दार्जिलिंग : पट्टा फॉर्म से रचा जा रहा षड्यंत्र : क्रामाकपा

Published at :12 Jun 2018 5:02 AM (IST)
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दार्जिलिंग : पट्टा फॉर्म से रचा जा रहा षड्यंत्र : क्रामाकपा

फॉर्म में कई बातों का उल्लेख नहीं, गोर्खालैंड के मुद्दे को दबाने की साजिश दार्जिलिंग : पहाड़ पर पर्जा पट्टा के लिये वितरित किये जा रहे फॉर्म में षड्यंत्र रचने का आरोप क्रामाकपा ने लगाया है. सोमवार को स्थानीय क्रामाकपा केंद्रीय कार्यालय में पत्रकारों को संबोधित करते हुए केंद्रीय प्रवक्ता गोविंद छेत्री ने कहा कि […]

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फॉर्म में कई बातों का उल्लेख नहीं, गोर्खालैंड के मुद्दे को दबाने की साजिश
दार्जिलिंग : पहाड़ पर पर्जा पट्टा के लिये वितरित किये जा रहे फॉर्म में षड्यंत्र रचने का आरोप क्रामाकपा ने लगाया है. सोमवार को स्थानीय क्रामाकपा केंद्रीय कार्यालय में पत्रकारों को संबोधित करते हुए केंद्रीय प्रवक्ता गोविंद छेत्री ने कहा कि पर्जा पट्टा किसे प्रदान किया जा रहा है, जमीन पर कब से निवास कर रहे हैं इसका उल्लेख किया जाना चाहिए.
परंतु दार्जिलिंग पार्वतीय क्षेत्र में पर्जा पट्टा के नाम पर वितरण किये जा रहे फॉर्म में ऐसा कुछ भी नहीं है. सरकारी कुर्सी पर बैठे पहाड़ के राजनीतिक दल के नेतृत्वगणों ने जनता के हित में कार्य करने का प्रमाण दिखाने के लिए फॉर्म को देखे बगैर वितरण किया जा रहा है. उसके पीछे जो गोर्खालैंड विरोधी शक्ति है. उसकी चाल कुछ और हो सकती है.
नेपाली भाषा मान्यता आंदोलन के दौरान 1954 को राज्य पुर्नगठन कमेटी एवं एसआरसी का गठन किया गया था. उस वक्त गोर्खा एवं नेपाली समुदाय को अलग-थलग दिखाकर छेत्री, बाहुन, कामी, दामी को नेपाली भाषी बताया गया था. जिसे कुल 19 फीसदी आबादी बताया गया था.
उन्होंने कहा कि गोर्खा व नेपाली सदियों से देश के विभिन्न हिस्सों में रहते आ रहे हैं. लेकिन पर्जा पट्टा के फार्म में इसका कोई उल्लेख नहीं है कि यहां के निवासी कब से हैं. इसलिए इस फॉर्म पर लोगों को संदेह हो रहा है. उन्होंने आशंका व्यक्त किया कि ऐसा ना हो कि दस्तावेज में गोर्खा व नेपाली भाषी को 2018 से निवासी बताने का षड्यंत्र हो. इससे अलग राज्य गोर्खालैंड की मांग पर अंकुश लगाया जा सके.
श्री छेत्री ने कहा कि पर्जा पट्टा के संदर्भ में कोई आपत्ति नहीं है. इसकी मांग सर्वप्रथम क्रामाकपा ने ही उठाया था. जनजातियों के मुद्दों पर क्रामाकपा प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा के द्वारा गोर्खा समुदाय के 10 और समतल के धीमाल समुदाय को मिलाकर कुल 11 गोष्ठियों को जनजाति की सूची में शामिल करने का संकेत सिर्फ चुनावी चाल है. उन्होंने कहा कि भाजपा में दम है तो गोर्खालैंड का बिल संसद में पेश करके दिखाये.
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