वाणी पर नियंत्रण रखें : गिरीशानंद

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कोलकाता: ‘वाणी का बहुत प्रभाव पड़ता है, अत: बोलते वक्त हमें सदैव सचेत रहना चाहिए और इन पांच बातों का ध्यान रखना चाहिए कि जो हम कह रहे हैं वह सत, हित, मित, आवश्यक और अवसरोचित है या नहीं. यदि आप ऐसा सत्य बोलें, जिससे समाज का नुकसान हो जाये, वह पूर्ण सत्य नहीं है. […]

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कोलकाता: ‘वाणी का बहुत प्रभाव पड़ता है, अत: बोलते वक्त हमें सदैव सचेत रहना चाहिए और इन पांच बातों का ध्यान रखना चाहिए कि जो हम कह रहे हैं वह सत, हित, मित, आवश्यक और अवसरोचित है या नहीं. यदि आप ऐसा सत्य बोलें, जिससे समाज का नुकसान हो जाये, वह पूर्ण सत्य नहीं है. पूर्ण सत्य वही है, जो हमें बुद्धिमान सिद्ध करे, समाज का हित करे.’ ये उद्गार स्वामी गिरीशानंदजी महाराज ने राजस्थान जनकल्याण ट्रस्ट की ओर से राधाष्टमी के उपलक्ष में कला मंदिर सभागार में आयोजित पंचदिवसीय महारास कथा के दूसरे दिन भगवान कृष्ण और गोपियों के निश्चल प्रेम पर प्रवचन करते हुए व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि प्रेम और स्वार्थ में बहुत बड़ा फर्क है.

जो प्रेमी होता है, वह अपने आराध्य के सुख में सुखी होता है और जो स्वार्थी होता है, वह अपने सुख में व्यवधान पड़ते ही अपने आराध्य पर भी क्रुद्ध हो जाता है. प्रेमी की पहचान करो कि आखिर वह आपसे कितना प्रेम करता है. इसके लिए कभी उसके मन के खिलाफ काम करो और देखो कि इसके बाद भी वह आपका प्रेमी रहता है या नहीं.

स्वामी गिरीशानंद जी ने कहा कि गोपियों ने भगवान से प्रार्थना की, भगवान ने प्रसन्न होकर कहा कि मैं आपके साथ महारास करूंगा, वेणुनाद कर बुलाया और आने पर उनका स्वागत भी किया, लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी कर डाला कि आप यहां क्यों आयी हैं. यहां गोपियों के प्रेम की परीक्षा हो रही थी. गोपियों को मालूम था कि कृष्ण ने स्वयं बुलाया है और अब यह प्रश्न पूछ रहे हैं, लेकिन फिर भी गोपियों ने कृष्ण से यह नहीं कहा कि आप ही ने तो बुलाया है. जहां तक हो सके प्रेम को छुपाना चाहिए.

यह धन है, संपत्ति है और गोपियां यही कर रही थीं. उन्होंने कहा कि भगवान को प्रेस से बुलाइये, वह अवश्य आयेंगे, स्वयं आपके हृदय में जगह बनायेंगे और आपके मन मंदिर को स्वयं साफ-सुथरा करके वहां विराज जायेंगे, क्योंकि भगवान जब जीवन में आ जाते हैं, तो सारी कामनाएं समाप्त हो जाती हैं. गोपियां इसका सर्वोत्तम उदाहरण है, जिन्होंने श्रीकृष्ण के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया. महाराज श्री ने श्री मद्भागवत महापुराण के 11वें स्कंद का जिक्र करते हुए कहा कि भगवान कहते हैं, जो मेरे लिये अपना सर्वस्व दे देता है, मैं उनके पीछे-पीछे चलता हूं, क्योंकि मैं उनका ऋणी हो जाता हूं. ऐसे भक्त कोई संकल्प लें तो मैं उसे पूरा कर देना चाहता हूं. कथा प्रारंभ से पूर्व रमेश बाजोरिया, सुरेंद्र कानोड़िया, राजीव काबरा, श्यामलाल जालान, महेंद्र सेठी, कमल किशोर अग्रवाल, ओमप्रकाश भरतिया, कृष्णस्वरूप दीक्षित, घीसाराम गोयल ने व्यासपीठ को नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया. सत्यनारायण तिवाड़ी ने ‘ऐसा क्या जादू कर डाला, मुरली जादूगरी ने..’ भजन सुनाकर श्रद्धालुओं को भाव-विभोर किया. प्रचार सचिव सुरेश कुमार भुवालका ने यह जानकारी दी है.

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