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चांचल में बाहुबली के राजमहल की तर्ज पर पंडाल

Updated at : 05 Oct 2018 2:51 AM (IST)
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चांचल में बाहुबली के राजमहल की तर्ज पर पंडाल

मालदा : इस बार की दुर्गा पूजा में चांचल महकमा के दो क्लब ऐसे पंडाल बना रहे हैं जो सभी का ध्यान अपनी ओर खींचेंगे. चांचल शहर के भवानीनगर इलाके के मैत्री संसद परिषद के पूजा मंडप में एसी की व्यवस्था रहेगी और इसके साथ ही मोटू-पतलू, टॉम एंड जेरी, छोटा भीम जैसे मशहूर कार्टून […]

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मालदा : इस बार की दुर्गा पूजा में चांचल महकमा के दो क्लब ऐसे पंडाल बना रहे हैं जो सभी का ध्यान अपनी ओर खींचेंगे. चांचल शहर के भवानीनगर इलाके के मैत्री संसद परिषद के पूजा मंडप में एसी की व्यवस्था रहेगी और इसके साथ ही मोटू-पतलू, टॉम एंड जेरी, छोटा भीम जैसे मशहूर कार्टून चरित्र भी बच्चों का मनोरंजन करेंगे.
दूसरी तरफ चांचल के विवेकानंद स्मृति समिति का पूजा पंडाल बाहुबली सिनेमा के राजमहल की तर्ज पर बनाया जा रहा है. इस पूजा मंडप में देवी दुर्गा की प्रतिमा बाहुबली फिल्म की राजमाता माहिषमती की तरह होगी.
मैत्री संसद परिषद का पूजा मंडप भारतीनगर इलाके के एक विशाल मैदान में तैयार हो रहा है. पूजा आयोजकों ने बताया कि इस बार उनका पूरा मंडप वातानुकूलित रहेगा. मंडप को उत्तराखंड के एक राधा-कृष्ण मंदिर की तरह सजाया जा रहा है. सजावट में पाट, चटाई और मिट्टी के घड़ों का खासतौर पर इस्तेमाल हो रहा है. इस पूजा कमेटी के सचिव शंकू रक्षित ने बताया कि पूरा मंडप असीम मालाकार नामक कलाकार की देख-रेख में तैयार हो रहा है. मूर्ति का निर्माण लालू पाल कर रहे हैं.
पूजा का बजट 11 लाख रुपये रखा गया है. दूसरी तरफ विवेकानंद स्मृति समिति का बाहुबली के राजमहल मॉडल का पूजा पंडाल साल के पत्तों और बांस से बनाया जा रहा है. मंडप के प्रवेश का रास्ता किसी सैन्य दुर्ग की तरह है. पूजा कमेटी के सचिव इन्द्र नारायण मजूमदार ने बताया है कि पूजा का बजट आठ लाख रुपये रखा गया है.
दूध से धोया जाता है मां दुर्गा का स्थान
मालदा. मालदा के इंगलिशबाजार शहर के पुड़ाटुली इलाके के सेनबाड़ी में आज भी 300 साल पुरानी परंपरा के हिसाब से देवी दुर्गा की पूजा होती है. यहां सप्तमी के दिन मां दुर्गा का स्थान 60 मन दूध और गंगा जल से धोया जाता है. इसके बाद देवी के अस्त्र-शस्त्रों और शंख को गंगा जल से स्नान कराया जाता है. तब जाकर मां दुर्गा की उस स्थान पर स्थापना की जाती है. पंचमुंडी आसन को धोते समय प्रवाहित दूध और जल को लेने के लिए इलाके के लोग बड़ी संख्या में जुटते हैं.
अभी इस पूजा का आयोजन सेन परिवार के चार पट्टीदार मिलकर करते हैं. पुड़ाटुली इलाके में रहने वाले सेन परिवार के एक पट्टीदार शांतू सेन ने बताया कि 300 साल पहले उनके पुरखों ने महानंदा नदी में स्नान करने के दौरान देवी दुर्गा का खड्ग, त्रिशूल, वज्र, शंख पाया था. इसके बाद देवी दुर्गा के स्वप्न में आदेश पर इन्हीं अस्त्र-शस्त्रों और शंख का इस्तेमाल कर पूजा शुरु हुई. इस पूजा की खास बात यह है कि देवी के स्थान को पूजा से पहले 60 मन दूध और गंगा जल से धोया जाता है जिसे लोग प्रसाद के रूप में अपने घर में रखते हैं.
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