शारदीय नवरात्र आज से, शुरू होगा महाशक्ति का अनुष्ठान

By Prabhat Khabar Digital Desk
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आसनसोल : शारदीय नवरात्र मंगलवार से शुरू होगा. पूरा दिन प्रतिपदा मिल रहा है. जो बुधवार सुबह 06:25 बजे तक है. इसके बाद द्वितिया लग जायेगा. बुधवार को मां के दूसरे स्वरूप की पूजा की जायेगी. स्थानीय शनि मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित तुलसी तिवारी ने कहा कि दिन के 11:37 बजे से 12:23 बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा. इसे कलश स्थापना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. हालांकि सूर्योदय बाद कलश स्थापना कर सकते हैं.
मां की अराधना के लिए प्रथम पहर श्रेष्ठ माना जाता है. बांग्ला व वाराणसी पंचांग के अनुसार इस वर्ष मां का आगमन घोड़ा पर व गमन नर (मनुष्य) की सवारी पर हो रहा है. जिसे शुभ माना जा रहा है. इस बार महानवमी और विजयादशमी एक ही दिन 22 अक्तूबर गुरुवार को है. तिथि में दशमी नहीं मिल पाने के कारण एक ही दिन नवमी और दशमी है.
वैसे तो मंगलवार को समस्त पूर्ण प्रतिपदा होने के कारण प्रात: 05:44 बजे के पश्चात कलश स्थापना का मुहुर्त आरंभ हो जायेगा. यह संध्या 05:18 बजे तक किया जा सकता है.
नवरात्र में कलश स्थापना से नवमी तिथि तक व्रत करने से नवरात्र पूर्ण होता है. तिथि के ह्रास अथवा वृद्धि से इसमें न्यूनता या अधिकता नहीं होती है. इसके तहत 1, प्रतिपदा से सप्तमी र्पयत सप्तरात्र, 2. पंचमी को एकभुक्त, षष्ठी को नक्त व्रत, सप्तमी को अयाचित, अष्टमी को उपवास एवं नवमी को पारण करने से पंचरात्र, 3. सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी के एकभुक्त व्रत से त्रिरात, 4. आरंभ एवं सप्तमी के दो व्रतों से युग्म रात्र, 5. आरंभ या सप्तमी के व्रत से एक रात्र के रूप में जो भी व्रत किया जाये, उसी से अभीष्ट की सिद्धि होती है.
पूजा की सामग्री
अक्षत, दूब, गाय का गोबर, गौमूत्र, पीला सरसो, धूप, दीप, घी, मधु, गुड़, जनेऊ, पान, सुपारी, लौंग, पंचमेवा, विल्व पत्र, फूल, माला, अबीर, गुलाल, अभ्रक, मेंहदी, व हल्दी चूर्ण, रौड़ी, सिंदूर, वस्त्र, कपूर, मौली सूता सहित अन्य सामग्री.
ऐसे करें कलश स्थापना
कलश स्थापना के लिए स्नानादि से निवृत्त होने के पश्चात पूजा स्थल पर रेशम, कंबल या कुश के आसन पर बैठे, एवं ‘ओउम केशवाय नम:’, ‘ओउम माधवाय नम:’, ‘ओउम नारायणाय नम:’, मंत्र के साथ आचमन करें. फिर ‘ओउम ऋषिकेशाय नम:’ मंत्र के साथ हाथ धो लें.
अब पूजन सामग्री पर गंगाजल छिड़क कर उन्हें शुद्ध करें. सुपारी पर मौली लपेट कर उसे श्रीगणोश के रूप में चौकी पर अक्षत रख कर उस पर स्थापित करें. इसके बाद स्वस्ति वाचन करें एवं गणोश भगवान को अक्षत , पुष्प अर्पित कर गणोश अंबिका का पूजन करें. फिर गणोश के दायें अंबिका का आह्वान कर उनका पूजन करें.
चौकी पर माता दुर्गा की प्रतिमा या चित्र सअतापित कर अखंड दीप प्रज्जवलित करें. घट स्थापना के लिए पहले घट पर स्वस्तिक का चिन्ह बनायें एवं घट के कंठ पर मौली लपेंटे. शुद्ध मिट्टी बिछा कर दायें हाथ से भूमि का स्पर्श करते हुए पूजन करें. फिर जाै को मिट्टी में प्रक्षेपित कर मिट्टी पर मंत्रोच्चार के साथ कलश की स्थापना करें. वैसे तो पूजन तीन प्रकार से होता है - राजसी, तामसिक एवं सात्विक. लेकिन इसमें सात्विक पूजा पर ही जोर देना चाहिए. रोज संभव न हो तो एक, तीन, पांच दिन तक (विषम दिन) इसका पाठ करें एवं उसके बाद मां की आरती, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, दंडवत प्रणाम कर क्षमायाचना करने के उपरांत ही पूजन पूर्ण होता है.
ये फूल लें
उड़हूल, श्वेत फूल, सुगंधित फूल, चमेली, बेली, कमल, चंपा, पलाश, अपराजिता, मदार, अर्क, गस्त, सिवार, केवड़ा, कदम, गुलाब आदि.
कलश स्थापना का मुहूर्त
सामान्य प्रात: 05:44 बजे से 09:55 बजे तक
उत्तम- 05:44 बजे से 06:05 बजे तक
उत्तम - 10:36 बजे से 12:40 बजे तक
उत्तम - अपराह्न् 04:01 बजे से 05:17 बजे तक
अति उत्तम - 11:08 बजे से 11:55 बजे तक
वजिर्त काल - अपराह्न् 02:24 बजे से 03:51 बजे तक
कलश स्थापना की सामग्री
कलश, गेहूं, जाै, बालू, आम पल्लव, ढ़क्कन, अरवा चावल, चंदन, सर्व औषधि, जटामासी, वस्त्र, शिलाजीत, हल्दी, दूध, पंच गव्य, सप्त मृत्तिका, पंच रत्न, गंगाजल, जल, सप्त धान्य, सुपारी, द्रव्य, नारियल, लाल वस्त्र सहित अन्य सामग्री
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