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अन्याय को रोकने के लिए राहत प्रदान कर सकते हैं संवैधानिक न्यायालय

Updated at : 12 Jul 2025 1:38 AM (IST)
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अन्याय को रोकने के लिए राहत प्रदान कर सकते हैं संवैधानिक न्यायालय

वर्तमान मामले में, चिकित्सा आधार पर याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को खारिज करने के फैसले को खारिज कर दिया गया.

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कोलकाता. कलकत्ता हाइकोर्ट के जस्टिस अनिरुद्ध रॉय की पीठ ने कहा है कि अनुच्छेद 226 के तहत संवैधानिक न्यायालय यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि कोई भी नागरिक अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों से वंचित न रहे, जिनका वह हकदार है. इसलिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि नागरिकों के साथ कोई अन्याय न हो, न्यायालय को किसी विशेष मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आलोक में राहत देने का अधिकार है. वर्तमान मामले में, चिकित्सा आधार पर याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को खारिज करने के फैसले को खारिज कर दिया गया. याचिकाकर्ता ने सीएपीएफ, एसएसएफ में कांस्टेबल (जीडी) और असम राइफल्स में राइफलमैन (जीडी) के लिए 2024 की भर्ती में हिस्सा लिया था. 10 डिग्री से कम कोण होने के कारण उसे मेडिकल जांच में अयोग्य घोषित कर दिया गया था. हालांकि, आरएमई बोर्ड द्वारा उसकी जांच के दौरान किए गए एक्स-रे में, उसकी बाईं कोहनी का कोण 15 डिग्री दिखाया गया था, जिससे नामित मेडिकल बोर्ड के निष्कर्षों पर चिंताएं पैदा हुईं. इन निष्कर्षों को वर्तमान याचिका में चुनौती दी गयी है. यह भी दलील दी गई कि एक बार जब याचिकाकर्ता को आधिकारिक मेडिकल बोर्ड द्वारा अयोग्य घोषित कर दिया गया, तो बीएसएफ अस्पताल द्वारा पुनः परीक्षण का कोई प्रावधान नहीं था. इसलिए, उम्मीदवारी को अस्वीकार करना पूरी तरह से उचित और वैध था क्योंकि यह नामित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर आधारित था. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी लगन से पालन किया और अपनी उम्मीदवारी खारिज होने के तुरंत बाद रिट याचिका दायर की; इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता की ओर से कोई लापरवाही या देरी हुई. रोजगार का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(जी) के तहत संरक्षित है, और आजीविका और सम्मान के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मान्यता प्राप्त है; इसलिए, इन अधिकारों को कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना नहीं छीना जा सकता. यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 226 के तहत संवैधानिक न्यायालय का यह कर्तव्य है कि किसी को भी उसके कानूनी अधिकार और संवैधानिक अधिकारों से वंचित न किया जाये, जिसके वह हकदार है. अदालत इस अनुच्छेद के तहत राहत प्रदान कर सकती है ताकि नागरिकों को कानूनी और संवैधानिक अधिकारों का लाभ मिल सके. उपरोक्त चर्चा के आलोक में, न्यायालय ने माना कि 01.11.2024 को जारी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को अस्वीकार करने का आदेश रद्द किया जाता है. मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, न्यायालय ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता कानून के अनुसार नियुक्ति के योग्य है, तो प्रतिवादी उसे 2024 की चयन प्रक्रिया में ही शामिल करेगा. यदि 2024 की चयन प्रक्रिया में कोई रिक्तियां नहीं बचती हैं, तो प्रतिवादी उसे शामिल करने के लिए एक पद सृजित करेगा. तदनुसार, वर्तमान याचिका स्वीकार की जाती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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GANESH MAHTO

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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