दलितों पर अत्याचार के मामले में यूपी शीर्ष पर, क्या मायावती को मिलेगा इस स्थिति का फायदा?

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं. इस चुनाव को जीतने के लिए हर पार्टी ने कमर कस ली है. कांग्रेस जहां अपनी साख वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी एक कर रही है, वहीं अखिलेश यादव अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, तो मायावती दलितों को सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचना चाह रही है. […]
उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं. इस चुनाव को जीतने के लिए हर पार्टी ने कमर कस ली है. कांग्रेस जहां अपनी साख वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी एक कर रही है, वहीं अखिलेश यादव अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, तो मायावती दलितों को सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचना चाह रही है. वहीं भाजपा किसी तरह उत्तर प्रदेश में भगवा झंडा लहराने को बेचैन है. इस परिस्थिति में दलितों पर अत्याचार का मुद्दा प्रदेश के चुनाव में अहम होगा इसमें कोई दो राय नहीं है.
उत्तर प्रदेश में दलितों पर बढ़ा है अत्याचार
यूपी में राजनीतिक पार्टियों के मध्य जारी इस सत्ता संघर्ष के बीच यह तो तय है कि इस चुनाव में दलितों का मुद्दा अहम होगा. लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार दलितों पर अत्याचार के सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश में ही होते हैं.
अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों से अपराध के सबसे अधिक 8,358 मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए हैं. ये मामले 2015 में दर्ज किए गए. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, ये मामले 2014 के मुकाबले 3.50 प्रतिशत अधिक हैं. वर्ष 2014 में दलितों के साथ अपराध के 8,075 मामले दर्ज किये गये थे.हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर इन आंकड़ों में 4.51 प्रतिशत की गिरावट आयी है. जहां 2014 में 47,064 मामले थे, वहीं 2015 में ये मामले घटकर 45,003 रह गये.
मायावती को कितना मिलेगा फायदा
बसपा नेता मायावती की राजनीति का आधार दलित हैं और ऐसे में जबकि वह सत्ता से बाहर हैं और दलितों पर यूपी में अत्याचार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, यह सवाल लोगों के जेहन में घूम रहा है कि क्या मायावती को इस स्थिति का फायदा मिलेगा. वैसे भी इस चुनाव में मायावती दलितों और मुसलमानों को एक साथ लाने में जुटीं हैं और अगर उनका यह प्रयोग सफल रहा, तो उन्हें फायदा मिलेगा इसमें कोई दो राय नहीं है. सपा में जारी जंग से पार्टी की छवि बिगड़ रही है, ऐसे में बहुत संभव है कि बसपा को इसका फायदा मिले. अब देखना यह है कि बसपा इस सकारात्मक स्थिति का किस तरह फायदा उठाती हैं. हालांकि गौरतलब यह भी है कि मायावती की पार्टी के कई दिग्गज उनका साथ छोड़ भाजपा में जा चुके हैं.
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