कहां चले गए लखनऊ के 69 मासूम? घर से निकले बच्चे नहीं लौटे वापस, बच्चों के गायब होने से राजधानी में मचा हड़कंप

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लापता मासूमों की तलाश जारी (AI)

राजधानी लखनऊ में पिछले तीन वर्षों में दो से छह साल की उम्र के 69 बच्चे लापता हो चुके हैं, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला है. एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल इस बड़ी चुनौती से जूझ रही है. मानव तस्करी गिरोह और बच्चों के गुम होने के पीछे के कारणों का खुलासा.

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UP Crime : राजधानी लखनऊ में पिछले तीन वर्षों में दो से छह साल की उम्र के 69 बच्चे लापता हो चुके हैं. इनमें कई ऐसे मासूम हैं, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिल सका है. एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग (एएचटी) सेल के सामने बच्चों को तलाशने की बड़ी चुनौती है.

तीन साल में 69 बच्चों के लापता होने का मामला

लखनऊ में वर्ष 2023 से अब तक दो से छह साल की उम्र के 69 बच्चे लापता हुए हैं. ये वे मामले हैं, जिनकी विवेचना एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल को सौंपी गई है. इसके अलावा कई ऐसे मामले भी हैं, जिनमें बच्चे घर से निकले और वापस नहीं लौटे. कुछ मामलों में तो अभिभावक गुमशुदगी तक दर्ज नहीं करा सके.

मानव तस्करी गिरोह भी बड़ी चुनौती

राजधानी में सक्रिय मानव तस्करी गिरोह पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं. आरोप है कि गिरोह छोटे बच्चों और किशोरियों को निशाना बनाते हैं. लड़कों को कथित तौर पर मजदूरी के लिए बेच दिया जाता है, जबकि कुछ किशोरियों को देह व्यापार में धकेलने और कुछ को शादी के लिए बेचने के मामले सामने आते हैं. हालांकि, हर गुमशुदगी का संबंध मानव तस्करी से नहीं होता. कई बच्चे माता-पिता की डांट या किसी बात से नाराज होकर घर छोड़ देते हैं और फिर अपना नाम-पता बदल लेते हैं, जिससे उनकी तलाश और मुश्किल हो जाती है.

जनवरी से जुलाई तक 15 बच्चों को खोजा

एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल ने इस वर्ष जनवरी से जुलाई के बीच 15 लापता बच्चों को खोजकर उनके परिवारों से मिलाया है. वहीं, 24 बच्चों की तलाश अभी भी जारी है. टीम लगातार अलग-अलग स्तर पर इन बच्चों को ट्रेस करने का प्रयास कर रही है.

छोटे बच्चों को तलाशना सबसे मुश्किल

एएचटी सेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती नवजात और दो से चार साल की उम्र के बच्चों को खोजने की है. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, कई मामलों में संबंधित थानों में लंबे समय तक विवेचना चलती रहती है. बाद में मामला एएचटी सेल को सौंपा जाता है. इस दौरान बच्चे की उम्र और शारीरिक बनावट में काफी बदलाव आ जाता है. यही वजह है कि पुराने फोटो और पहचान के आधार पर बच्चे को ट्रेस करना कठिन हो जाता है.

किशोर बदल लेते हैं नाम और पहचान

अधिकारियों के मुताबिक, घर से नाराज होकर निकलने वाले किशोर और किशोरियां कई बार अपनी *पहचान तक बदल लेते हैं. वे नाम, पता और यहां तक कि धर्म भी बदल लेते हैं. ऐसे मामलों में पुलिस के लिए उनकी पहचान कर पाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

सीमित संसाधनों से जूझ रही एएचटी सेल

बच्चों की तलाश करने वाली एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल में फिलहाल एक इंस्पेक्टर, 10 उपनिरीक्षक और चार अन्य पुलिसकर्मी तैनात हैं. अधिकारियों का कहना है कि सीमित स्टाफ और तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण लंबित मामलों की जांच प्रभावित होती है. इसके बावजूद टीम लगातार लापता बच्चों की तलाश में जुटी है और पुराने मामलों को भी खंगाल रही है.

थानों में जांच में देरी भी बड़ी वजह

मीडिया रेपोर्ट्स के अनुसार एडीसीपी क्राइम किरण यादव ने बताया कि कई बार अलग-अलग थानों में दर्ज गुमशुदगी के मामलों की विवेचना में लापरवाही या देरी हो जाती है. जब संबंधित थानों से मामले हल नहीं होते हैं, तब उन्हें ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल को सौंपा जाता है. तब तक बच्चे की उम्र काफी बढ़ चुकी होती है, जिससे पुराने फोटो और पहचान के आधार पर उसे ट्रेस करने में परेशानी आती है. इसके बावजूद टीम लगातार बच्चों को खोजने का प्रयास करती रहती है. पिछले वर्ष भी एएचटी सेल ने 11 बच्चों को खोज निकाला था.

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रवि रंजन कुमार

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By रवि रंजन कुमार

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