पुस्तकों को मिल रही चुनौतियों से निपटने की सार्थक पहल नहीं

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आसनसोल : स्थानीय पोलो ग्राउंड में चल रहे पुस्तक मेला में स्टॉल लगानेवाले शहर के मल्टीसेल के संचालक अभिजीत सिंह ने कहा कि इलेक्ट्रानिक्स व तकनीक से बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए यदि सार्थक पहल नहीं हुयी तो पुस्तकों का बाजार धीरे-धीरे सिमटता जायेगा और पुस्तकें अतीत की चीज बन जायेंगी. उन्होंने कहा कि […]

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आसनसोल : स्थानीय पोलो ग्राउंड में चल रहे पुस्तक मेला में स्टॉल लगानेवाले शहर के मल्टीसेल के संचालक अभिजीत सिंह ने कहा कि इलेक्ट्रानिक्स व तकनीक से बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए यदि सार्थक पहल नहीं हुयी तो पुस्तकों का बाजार धीरे-धीरे सिमटता जायेगा और पुस्तकें अतीत की चीज बन जायेंगी. उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है तथा सब कुछ औपचारिक होता जा रहा है.
श्री सिंह ने कहा कि आसनसोल शहर में हिंदी भाषी नागरिकों की संख्या अधिक होने के बाद भी इस समुदाय में पठनीयता की कमी है. यही कारण है कि इतने बड़े पुस्तक मेला लगने के बाद भी उनकी भागीदारी इस आयोजन में काफी कम रहती है. पहले की तुलना में हिंदी पुस्तकों की बिक्री भी कम हो रही है.
यही कारण है कि उन्होंने स्टॉल में हिंदी की पुस्तकें अधिक नहीं रखी है. नये प्रकाशकों की भी पुस्तकें कम हैं. उन्होंने कहा कि पहले मेले में हिंदी साहित्यकार व कॉलेजों के हिंदी विभाग के शिक्षक व रिसर्चर बड़ी संख्या में आते थे. लेकिन उनका आना भी कम हो गया है. पांच दिनों के दौरान गिनती के आधा दर्जन भी साहित्यकार मेले में नहीं दिखे हैं. यह पूछे जाने पर कि आसनसोल में हिंदी माध्यम शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ रही है, तो पुस्तकों की मांग भी बढ़नी चाहिए, तो उनका कहना था कि ऐसी पुस्तकें स्थायी दुकानों को खरीद ली जाती है. पुस्तकालय की मानसिकता है नहीं, इस कारण भी पुस्तकों की मांग कम होती है.
उन्होंने कहा कि हर तबके में पुस्तक पढ़ने की प्रवृत्ति कम हो रही है. युवा पीढ़ी ई-पुस्तकों पर अधिक आकृष्ट है. इसके साथ ही ओएक्सएल ने किंडल गैजेट जारी किया है. इस पर पैकेज में पुस्तकें काफी कम कीमत पर उपलब्ध हो रही है. युवा पीढ़ी इन्हें आसानी से डाउनलोड कर रही है. यही कारण है कि युवा पीढ़ी का पुस्तकों के प्रति क्रेज कम हो रहा है.
पहले बच्चे कॉमिक्स पढ़ने के लिए पुस्तकें खरीदते थे. लेकिन इस समय बच्चों को केंद्र कर कई चैनल चल रहे हैं. उन पर इन काटरूनों को दिखाया जात है. बच्चे इन चैनलों व सीरियलों के प्रति आकर्षित अधिक हो रहे हैं. छोटा भीम, मोटू-पतलू जैसे कॉमिक्स टीवी पर उपलब्ध हैं. इस कारण बच्चों का भी लगाव काफी कम हो रहा है. आम पाठकों में गंभीर विषयों के अध्ययन का रूझान घटता जा रहा है. उन्होंने कहा कि उनके स्टॉल पर राजकमल प्रकाशन, राजपाल प्रकाशन, मनोज प्रकाशन आदि की पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध है. कुछ अनुदित पुस्तकें भी है. जरूरत पड़ने पर गोदाम से पुस्तकें मंगा दी जाती है.
उन्होंने स्वीकार किया कि स्थानीय साहित्यकारों की नयी पुस्तकें नहीं आने के कारण ही उनके स्टॉल पर उनकी पुस्तकें उपलब्ध नहीं है. किसी साहित्यकार या लेखक की किसी पुस्तक का विमोचन भी इस मेले में नहीं हुआ है. इस मोर्चे पर शून्यता का माहौल है. उन्होंने कहा कि रेलवे मैदान में पुस्तकों की बिक्री अधिक होती थी. स्थल में बदलाव होने से बिक्री घटी है. लेकिन पिछले साल की तुलना में इस वर्ष बिक्री बेहतर है.
अचानक बढ़ी ठंड से संख्या में कमी
बुधवार का दिन होने तथा मौसम में अचानक गिरावट आने के कारण पुस्तक मेले में पुस्तक प्रेमियों की संख्या अपेक्षा से कम रही. युवक-युवतियों की संख्या मंगलवार की तुलना में काफी कम थी.
गलतियों की आलोचना को खारिज करता ‘चोखेर आंगूर दादा’
मेला मैदान के बीचोबीच बने मंच पर सांस्कृतिक अनुष्ठान के क्रम में बुधवार को बर्नपुर की नाटय़ संस्था ‘दिघारी’ ने बांग्ला नाटक ‘चोखेर आंगूल दादा’ का मंचन किया. दर्शकों ने इसका काफी आनंद लिया.
नाटककार मनोज मित्र द्वारा रचित और अद्र्य चक्रवर्त्ती के निर्देशन में मंचित इस नाटक के जरिये यह संदेश दिया गया कि गलती सिर्फ घरती पर ही नहीं हो रही है, स्वर्ग में भी होती है. इसलिए गलतियां गिनाने के बजाय उसे सुधारने में ज्यादा ऊर्जा लगानी चाहिए. व्यंग्य के माध्यम से समाज को स्वस्थ संदेश देने की कोशिश को दर्शकों की पूरी वाहवाही मिली. चोखेर आंगूल दादा में दादा का किरदार तापस नंदी, ब्रrा का अद्र्य चक्रवर्ती, चित्रगुप्त का कौस्तव दासगुप्त तथा राक्षस का अभिनय अर्णव गांगुली ने किया.
नाटक में श्री चोखेर आंगूल दादा का कार्य सिर्फ लोगों की गलतियां निकालना ही था. मरने के बाद दादा स्वर्ग पहुंचते हैं. स्वर्ग पहुंचने के बाद भी उनकी आदत में कोई बदलाव नहीं आता है. स्वर्ग में भी एक के बाद एक गलतियां निकालने लगे. इससे स्वर्ग की देवी-देवता भी परेशान रहने लगे. उन्हें सीख दी गयी कि गलती गिनाने के बजाय उसे सुधारने पर घरती भी स्वर्ग बन जायेगी. नाटक मंचन के बाद कोलकाता के कलाकारों ने गीत-संगीत का कार्यक्रम पेश किया.
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