पौष मेला में आये डोकरा शिल्पकारों में छायी मायूसी, बिक्री नहीं होने से बढ़ी चिंता

Author Amit kumar
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बीरभूम जिले के बोलपुर शांतिनिकेतन स्थित पूर्वपल्ली मैदान में आयोजित छह दिवसीय पारंपरिक पौष मेला पांचवें दिन में प्रवेश कर गया है.

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मुकेश तिवारी, बीरभूम.

बोलपुर. बीरभूम जिले के बोलपुर शांतिनिकेतन स्थित पूर्वपल्ली मैदान में आयोजित छह दिवसीय पारंपरिक पौष मेला पांचवें दिन में प्रवेश कर गया है. मेला परिसर में 17 से अधिक स्टॉल लगे हैं, लेकिन बांकुड़ा जिले के बीदना शिल्पडांगा से पहुंचे डोकरा शिल्पकारों के चेहरों पर निराशा साफ दिख रही है. गांव के कई परिवार अपनी कलाकृतियां लेकर मेले में आए हैं, लेकिन इस बार डोकरा शिल्प की बिक्री उम्मीद से बेहद कम रही है.

भीड़ के बावजूद नहीं मिल रहे खरीदार

डोकरा शिल्पकार उज्ज्वल मंगल कर्मकार ने बताया कि मेले में भीड़ होने के बावजूद उनकी कलाकृतियों के खरीदार कम हैं. मेले के पांच दिन पूरे होने को हैं, लेकिन कारोबार उम्मीद से काफी नीचे है. हालात ऐसे हैं कि खाने तक का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है. प्रतिदिन छह से सात सौ रुपये केवल भोजन में खर्च हो रहे हैं. देवी-देवताओं, हाथी-घोड़े और सजावटी वस्तुएं सौ रुपये से लेकर 15–16 हजार रुपये तक की कीमत में लाई गई हैं, लेकिन सराहने वाले कम नजर आ रहे हैं.

विदेशी सैलानी कम, नुकसान बढ़ा

शिल्पकारों का कहना है कि इस बार विदेशी पर्यटकों की संख्या भी कम है. ट्रांसपोर्ट और मेहनत का खर्च निकलना मुश्किल हो गया है. आशंका है कि अधिकांश सामान बिना बिके वापस ले जाना पड़ेगा, जिससे नुकसान और बढ़ेगा.

सरकारी मदद नहीं मिलने का आरोप

उज्ज्वल मंगल कर्मकार ने कहा कि डोकरा शिल्प से जुड़े परिवार जर्जर घरों में किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं. राशन के अलावा कोई ठोस सहयोग नहीं मिल रहा है. कच्चे माल में रियायत और उत्पादों के लिए स्थायी बाजार मिलने पर ही इस कला को बचाया जा सकता है. हालात से परेशान होकर कई परिवार अपने बच्चों को इस परंपरागत शिल्प से दूर रख रहे हैं और वे अन्य राज्यों में मजदूरी करने जा रहे हैं. शिल्पकारों ने राज्य और केंद्र सरकार से इस पारंपरिक कला और इससे जुड़े लोगों को संरक्षण देने की मांग उठायी है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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