पहाड़ पर फिर सुनायी पड़ेगी कू झिक-झिक की आवाज, तीन जोड़ी नयी ट्रेन चलायेगी डीएचआर

Published at :01 Sep 2016 7:32 AM (IST)
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पहाड़ पर फिर सुनायी पड़ेगी कू झिक-झिक की आवाज, तीन जोड़ी नयी ट्रेन चलायेगी डीएचआर

सिलीगुड़ी: किसी जमाने में दार्जिलिंग पहाड़ के लोगों की नींद कू झिक-झिक की आवाज से खुलती थी और सारा दिन कभी ना कभी इस आवाज से दो चार होते रहते थे. दरअसल पहले विश्व प्रसिद्ध ट्वाय ट्रेन में स्टीम इंजन का प्रयोग होता था. यह ट्रेन कोयला पानी वाले इंजन से चलती थी और कू […]

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सिलीगुड़ी: किसी जमाने में दार्जिलिंग पहाड़ के लोगों की नींद कू झिक-झिक की आवाज से खुलती थी और सारा दिन कभी ना कभी इस आवाज से दो चार होते रहते थे. दरअसल पहले विश्व प्रसिद्ध ट्वाय ट्रेन में स्टीम इंजन का प्रयोग होता था. यह ट्रेन कोयला पानी वाले इंजन से चलती थी और कू की सीटी से लोग खुशी से झुम उठते थे.

समय बितने के साथ रेलवे का आधुनिकीकरण हुआ और पूरे देश में स्टीम इंजन का प्रचलन बंद हो गया. जाहिर तौर पर दार्जिलिंग के ट्वाय ट्रेन से भी स्टीम इंजन हटा लिये गए और डीजल इंजनों का उपयोग होने लगा. इसके साथ ही यहां के लोग कू झिक-झिक की आवाज सुनने को भी तरसने लगे.अब कइ दशक बाद पहाड़ के लोगों को एक बार फिर से कू झिक-झिक की खनक सुनायी पड़ेगी.

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (डीएचआर ) ने दार्जिलिंग तथा घुम के बीच तीन जोड़ी नये ट्वाय ट्रेन चलाने का निर्णय लिया है. इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि ट्रेनों को चलाने में स्टीम इंजन का उपयोग होगा.दस सितंबर से ये गाड़ियां यहां चलने लगेगी. यहां उल्लेखनीय है कि वर्तमान में कइ स्थानों पर रेलवे पटरी क्षतिग्रस्त होने की वजह से सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच नियमित रूप से ट्वॉय ट्रेन नहीं चलती है. एक तरह से कहें तो घुम और दार्जिलिंग के बीच ही ट्वाय ट्रेन की आवाजाही सीमित रह गयी है.इन दोनों स्टेशनों के बीच वर्तमान में छह जोड़ी ट्रेनें चल रही है.

दस किलोमीटर की दूरी तय करने वाली इन ट्रेनों को लेकर पर्यटकों में खासा जोश रहता है. ऐसे सही मायने में कहें तो ये ट्रेनें पर्यटकों के लिए ही चलायी जा रही है.इस संबंध में पूर्वोत्तर सीमा रेलवे के सीपीआरओ प्रणव ज्योति शर्मा ने बताया है कि नेरो गेज के 14 नये अत्याधुनक कोच तैयार किये गए हैं. इन्हीं कोचों को नये ट्रेनों में लगाया जायेगा.पहले के कोच में 12,14 तथा 16 सीटें होती थी. जो नये कोच बनाये गए हैं उसमें बैठने की क्षमता 28 यात्रियों की है.डीजल इंजन से चलने वाली ट्रेनों में तीन कोच लगाये जायेंगे जबकि स्टीम इंजन ट्रेन में दो कोच लगाये जायेंगे.

भूस्खलन सबसे बड़ी चुनौती
डीएचआर ट्रेनों के लिए पहाड़ पर भूस्खलन सबसे बड़ी चुनौती है.बार-बार के भूस्खलन ने डीएचआर की कमर तोड़ दी है.खासकर बरसात के मौसम में तीनधरिया के निकट पगलाझोड़ा में भूस्खलन ने ट्वॉय ट्रेन को काफी नुकसान पहुंचाया है.इस समस्या के समाधान के लिए यूनेस्को के अधिकारियों ने भी पूर्वोत्तर सीमा रेलवे के महा प्रबंधक चेते राम के साथ एक बैठक भी की है.
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