वाणी पर नियंत्रण न रहने से ही राजनेता कुछ का कुछ बोलते हैं : श्रीश्री रविशंकर

कोलकाता : वाणी का तप बहुत आवश्यक है. सत्य और प्रिय बोलना ही वाणी का तप है. व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय के लिए मौन रहना चाहिए. गुस्सा भी तभी करना चाहिए, जब उससे किसी को कोई फायदा हो. वाणी का तप नहीं करने से उस पर नियंत्रण नहीं रहता. इसी वाणी के अनियंत्रण के […]
कोलकाता : वाणी का तप बहुत आवश्यक है. सत्य और प्रिय बोलना ही वाणी का तप है. व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय के लिए मौन रहना चाहिए. गुस्सा भी तभी करना चाहिए, जब उससे किसी को कोई फायदा हो. वाणी का तप नहीं करने से उस पर नियंत्रण नहीं रहता. इसी वाणी के अनियंत्रण के कारण ही राजनेता कुछ का कुछ बोलते हैं. पहुंचना संसद होता है, लेकिन कहीं और पहुंच जाते हैं. ये बातें आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने शनिवार को इंडोर स्टेडियम में गीता के 17वें अध्याय पर प्रवचन देते हुए कहीं.
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