हिंदी पत्रकारिता के विकास के लिए हिंदीतरभाषियों ने भी गलायीं अपनी हड्डियां ः डॉ कृपाशंकर चौबे

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हिंदी पत्रकारिता के विकास के लिए हिंदीतरभाषियों ने भी गलायीं अपनी हड्डियां ः डॉ कृपाशंकर चौबे

कार्यक्रम का आयोजन विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग तथा इंडियन कम्युनिकेशन कांग्रेस ने संयुक्त रूप से किया था.

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शांतिनिकेतन. वरिष्ठ पत्रकार एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ कृपाशंकर चौबे ने कहा है कि हिंदी पत्रकारिता के विकास के लिए अनेक हिंदीतरभाषियों ने अपनी हड्डियां गलायीं. प्रोफेसर चौबे शुक्रवार की शाम हिंदी पत्रकारिता के दो सौवें वर्ष में प्रवेश करने पर विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में ‘उदंत मार्तण्डः विऔपनिवेशीकरण का आख्यान’ विषय पर विशेष व्याख्यान दे रहे थे. कार्यक्रम का आयोजन विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग तथा इंडियन कम्युनिकेशन कांग्रेस ने संयुक्त रूप से किया था. प्रोफेसर चौबे ने कहा कि आरंभ से लेकर आज तक पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत के अनेक हिंदीतरभाषियों ने हिंदी पत्रकारिता को सींचने का काम किया है. हिंदीतरभाषी राजा राममोहन राय, श्याम सुंदर सेन, अमृतलाल चक्रवर्ती, शारदा चरण मित्र, रामानंद चट्टोपाध्याय, चिंतामणि घोष, क्षितिन्द्र मोहन मित्र, माधव राव सप्रे, बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे सैकड़ों मनीषियों की हिंदी पत्रकारिता ऋणी है. इन सबने पत्रकारिता के माध्यम से ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष को गति दी.200 साल पहले आज ही के दिन युगलकिशोर शुक्ल ने हिंदीतर भाषी क्षेत्र कलकत्ता से हिंदी का पहला अखबार ‘उदंत मार्तंड’ निकाला था और पहले ही अंक में अखबार ने लिखा था-हिंदुस्तानियों के हित के हेतु. तब हिंदुस्तानियों का हित विऔपनिशीकरण में था. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश उपनिवेश से लड़ने के लिए पत्रकारिता को उपकरण बनानेवालों में राष्ट्रनिर्माता भी थे. लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सुभाषचंद्र बोस जैसे राष्ट्रनिर्माताओं ने स्वाधीनता के ध्येय को हासिल करने के लिए समाचार पत्र निकाले. प्रोफेसर चौबे ने कहा कि ‘उदंत मार्तण्ड’ की देश हित चिंता के ध्येयवाली पत्रकारिता अपने महत् दायित्व, राष्ट्रीय चेतना और युग बोध के प्रति पूर्ण सचेत थी. उसने ब्रिटिश शासन के अन्याय का प्रतिरोध करने का माद्दा समाज में उत्पन्न किया. इसके लिए भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को ब्रिटिश हुकूमत का बराबर कोपभाजन बनना पड़ा और जेल-जब्ती-जुर्माने का अनवरत सामना करना पड़ा. तब की पत्रकारिता ने अपार कष्ट व यातना सहकर भी राष्ट्रीय सम्मान और मर्यादा की रक्षा की. कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वभारती विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर रामेश्वर मिश्र ने की. पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्रोफेसर तथा इंडियन कम्युनिकेशन कांग्रेस के अध्यक्ष प्रोफेसर विप्लव लोहो चौधरी ने संचालन किया. पत्रकारिता व जनसंचार विभाग की प्रभारी डॉ मौसमी भट्टाचार्य ने स्वागत भाषण किया.

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