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मजबूरी ऐसी कि सर्द रात में चिता की गर्माहट भी बन रही सहारा

नतीजतन श्मशान, सड़क और सागर का किनारा ही उनका आशियाना बन गया है.

शिव कुमार राउत, गंगासागर

पुण्य स्नान के लिए देश के कोने-कोने से तीर्थयात्रियों का जत्था सागरद्वीप पहुंच रहा है. इनमें बड़ी संख्या ग्रामीण इलाकों से आये श्रद्धालुओं की है, जिन्हें यह तक पता नहीं चल पा रहा कि मेले में ठहरने की व्यवस्था कहां की गयी है. नतीजतन श्मशान, सड़क और सागर का किनारा ही उनका आशियाना बन गया है.

हैरत की बात यह है कि एक ओर चिता की आग धधक रही है और उसी के बगल में जमीन पर तीर्थयात्रियों का समूह ठिठुरती ठंड में सोने को मजबूर है. इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. सनातन हिंदू धर्म में श्मशान में महिलाओं का जाना वर्जित माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि तीर्थस्थल पर महिलाएं श्मशान में रात गुजारने को मजबूर हैं. वह भी मोक्ष की नगरी में, मृत्यु के साये के बीच.

उत्तर बंगाल के रायगंज से पत्नी के साथ आये बुजुर्ग श्यामापद मंडल बताते हैं कि वे शाम को मेले में पहुंचे. काफी खोजबीन की, लेकिन ठहरने के लिए कोई जगह नहीं मिली. रास्ते में आग जलती दिखी, तो वहां चले आये. बाद में पता चला कि यह श्मशान है, लेकिन आसपास लोगों को देख कर वहीं रुक गये.

राजस्थान के बीकानेर से आयीं आनंदी अम्मा कहती हैं कि सोने के लिए कहां जाना है, कोई कुछ बताने वाला नहीं है. जहां भीड़ दिखी, वहीं आ गये.

पटना के सलीमपुर से आये बृजमोहन का कहना है कि टेंट कहां लगे हैं, यह पूछते-पूछते रास्ता भटक गये. यहां लोगों को देखा, तो चादर बिछा कर लेट गए, लेकिन मन में डर बना हुआ है. बस भोर होने का इंतजार है.

जय गंगा मैया. जय श्मशान. जहां चिता की आग से खुद को गरम कर, ठिठुरती ठंड में इंसान रात गुजारने को विवश है.

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