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लोकसभा चुनाव में छाये ईश्वरचंद विद्यासागर, जानें आखिर क्यों आहत हुई बंगाली अस्मिता

Updated at : 16 May 2019 2:39 PM (IST)
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लोकसभा चुनाव में छाये ईश्वरचंद विद्यासागर, जानें आखिर क्यों आहत हुई बंगाली अस्मिता

कोलकाता : अमित शाह के रोड शो के दौरान मंगलवार 14 मई को कोलकाता में ईश्वरचंद विद्यासागर की प्रतिमा टूट गयी. इस प्रतिमा के टूटने का कारण यह है कि रोड शो में बवाल मचा. भाजपा और टीएमसी इसके लिए एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. राजनीति को अगर दरकिनार करें, तो यह बात […]

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कोलकाता : अमित शाह के रोड शो के दौरान मंगलवार 14 मई को कोलकाता में ईश्वरचंद विद्यासागर की प्रतिमा टूट गयी. इस प्रतिमा के टूटने का कारण यह है कि रोड शो में बवाल मचा. भाजपा और टीएमसी इसके लिए एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. राजनीति को अगर दरकिनार करें, तो यह बात सोलह आने सच है कि ईश्वर चंद विद्यासागर बंगाल के महानायकों में से एक हैं, इसलिए उनकी प्रतिमा के टूटने से आम बंगाली आहत है. ऐसे में यह जरूरी है कि लोग यह जानें कि आखिर कौन थे ईश्वर चंद विद्यासागर जिनकी प्रतिमा टूटने से बंगाली अस्मिता को चोट पहुंची है.

ईश्वर चंद विद्यासागर एक दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री, लेखक, समाज सुधारक एवं मानवतावादी व्यक्ति थे. उन्होंने बांग्ला भाषा को समृद्ध करने के लिए कई कार्य किये, जिसमें बांग्ला लिपि को सरल एवं तर्कसम्मत बनाने का काम भी शामिल है.ईश्वर चंद विद्यासागर का असली नाम ईश्वरचंद बंदोपाध्याय है. इनका जन्म 26 सितंबर 1820 में हुआ था.समाज सुधार के क्षेत्र में ईश्वर चंद को राजा राम मोहन राज का उत्तराधिकारी माना जाता है. ईश्वर चंद ने विधवा विवाह की वकालत की और कई विधवा महिलाओं का पुनर्विवाह भी कराया. इनके प्रयासों से 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह एक्ट पारित कराया गया. इन्हें विद्यासागर की उपाधि कोलकाता के संस्कृत कॉलेज द्वारा दी गयी थी, जिसका अर्थ है ज्ञान का समुद्र. 1839 में ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने लॉ की परीक्षा पास की थी और 1841 में इन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के रूप में ज्वाइंन किया.

ईश्वरचंद ने कुलीन ब्राह्मणों के परिवारों में चल रही एक कुप्रथा को भी बंद कराया, जिसमें मरणासन्न वृद्ध गरीब घर की किशोरियों से विवाह कर लेते थे. इस प्रथा का उद्देश्य यह था कि लड़कियों के घरवाले अपनी बेटी का विवाह ना कर पाने की शर्म से बच जाते थे. लेकिन इस प्रथा के कारण उन किशोरियों का जीवन नारकीय हो जाता था. वे बाल विधवा के रूप में अपने माता-पिता के घर पर ही रहती थीं, लेकिन वे भुखमरी की शिकार होती थीं और अपने घर में मजदूर की तरह रहने को विवश थीं. उन्हें घर से निकलने तक की आजादी नहीं थी. ईश्वरचंद विद्यासागर ने इन महिलाओं की स्थिति में बदलाव लाया और उन्हें नयी जिंदगी दी.

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