देश में डॉक्टरों की भारी कमी

Updated at : 18 Jun 2019 2:00 AM (IST)
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देश में डॉक्टरों की भारी कमी

एलोपैथी से इलाज करनेवाले डॉक्टरों में हजारों के पास डिग्री नहीं कोलकाता : भारत की आबादी एक करोड़ तीस लाख तक पहुंच गयी है. इस बड़ी आबादी का इलाज करने के लिए डॉक्टरों की संख्या बेहद कम हैं. मरीज और डॉक्टर का अनुपात देखे तो पता चलता है कि एक मरीज के इलाज के लिए […]

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एलोपैथी से इलाज करनेवाले डॉक्टरों में हजारों के पास डिग्री नहीं

कोलकाता : भारत की आबादी एक करोड़ तीस लाख तक पहुंच गयी है. इस बड़ी आबादी का इलाज करने के लिए डॉक्टरों की संख्या बेहद कम हैं. मरीज और डॉक्टर का अनुपात देखे तो पता चलता है कि एक मरीज के इलाज के लिए एक डॉक्टर के पास चंद सेकेंड ही मिलता है. इस समस्या से फिलहाल निजात मिलने की कोई संभावना नहीं दिख रही है.
केंद्रीय स्वास्थ मंत्रालय के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंसी की हालिया रिर्पोट के मुताबिक देश में डॉक्टरों‍ का अकाल है. पूरे देश की आबादी के अनुपात में देखा जाये तो एक डॉक्टर पर 11082 लोगों के इलाज की जिम्मेवारी होती है.
विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक के मुताबिक प्रति एक हजार व्यक्ति पर एक डॉक्टर का अनुपात होना चाहिए, ताकि मरीज का सही इलाज किया जा सके. यानि डब्ल्यूएचओ के मानक के हिसाब से हिंदुस्तान में मरीज और डॉक्टरों के अनुपात 11 गुणा कम है. कुल मिला कर डॉक्टरों की संख्या में भारी कमी है. बिहार की हालत तो और भी चिंताजनक है.यहां पर प्रति 28 हजार 391 लोगों पर डॉक्टरों का अनुपात एक है. हालांकि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है.
डॉक्टरों की भारी कमी का फायदा दूरदराज के इलाकों में रहनेवाले झोला छाप डॉक्टर उठाते हैं. साल 2016 में डब्ल्यूएचओ ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया है कि भारत में एलोपैथिक डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों में एक तिहाई ऐसे हैं, जिनके पास लोगों का इलाज करने के लिए डिग्री ही नहीं है. बावजूद इसके वह लोग इलाज कर रहे हैं.
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पास साल 2017 तक कुल 10 लाख 41 हजार पंजीकृत डॉक्टर थे. इनमें सरकारी अस्पताल में इलाज करने वाले डॉक्टरों की संख्या एक लाख 20 हजार है. बाकी डॉक्टर निजी अस्पतालों अथवा निजी क्लीनिक में लोगों का इलाज करते हैं.
डब्ल्यूएचओ ने बीते साल अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्च का 67.78 फीसदी लोगों की जेब से होती है. जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 17.3 प्रतिशत है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हिंदुस्तान में पूरी जनसंख्या का आधा हिस्सा ऐसा है, जिनके पास स्वास्थ सेवा नहीं पहुंच पाती है. जबकि भारत में स्वास्थ सेवाओं का लाभ उठाने वाले लोग अपनी आमदनी का 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सा इलाज में खर्च करते हैं.
डब्ल्यूएचओ की रपट के अनुसार देश की आबादी का कुल 3.9 फीसदी लोग यानि पांच करोड़ एक लाख भारतीय अपने घरेलू बजट का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा इलाज पर खर्च करते हैं.
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