पूजा परिक्रमा : घास बागान स्पोर्टिंग क्लब ने 12 वर्षों में देवी के 108 रूपों का दर्शन कराने का लिया है संकल्प
श्रीकांत शर्मा
कोलकाता : हावड़ा के घासबागान स्पोर्टिंग क्लब ने देवी दुर्गा के 108 रूपों का दर्शन भक्तों को कराने का संकल्प लिया है. उक्त क्लब इस वर्ष अपनी पूजा का 25 वर्ष पूरा करनेवाला है. यहां हर वर्ष मां दुर्गा के 108 स्वरूपों में से नौ दुर्गा प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है. सप्तमी से लेकर दशमी तक यहां उनकी अाराधना विधि-विधान से होती है. यहां की प्रसिद्ध नौदुर्गा पूजा को देखने के लिए लाखों की भीड़ एकत्रित होती है.
क्लब के सचिव अनिल सिंह बताते हैं कि हमारी पूजा की खासियत हमारी नौ दुर्गा प्रतिमा होती है. यहां हर वर्ष मां के 108 स्वरूपों की नौ-नौ प्रतिमाओं को क्रमवद्ध तरीके से स्थापित किया जाता है. धर्मग्रथों में दुर्गा के सभी 108 नामों की अपनी एक कथा प्रचलित है. वैसे तो देश के अलग-अलग हिस्सों में दुर्गा के अनेक रूपों के मंदिर स्थापित हैं.
नवरात्र में भक्त देश के अलग-अलग भागों में जाकर देवी का पूजन करते हैं, लेकिन देवी के सभी 108 मंदिरों में जाकर पूजा कर पाना संभव नहीं है. लिहाजा हमने भक्तों के लिए अपने मंडल में ही उनके सभी रूपों की स्थापना करने की परंपरा की शुरुआत कर दी.
श्री सिंह कहते हैं कहा जाता है कि कोई भक्त यदि देवी दुर्गा के 108 नामों का जाप कर ले तो मां उसके सभी कष्ट हर लेती हैं. वह बताते हैं कि एक साथ सभी 108 रूपों की प्रतिमा बनाना संभव नहीं है, लिहाजा हर वर्ष मां के नौ रूपों की प्रतिमा बनायी जाती है.
1992 में शुरू हुआ घासबगान स्पोर्टिंग क्लब की दुर्गापूजा में मां के सबसे प्रथम रूप सति की पूजा शुरू हुई और 2003 में जाकर उनके अंतिम रूप ब्रह्मचारिणी की पूजा संपन्न हुई थी. वही क्रम दोबारा चला.
क्लब के अध्यक्ष अर्जुन पात्र कहते हैं कि मां दुर्गा के सभी 108 रूपों की प्रतिमाओं की पूजा संपन्न होते-होते 12 वर्ष का समय लगता है. यहां अब तक मां के सभी रूपों के स्थापना का दो क्रम पूरा हो चुका है. क्लब की पूजा का यह 25 वां वर्ष है. साथ ही मां दुर्गा के प्रथम रूप सति व अन्य नौ की पूजा भी होनी है.
नौ दुर्गा प्रतिमा का निर्माण जिले के जाने-माने कारीगर विश्वनाथ पाल कर रहे हैं, जबकि पंडाल का निर्माण प्रताप गिरि कर रहे हैं. घासबगान के पूजा पंडाल की ऊंचाई करीब 38 फीट होगी.
मूर्तिकार श्री विश्वनाथ पाल कहते हैं : मूर्तिकारी हमारा पुस्तैनी काम है. पिता व दादाजी को मूर्ति बनाता देख वह इस कार्य में पारंगत हुए.
श्री पाल को वर्ष भर दुर्गापूजा का इंतजार होता है. वह कहते हैं कि मूर्ति बनाना जहां उनकी रोजी-रोटी है वहीं इस काम से उन्हें एक अलग संतुष्टि मिलती है.
अन्य पंडालों की प्रतिमा बनाना अलग बात है, लेकिन यहां प्रतिमा में भी पैराणिक गाथाओं का ध्यान रखा जाता है. आज हर जगह हो रहे थीम आधारित दुर्गापूजा के समय यह अपने आप में नायाब है. वह कहते हैं कि देवी के 108 रूपों की प्रतिमा हर वर्ष नौ-नौ कर बनायी जाती है. देवी के 108 स्वरूपों के बारे में पता लगाना भी बड़ा कार्य था.
