कुर्सी छिनी तो भी नहीं हारे उमाशंकर सिंह, जनता ने फिर जिताकर भेजा सदन: बसपा के इकलौते विधायक की वो कहानी जो हमेशा याद रहेगी

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दिवंगत उमाशंकर सिंह

UP News: बसपा के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह की कहानी कई उतार-चढ़ावों से भरी है. विधायक बनने के बाद सदस्यता चली गई, लेकिन जनता ने उन्हें फिर सदन में पहुंचा दिया. उनकी वापसी की ये कहानी असाधारण है.

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UP News: उमाशंकर सिंह की कहानी को अगर सिर्फ इस एक लाइन में समेट दिया जाए कि वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के इकलौते विधायक थे, तो शायद उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे दिलचस्प अध्याय छूट जाएगा. उनकी कहानी में एक ऐसा मोड़ भी आया, जब विधायक बनने के बाद उनकी सदस्यता चली गयी और फिर उसी राजनीतिक दौर में उन्होंने दोबारा चुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी की.

2012 में पहली बार विधायक बने, लेकिन दो साल बाद शुरू हुई मुश्किल

बलिया के खनवर में जन्मे उमाशंकर सिंह ने 2012 में बसपा के टिकट पर रसड़ा से पहली बार विधानसभा चुनाव जीता. उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका जन्म 2 जनवरी 1971 और जन्मस्थान खनवर, बलिया दर्ज है. उनकी शैक्षणिक योग्यता इंटरमीडिएट और व्यवसाय उद्योग-कारखाना आदि दर्ज है. लेकिन विधायक बनने के बाद उनकी राजनीति के सामने एक बड़ी कानूनी चुनौती आ खड़ी हुई. 18 दिसंबर 2013 को अधिवक्ता सुभाष चंद्र सिंह ने लोकायुक्त के यहां शिकायत की कि उमाशंकर सिंह विधायक रहते हुए सरकारी ठेके ले रहे हैं. शिकायत में उनकी कंपनी छात्रशक्ति इंफ्रास्ट्रक्चर का भी जिक्र था.

लोकायुक्त की जांच से लेकर राज्यपाल के फैसले तक

मामला बढ़ा तो लोकायुक्त ने जांच शुरू की. पुरानी रिपोर्टों के मुताबिक जांच में सरकारी ठेकों से जुड़े आरोप सही पाए गये. 2015 में राज्यपाल की ओर से उनकी सदस्यता समाप्त करने की कार्रवाई हुई, जिसके खिलाफ वह अदालत भी गये. बाद में चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बाद जनवरी 2017 में उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त कर दी गयी. यही उनकी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ था. एक नेता के लिए विधायक की कुर्सी जाना राजनीतिक अंत माना जा सकता था, लेकिन उमाशंकर सिंह के लिए यह अंत नहीं, बल्कि वापसी की शुरुआत बनी.

सदस्यता गयी, चुनाव आया और फिर जनता ने भेज दिया विधानसभा

2017 का विधानसभा चुनाव सामने था. भाजपा की मजबूत लहर के बीच उमाशंकर सिंह फिर बसपा के टिकट पर रसड़ा पहुंचे. नतीजा आया तो वह दोबारा विधायक बन चुके थे. यानी जिस दौर में उनकी पिछली सदस्यता खत्म हुई थी, उसी राजनीतिक चक्र में वह फिर जनता के वोट से विधानसभा पहुंच गये. यही वह प्रसंग है, जो उनकी राजनीतिक यात्रा को सामान्य चुनावी जीत-हार की कहानियों से अलग करता है.

फिर आया 2022... और बसपा की पूरी यूपी में बची सिर्फ एक सीट

2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. प्रदेश में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली—रसड़ा और उस एक सीट का नाम था उमाशंकर सिंह. उन्होंने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की और विधानसभा में बसपा की आवाज बन गये. बाद में मायावती ने उन्हें बसपा विधानमंडल दल का नेता भी बनाया. यहीं से उनके नाम के साथ एक नया विशेषण जुड़ गया—“बसपा के इकलौते विधायक.”

