स्क्रब टाइफस का बढ़ रहा खतरा, दो मरे
Author Prabhat khabar digital desk
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मुर्शिदाबाद में दो मौत, कोलकाता के हालतू में एक शिशु चपेट में हावड़ा, हुगली में भी बढ़ रहे हैं मामले कोलकाता : अब तक पश्चिम बंगाल डेंगू से उभर भी नहीं सका है कि स्क्रब टाइफस ने दस्तक दे दी. कोलकाता में इसके मामले देखे जा रहे हैं. एक ओर जहां डेंगू से निपटने के […]
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मुर्शिदाबाद में दो मौत, कोलकाता के हालतू में एक शिशु चपेट में
हावड़ा, हुगली में भी बढ़ रहे हैं मामले
कोलकाता : अब तक पश्चिम बंगाल डेंगू से उभर भी नहीं सका है कि स्क्रब टाइफस ने दस्तक दे दी. कोलकाता में इसके मामले देखे जा रहे हैं. एक ओर जहां डेंगू से निपटने के लिए कोलकाता नगर निगम को ड्रोन उड़ाना पड़ रहा है तो वहीं अब स्क्रब टाइफस निगम की नींद उड़ा सकती है. पहाड़ों की बीमारी समझी जानेवाली स्क्रब टाइफस अब मैदानी इलाकों में भी तेजी से पांव पसार रही है.
राज्य में 40 से अधिक लोग इस संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं. वहीं मुर्शिदाबाद जिले में अब तक दो लोगों की मौत हो चुकी है. हुगली जिले में वैद्यपाड़ा इलाके में सुदीपा नंदी (32) की मौत बुधवार को हुई. बताया जा रहा है कि स्क्रब टाइफस की चपेट में आने से महिला की मौत हुई है.
मुर्शिदाबाद, हुगली के साथ कोलकाता, हावड़ा में भी स्क्रब टाइफस दस्तक दे चुका है. कोलकाता के हालतू इलाके में एक शिशु इस बीमारी की चपेट में आ चुका है. उसे पार्क सर्कस स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ में भर्ती कराया गया है. चिकित्सकों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसका ज्यादा प्रभाव देखा जाता है. पालतू जानवरों के संपर्क में आने से इस बीमारी के होने की ज्यादा संभावना रहती है. आम तौर पर बच्चे ही स्क्रब टाइफस की चपेट में आते हैं.
पिस्सू के नाम से जानते हैं, पड़ते हैं लाल चकत्ते
पशुओं में पाये जाने वाले इस बैक्टीरिया को पिस्सू या माइट के नाम से लोग जानते हैं. पशुओं के शरीर पर रहनेवाला पिस्सू जब किसी व्यक्ति को काटता है तो उसके शरीर पर लाल चकत्ते पड़ने लगते हैं. स्क्रब टाइफस की शुरुआत सिरदर्द, ठंड और हल्के बुखार से होती है. समय पर इलाज न मिलने पर तेज बुखार के साथ सिरदर्द भी बढ़ने लगता है.
खुजली के साथ लाल रंग के चकत्ते बढ़ने के बाद चेहरे तक आ जाते हैं. पशुओं को इस बैक्टीरिया से दूर रखने के लिए स्प्रे किया जाता है उन्हें इंजेक्शन भी लगाया जाता है. यह माइक्रो लेवल के होते हैं, जिन्हें लेंस के जरिए ही देखा जा सकता है. इस बीमारी का समय से उपचार कराने पर 8-12 दिन में मरीज ठीक हो सकता है. निगम के चिकित्सक चूहों को भी इस बीमारी का वाहक बता रहे हैं.
निगम के चिकित्सकों के अनुसार कीट (पिस्सू) चूहों के शरीर पर भी पाया जाता है. ऐसे में जिन इलाकों में चूहों की संख्या अधिक है, वहां स्क्रब टाइफस के फैलने की संभावना बनी रहती है. यह खटमल से भी छोटा बैक्टीरिया है, जहां भी काटता है, वहां निशान बन जाता है. बरसात से लेकर सर्दियों के आने तक इसका प्रकोप जारी रहता है. यह बैक्टीरिया पार्क की घास और आसपास की झाड़ियों में भी पाया जा सकता है.
डॉक्टर की जुबानी
इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ (आईसीएच) के पेडियाट्रिक विशेषज्ञ डॉ प्रभास प्रसून गिरि के अनुसार स्क्रब टाइफस की चिकित्सा में एंटीबायोटिक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जो इसकी चिकित्सा के लिए दवा उपलब्ध है. 15 दिनों के भीतर इलाज संभव है. इस बीमारी के लक्षण डेंगू से मिलते-जुलते होते हैं. शरीर पर लाल चकत्ते बनते हैं.
डेंगू की तरह स्क्रब टाइफस से पीड़ित मरीज के रक्त में प्लेटलेट काउंट कम हो सकता है. एक हफ्ते के भीतर यदि बीमारी का पता लग जाये तो उसका इलाज किया जा सकता है. वरना कई सारी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. यह मल्टीपल आर्गन डैमेज कर सकती है. जिससे मौत भी हो सकती है. डेंगू और मलेरिया कंफर्म न होने के बावजूद यदि मरीज का बुखार नहीं उतर रहा है तो ब्लड का सैंपल माइक्रोबायोलॉजी के लैब में भिजवाना चाहिए.
पिछले साल भी दस्तक दिया था स्क्रब टाइफस
गत वर्ष भी महानगर समते राज्य भर में स्क्रब टाइफस के मामले देखे गये थे. गत वर्ष नवंबर में कोलकाता के 32 नंबर वार्ड यानी उल्टाडांग के बासंती इलाके में कई लोग स्क्रब टाइफस की चपेट में आये थे, जबकि दो लोगों की मौत भी हुई थी. वार्ड में फैले स्क्रब टाइफ की रोकथाम के लिए निगम की ओर से मेडिकल कैंप की व्यवस्था की गयी थी.
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