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सरकारी स्कूल बना बच्चों का बैंक, अस्पताल व ऑडिटोरियम से लैस मॉडल परिसर

Updated at : 22 May 2025 1:09 AM (IST)
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सरकारी स्कूल बना बच्चों का बैंक, अस्पताल व ऑडिटोरियम से लैस मॉडल परिसर

स्कूल शिक्षा का मंदिर होता है, लेकिन डिजिटल युग में जहां निजी स्कूल हर सुविधा से लैस हैं, वहीं सरकारी स्कूलों की हालत अक्सर दयनीय बनी रहती है.

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हिजली के पास कुचलाचाटी प्राथमिक विद्यालय में अनोखी पहल, स्वच्छ विद्यालय और निर्मल विद्यालय पुरस्कार से सम्मानित

जीतेश बोरकर,खड़गपुरस्कूल शिक्षा का मंदिर होता है, लेकिन डिजिटल युग में जहां निजी स्कूल हर सुविधा से लैस हैं, वहीं सरकारी स्कूलों की हालत अक्सर दयनीय बनी रहती है. ऐसे में अगर शिक्षक, अभिभावक और छात्र मिलकर प्रयास करें, तो सरकारी स्कूल भी बदलाव की मिसाल बन सकते हैं. खड़गपुर के ग्रामीण इलाके हिजली से सटे कुचलाचाटी प्राथमिक विद्यालय इसका उदाहरण बन चुका है. यह विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि बच्चों के लिए बैंक, अस्पताल और आधुनिक ऑडिटोरियम जैसी सुविधाओं से भी सुसज्जित है. यहां कक्षा पांचवीं तक की पढ़ाई होती है. कुल 175 छात्र और 6 शिक्षक हैं. अधिकांश छात्र गरीब परिवारों से आते हैं, जिनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं. महापुरुषों के नाम पर कक्षाएं, तारामंडल की छाया में पढ़ाई: विद्यालय की हर कक्षा को किसी महापुरुष के नाम पर रखा गया है. गणित कक्षा का नाम ‘आर्यभट्ट’, बांग्ला का ‘विद्यासागर’, अंग्रेजी का ‘एपीजे अब्दुल कलाम’, पर्यावरण अध्ययन का ‘आचार्य जगदीश चंद्र बोस’ और शिल्पकला का ‘यामिनी राय’ रखा गया है. क्लासरूम की छतों पर तारामंडल की चित्रकारी की गयी है, जैसे कालपुरुष और सप्तर्षि मंडल, ताकि बच्चों की कल्पनाशक्ति विकसित हो. आधुनिक ऑडिटोरियम और शिकायत पेटी भी मौजूद: विद्यालय में एक आधुनिक ऑडिटोरियम भी है, जहां टेलीविजन की सुविधा मौजूद है. यहां बच्चों के सांस्कृतिक और शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं. साथ ही, बच्चों की समस्याओं को जानने और उन्हें गोपनीय ढंग से हल करने के लिए ‘समस्या पेटी’ भी लगायी गयी है, जिसमें बच्चे अपनी बातें लिखकर डालते हैं. सम्मान और पुरस्कार: विद्यालय की यह अनोखी पहल राष्ट्रीय स्तर पर भी सराही गयी है. वर्ष 2022 में विद्यालय को केंद्र सरकार की ओर से ‘स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार’ मिला और 2023 में राज्य सरकार की ओर से ‘निर्मल विद्यालय पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया.

बच्चों का अपना बैंक और अस्पताल

विद्यालय की एक आलमारी ही बच्चों का बैंक है. हर छात्र का एक गुल्लक (जिसे स्थानीय भाषा में ””””लख्खी भाड़”””” कहा जाता है) होता है, जिस पर उसका नाम लिखा होता है. अभिभावक जो भी जेबखर्च देते हैं, बच्चे उसे गुल्लक में जमा करते हैं. यही जमा रकम समय पर उनकी पाठ्य सामग्री की खरीदारी में काम आती है. कुछ बच्चों ने अपने इस पैसे से अभिभावकों के इलाज में भी मदद की है. स्कूल परिसर में एक छोटा-सा अस्पताल भी है, जिसमें एक खाट, एक पंखा और प्राथमिक इलाज की दवाएं रखी गयीं हैं. किसी छात्र की तबीयत बिगड़ने पर तत्काल वहीं प्राथमिक उपचार किया जाता है.

प्रधान शिक्षिका की पहल

विद्यालय की प्रधान शिक्षिका तनुश्री दास बताती हैं कि यह इलाका काफी पिछड़ा है. आर्थिक समस्याओं के चलते बच्चे पढ़ाई छोड़ देते थे. इसी कारण गुल्लक के रूप में बैंक की शुरुआत की गयी. जब पैसे जमा हो जाते हैं, तो वे बच्चों के काम आते हैं और उन्हें पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं के चलते रुकना नहीं पड़ता. उन्होंने बताया कि डिजिटल युग में बच्चों को पीछे न रहने देने के लिए स्कूल के परिवेश को पूरी तरह बदलने की कोशिश की गयी है. यह विद्यालय आज एक मिसाल बन गया है कि इच्छाशक्ति, सहयोग और सकारात्मक सोच से किसी भी सरकारी स्कूल को आदर्श स्कूल में बदला जा सकता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AKHILESH KUMAR SINGH

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