दूसरी पहचान राजनीति से बाहर थी—सामूहिक विवाह

उमाशंकर सिंह की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनका सामाजिक काम भी बताया जाता रहा है. 2012 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने 251 गरीब जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया. अगले कार्यकाल में इसी तरह 351 जोड़ों की सामूहिक शादी करायी गयी. यह काम उनकी राजनीति की उन तस्वीरों में शामिल रहा, जिसे चुनावी भाषणों से अलग देखा गया.

कोरोना आया तो राजनीति पीछे, मदद आगे

कोरोना महामारी के दौरान भी उनकी मदद से जुड़ी कई रिपोर्टें सामने आयीं. इलाज में आर्थिक सहायता, अस्पतालों को ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध कराने और जरूरतमंदों की मदद की खबरें प्रकाशित हुईं. 2020 में उन्होंने कोरोना संकट के दौरान विधायक निधि से 15 लाख रुपये देने की घोषणा भी की थी. 2022 में वाराणसी में इलाज करा रही एक युवती की मदद के लिए भी उन्होंने 50 हजार रुपये की तत्काल सहायता भेजी और इलाज का पूरा खर्च उठाने की जिम्मेदारी लेने की बात सामने आयी.

आखिरी दौर में भी विकास की वही जिद

निधन से कुछ समय पहले भी उनका एक अलग रूप सामने आया. रसड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपने निजी खर्च से अस्पताल के भवन और अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के विकास की घोषणा की थी. इस पहल को लेकर उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से भी संपर्क किया था. यानी राजनीति में उनके आखिरी वर्षों की एक तस्वीर ऐसी भी थी, जिसमें विधायक की निधि से आगे बढ़कर निजी संसाधनों से सरकारी अस्पताल को बेहतर बनाने की कोशिश नजर आती है.

एक तरफ विवाद, दूसरी तरफ जनसेवा—यही था उमाशंकर का विरोधाभास

उमाशंकर सिंह की कहानी को सिर्फ ‘गरीबों के मसीहा’ या सिर्फ ‘ठेकेदार से विधायक बने नेता’ जैसे एकतरफा विशेषण में बांधना शायद सही नहीं होगा. उनके राजनीतिक जीवन में सरकारी ठेकों को लेकर लोकायुक्त की जांच और सदस्यता समाप्त होने का विवाद भी रहा और दूसरी ओर सामूहिक विवाह, कोरोना काल में सहायता तथा अस्पताल के कायाकल्प जैसे जनसेवा के काम भी चर्चा में रहे. यही विरोधाभास उनकी कहानी को दिलचस्प बनाता है.

और सबसे बड़ा सवाल—कुर्सी जाने के बाद भी जनता ने साथ क्यों नहीं छोड़ा?

2012 में विधायक बने. सरकारी ठेकों के विवाद में सदस्यता गयी. 2017 में फिर चुनाव जीता. 2022 में बसपा की पूरी यूपी में सिर्फ एक सीट बची तो वह भी रसड़ा की थी. और आखिर में वह तीन बार के विधायक और बसपा विधानमंडल दल के नेता के रूप में याद किये गये.

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Tilak Kumar

लेखक के बारे में

By Tilak Kumar

तिलक कुमार पिछले 14 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है. अमर उजाला, प्रभात खबर, जनसंदेश टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में क्राइम रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं. अपराध, राजनीति और हाइपरलोकल पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता के क्षेत्र हैं. मैदानी रिपोर्टिंग के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली खबरों को पाठकों तक पहुंचाया है. जमीनी मुद्दों की गहरी समझ और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग उनकी पहचान रही है. वर्तमान में वह प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ जुड़े हुए हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध तथा जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार लेखन और रिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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