पूजा से पहले चाय श्रमिक फिर हुए एकजुट, निकाली रैली

Published at :25 Aug 2016 1:06 AM (IST)
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पूजा से पहले चाय श्रमिक फिर हुए एकजुट, निकाली रैली

सिलीगुड़ी : दुर्गापूजा से पहले चाय श्रमिक यूनियनों के संयुक्त संगठन ज्वाइंट फोरम ने आंदोलन की गति तेज कर दी है. बुधवार को तराई-डुआर्स के चाय श्रमिकों को लेकर ज्वाइंट फोरम की ओर से सिलीगुड़ी के एयरभ्यू मोड़ से एक रैली निकाली गयी. यह सभी श्रम कार्यालय गए. ज्वाइंट फोरम की ओर से संयुक्त श्रम […]

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सिलीगुड़ी : दुर्गापूजा से पहले चाय श्रमिक यूनियनों के संयुक्त संगठन ज्वाइंट फोरम ने आंदोलन की गति तेज कर दी है. बुधवार को तराई-डुआर्स के चाय श्रमिकों को लेकर ज्वाइंट फोरम की ओर से सिलीगुड़ी के एयरभ्यू मोड़ से एक रैली निकाली गयी. यह सभी श्रम कार्यालय गए. ज्वाइंट फोरम की ओर से संयुक्त श्रम कमिश्नर को चार सूत्री मांगों से संबंधित एक ज्ञापन सौंपा गया. आज की इस रैली में तराई-डुआर्स के विभिन्न चाय बागानों से सैकड़ो चाय श्रमिक भी शामिल थे. सिलीगुड़ी के एयरभ्यू मोड़ से लेकर कॉलेजपाड़ा स्थित संयुक्त लेबर कार्यालय तक राज्य व केंद्र सरकार की श्रम विरोधी नीति के खिलाफ नारे लगाए गये.
न्यूनतम मजदूरी, सबके लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, बंद चाय बागानों को खोलने, अस्थायी मजदूरों के स्थायीकरण आदि की मांग को लेकर श्रमिकों ने जम कर नारेबाजी की. ज्ञापन सौंपने आये श्रमिकों को संभालने व सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विशाल पुलिस बल की तैनाती श्रमायुक्त कार्यालय में की गयी थी.
ज्ञापन सौंपने के बाद ज्वाइंट फोरम के राज्य संयोजक जियाउल आलम ने कहा कि तराई-डुवार्स के चाय श्रमिकों ने अत्याचार के खिलाफ एक प्रतिवाद रैली निकाली है. पिछले तीन वर्षों से चाय श्रमिकों को राज्य सरकार धोखा दे रही है.राज्य व केंद्र की सरकार श्रमिकों को खाद्य, न्यूनतम मजदूरी आदि जैसे मौलिक अधिकारों से वंचित कर रही है.
पिछले एक अरसे की लड़ाइ के बाद राज्य सरकार न्यूनतम मजदूरी की मांग को लेकर कमेटी बनाने के लिए बाध्य हुयी. कमिटी गठन के दो वर्ष गुजर जाने के बाद भी सरकार कोइ साकारात्मक कदम नहीं उठा रही है. एक बार ही कमेटी की बैठक सिर्फ आधे घंटे के लिए हुयी. इस बैठक में भी बागान मालिकों ने न्यूनतम मजदूरी कानून मानने से साफ इनकार कर दिया. राज्य सरकार की इस उदासीनता को देखकर चाय श्रमिकों में सरकार के खिलाफ रोष है. इसी प्रकार की मानसिकता केंद्र सरकार की भी है.
विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र की भाजपा सरकार ने डुवार्स स्थित डंकन्स के सात चाय बागानों का अधिग्रहण किया. आठ महीने गुजर जाने के बाद भी एक भी बागान के खुलने के आसार नहीं दिख रहे हैं. उत्तर बंगाल के सबसे प्रमुख चाय उद्योग व चाय श्रमिकों की दुर्दशा पर केंद्र और राज्य सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है. राज्य व केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही है. उन्होंने कहा कि देश में एकमात्र चाय श्रमिको को ही उनके घर का मालिकाना हक नहीं मिल रहा है.
इसके अतिरिक्त जीविका, खाद्य, न्यूनतम मजदूरी, आदि मौलिक अधिकारों से भी उन्हें वंचित किया जा रहा है. राज्य व केंद्र सरकार तो एक तरफ, इन्हीं मजदूरों के कंधे पर खड़े होकर करोड़ो रूपए मुनाफा कमाने वाले बागान मालिकों ने भी श्रमिकों के साथ अत्याचार शुरू किया है. बात-बात पर बागान बंद कर श्रमिकों को राम भरोसे छोड़कर चले जाते हैं. श्री आलम ने बताया कि बीते चार अगस्त को ज्वाइंट फोरम द्वारा आयोजित एक सभा में इस आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया. उसी के तहत आज संयुक्त लेबर कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा गया है.
बागान मालिकों के साथ राज्य व केंद्र सरकार श्रमिकों से संबंधित सभी विषयों को नजरअंदाज कर रही है. राज्य व केंद्र सरकार की इन्हीं श्रमिक विरोधी कानून और चाय श्रमिकों की कइ मांगों को लेकर 2 सितंबर को भारत बंद का एलान किया गया है. आज की इस रैली में सीटू नेता समन पाठक, कांग्रेस समर्थित आईएनटीयूसी नेता आलोक चक्रवर्ती सहित तराई व डुवार्स के कइ चाय श्रमिक संगठन के नेता उपस्थित थे.
100 करोड़ के पैकेज का ढिंढोरा
राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा सौ करोड़ के पैकेज पर जिआउल आलम ने कहा कि वर्ष 2012 में केंद्र सरकार ने 12वीं योजना के तहत राज्य सरकार को ये पैसे दिये थे. उसी रूपए को लेकर मुख्यमंत्री पैकेज का हल्ला कर रही हैं. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना व राज्य के खाद्य साथी योजना के संबंध में श्री आलम ने कहा कि चाय श्रमिकों को खाद्य जैसे मौलिक अधिकारों से भी राज्य सरकार वंचित कर रही है. राज्य सरकार ने श्रमिकों के खाद्य की पूरी जिम्मेदारी बागान मालिकों के हाथों में सौंप दिया है. श्रम विभाग की मनाही के बाद ही खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने यह निर्णय लिया.
20 प्रतिशत से कम बोनस मंजूर नहीं
ज्वाइंट फोरम ने इस बार भी 20 प्रतिशत पूजा बोनस की मांग की है. हालांकि पिछले वर्ष पूजा बोनस को लेकर श्रमिकों के आंदोलन की वजह से कइ चाय बागानों में ताला लटक गया था. इस संबंध में जिआउल आलम का कहना है कि एक भी चाय बागान पूजा बोनस को लेकर बंद नहीं हुआ था.
पिछले वर्ष पानीघाटा और कुमलाई चाय बागान ही बंद हुआ था. इसके भी कारण अलग थे. बागान मालिकों ने बैंक से काफी कर्ज ले रखा था, नहीं चुका पाने की स्थिति में बागान बंद कर चले गए. पूजा बोनस श्रमिकों का अधिकार है. इस बार भी 20 प्रतिशत पूजा बोनस की मांग की गयी है. बागान मालिकों को पूजा के चार सप्ताह पहले बोनस देना होगा.
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