविधियों में कनाई की भागीदारी देखते हुए कॉलेज ने उनकी ग्रेजुएशन की डिग्री रोक ली. बावजूद इसके, वह पीछे नहीं हटे, साल 1908 में पढ़ाई पूरी होने के बाद कन्हाई कोलकाता चले गये. यहां पर उनका संपर्क ‘युगांतर संगठन’ के क्रांतिकारी से हुआ. यहां वे बारींद्र घोष के घर में रहते थे. इसी बीच 30 अप्रैल, 1908 को खुदीराम और उनके साथी प्रफुल्लचंद्र चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफोर्ड पर बम फेंका. इस घटना के बाद अंग्रेजी पुलिस ने छापेमारी कर कनाई समेत कई क्रांतिकारियों को हथियार के साथ पकड़ लिया.

अलीपुर बम कांड के आरोप में क्रांतिकारियों पर चला था केस

गिरफ्तारी के बाद इन सभी क्रांतिकारियों को अलीपुर जेल में रखा गया. सभी पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ षड़यंत्र रचने का मुकदमा चला. गिरफ्तार होने वालों में नरेंद्र नाथ गोस्वामी नाम का सहयोगी भी था. आगे की योजनाओं और साथियों के बारे में जानकारी लेने के लिए अंग्रेजों ने सभी क्रांतिकारियों पर काफी अत्याचार किया. नरेंद्र गोस्वामी ने बिरिटिश सरकार के डर से और जेल से छूटने के लालच में अपने और साथियों के नाम उगल दिये. इसके बाद कन्हाई ने उसे सबक सिखाने का फैसला किया. नरेंद्र के प्रति क्रांतिकारियों की नाराजगी देख सरकार ने उसकी सुरक्षा बढ़ा दी. फिर भी कन्हाई ने सत्येन बोस के साथ मिलकर कोर्ट में उसकी गवाही से पहले ही उसकी हत्या कर दी.

हंसते-हंसते फांसी के फंदे से झूल गये कन्हाई लाल दत्त

इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था. कैसे दो क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की आंखों के सामने उनके गवाही की हत्या कर दी. 21 अक्टूबर, 1908 को कनाई और सत्येन को फांसी की सजा सुनायी गयी. पूरे मुकदमे के दौरान एक पल के लिए भी कन्हाई विचलित नहीं हुए, बल्कि अब जज ने उनसे इस घटनाक्रम के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि ऐसा करने का सिर्फ एक कारण था कि वह हमारे देश का गद्दार था. सजा के बाद जब अपील का प्रशन उठा, तो कन्हाई ने साफ मना कर दिया और कहा कि उन्हें कोई अपील नहीं करनी. फांसी की सजा के बाद भी उनके चेहरे पर सिर्फ एक मुस्कान थी. बताया जाता है कि फांसी से एक दिन पहले जब जेल के वार्डन ने कनाई को हंसते हुए देखा तो कहा कि अभी तुम मुस्कुरा रहे हो लेकिन कल सुबह यह मुस्कान तुम्हारे होठों से गायब हो जायेगी. जब दूसरे दिन उन्हें फांसी के लिए ले जाया गया. तब भी वह मुस्कुरा रहे थे. उन्होंने जेल वार्डन से मुस्कुराते हुए पूछा कि अब आपको मैं कैसे दिख रहा हूं? जेल वार्डन के पास भारत मां के इस सपूत के लिए कोई जवाब नहीं था. 10 नवंबर, 1908 को कन्हाई लाल दत्त को सिर्फ 20 साल की आयु में फांसी दे दी गयी. फांसी के बाद जब उनके शव को परिजनों को सौंपा गया तो आजादी के इस वीर सपूत तो देखने के लिए कालीघाट पर जनसैलाब उमड़ा पड़ा था.

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