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भारत बंद ने ले ली एक मरीज की जान, प्रदर्शन में फंसे पीड़ित ने कहा- मैं पिता को मरते हुए देख रहा था और....

Updated at : 03 Apr 2018 9:21 AM (IST)
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भारत बंद ने ले ली एक मरीज की जान, प्रदर्शन में फंसे पीड़ित ने कहा- मैं पिता को मरते हुए देख रहा था और....

बिजनौर : दलित संगठनों द्वारा सोमवार को बुलाये गये भारत बंद के दौरान जगह-जगह प्रदर्शन और हिंसा की खबरें आ रहीं थीं. इन सबके बीच एक दिल झकझोर कर रख देने वाली तस्वीर बिजनौर से सामने आयी है. यह तस्वीर 68 वर्षीय बीमार बुजुर्ग की है जिसमें उनका बेटा कंधे पर लादकर अस्पताल की ओर […]

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बिजनौर : दलित संगठनों द्वारा सोमवार को बुलाये गये भारत बंद के दौरान जगह-जगह प्रदर्शन और हिंसा की खबरें आ रहीं थीं. इन सबके बीच एक दिल झकझोर कर रख देने वाली तस्वीर बिजनौर से सामने आयी है. यह तस्वीर 68 वर्षीय बीमार बुजुर्ग की है जिसमें उनका बेटा कंधे पर लादकर अस्पताल की ओर दौड़ लगाता नजर आ रहा है, लेकिन बीच सड़क पर प्रदर्शनकारियों के हंगामे की वजह से उन्हें समय पर इलाज नहीं मिल पाया और उसने दम तोड़ दिया.

जानकारी के अनुसार बिजनौर के बारुकी गांव निवासी 68 वर्षीय लोक्का सिंह बेहताशा पेट दर्द से तड़प रहे थे और सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी. अपने पिता को दर्द से कराहते देख बेटे ने अपने बीमार पिता को ऐंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाना चाहा लेकिन यह संभव नहीं हो सका. इसका कारण था बीच सड़क में प्रदर्शनकारियों का जाम… इसके बाद पिता को कंधे पर लादकर जब बेटा अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टरों ने पिता को मृत घोषित कर दिया.

बेटे को जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने अपने बीमार पिता को प्राइवेट अस्पताल या मेरठ के किसी बड़े अस्पताल ले जाने को कहा था लेकिन समय और पैसों की कमी के चलते रघुवर ने पहला विकल्प चुना. बेटे ने बताया, कि वह क्रोनिक अस्थमा से पीड़ित थे. रविवार रात जब उनकी स्थिति बिगड़ी तो उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. डॉक्टरों ने उनकी जांच कर इलाज करना शुरू किया लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नजर नहीं आया.

बेटे ने बताया कि उक्त अस्पताल और जिला अस्पताल के बीच एक किमी का फासला है, लेकिन जुडगी क्रॉसिंग में उनकी ऐम्बुलेंस फंस गयी. वहां सौ से ज्यादा प्रदर्शनकारी नारेबाजी कर रहे थे और जाम का नजारा था. उसने कहा, कि मैंने उनसे विनती की कि मुझे जाने दें. मैंने एक हद तक जाकर उनसे आग्रह किया लेकिन किसी ने मेरी चीख नहीं सुनी. कोई वहां से नहीं हिला. मैं ऐंबुलेंस के अंदर अपने पिता को मौत के करीब जाते हुए देख रहा था. मुझे नहीं पता था कि क्या करना है…मैं किसी भी हालत में उन्हें बचाना चाहता था इसलिए मैंने उन्हें कंधे में उठाया और दौड़ना शुरू किया.

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