रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद : 10 दिनों में दो पर्यवेक्षकों के नाम सुझाये इलाहाबाद हाइकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट, पढ़ें क्या है पूरा विवाद

By Prabhat Khabar Digital Desk
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नयी दिल्ली / इलाहाबाद : सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद में पर्यवेक्षक के लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से दो न्यायिक अधिकारियों के नाम दस दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह आदेश उससमय आया, जब इलाहाबाद हाइकोर्ट ने शीर्ष अदालत को बताया था कि दो पर्यवेक्षकों में से एक पर्यवेक्षक सेवानिवृत्त हो चुके हैं, वहीं दूसरे पर्यवेक्षक को पदोन्नति दे दी गयी है. मालूम हो कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त को सुनवाई करते हुए कहा था कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में निर्णायक सुनवाई की शुरुआत पांच दिसंबर से शुरू की जायेगी.

क्या है रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को अदालत से बाहर सुलझाने का सुझाव सुप्रीम कोर्ट ने दिया है. मालूम हो कि छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गयी थी. इसका मुकदमा आज भी लंबित है. क्या है रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद और अब तक के प्रमुख घटनाक्रम आइए एक नजर डालें.

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद : 10 दिनों में दो पर्यवेक्षकों के नाम सुझाये इलाहाबाद हाइकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट, पढ़ें क्या है पूरा विवाद

1528 : अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण कराया गया, जिसे सनातन धर्मावलंबी भगवान राम की जन्मस्थली मानते हैं. माना जाता है कि मुगल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवायी थी. इस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था.

1853 : सनातन धर्मावलंबियों का आरोप है कि राम मंदिर को तोड़ कर ही मस्जिद का निर्माण कराया गया. इस मुद्दे को लेकर हिंदू-मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई थी.

1859 : ब्रिटिश सरकार ने विवादित भूमि के पास तार घेर कर मुस्लिम और हिंदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी.

1885 : पहली बार अदालत में मामला पहुंचा. महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की थी.

23 दिसंबर, 1949 : करीब 50 हिंदुओं ने मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी. इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा की जाने लगी. उसके बाद मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया.

16 जनवरी, 1950 : फैजाबाद अदालत में गोपाल सिंह विशारद ने अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी. साथ ही उन्होंने मूर्ति हटाने पर रोक लगाने के लिए न्यायिक आदेश की मांग की.

5 दिसंबर, 1950 : महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थना जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति रखने को लेकर मुकदमा दायर किया. साथ ही उन्होंने पहली बार मस्जिद को ‘ढांचा’ का नाम दिया.

17 दिसंबर, 1959 : हिंदू साधु-संतों के संगठन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद से संबद्ध निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया.

18 दिसंबर, 1961 : उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया.

1984 : विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने बाबरी मस्जिद का ताला खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने और एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया. एक समिति भी गठित की गयी.

1 फरवरी, 1986 : फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी. ताला दोबारा खोले गये. नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की.

जून 1989 : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने विहिप को औपचारिक समर्थन देकर मंदिर आंदोलन को तेज कर दिया.

1 जुलाई, 1989 : भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवां मुकदमा दाखिल किया गया.

9 नवंबर, 1989 : तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी.

25 सितंबर, 1990 : भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली. इसके बाद देश में सांप्रदायिक दंगे भी हुए.

नवंबर 1990 : आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया. भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया. सिंह ने वाम दलों और भाजपा के समर्थन से सरकार बनायी थी. बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

30 नवंबर 1990 : विवादित भूमि पर मंदिर बनाने को लेकर पहली बार हिंदू धर्मावलंबी कार सेवक के रूप में अयोध्या पहुंचे. उससमय प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी. सुरक्षाकर्मियों और कारसेवक की भिड़ंत में कई कारसेवक मारे गये और घायल हुए.

अक्टूबर 1991 : उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आसपास की विवादित 2.77 एकड़ भूमि को राज्य सरकार के अधिकार में ले लिया.

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद : 10 दिनों में दो पर्यवेक्षकों के नाम सुझाये इलाहाबाद हाइकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट, पढ़ें क्या है पूरा विवाद

6 दिसंबर, 1992 : हजारों की संख्या में एक बार फिर कार सेवक अयोध्या पहुंचे और इस बार बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी. इसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए. जल्दबाजी में एक अस्थाई राम मंदिर का निर्माण कराया गया. प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया.

16 दिसंबर, 1992 : मस्जिद की तोड़फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए एमएस लिब्रहान आयोग का गठन किया गया.

जनवरी 2002 : प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया. इसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था.

अप्रैल 2002 : अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर इलाहाबाद हाइकोर्ट में तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की.

मार्च-अगस्त 2003 : इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई शुरू की. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने दावा किया कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं. मुस्लिम समुदायों में इसे लेकर भिन्न-भिन्न मत थे.

सितंबर 2003 : एक अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाये.

अक्टूबर 2004 : आडवाणी ने भाजपा की ओर से अयोध्या में मंदिर निर्माण की प्रतिबद्धता दोहरायी.

जुलाई 2005 : संदिग्ध इस्लामी आतंकवादियों ने विस्फोटक से भरी एक जीप का प्रयोग कर विवादित स्थल पर हमला कर दिया. सुरक्षा बलों ने पांच आतंकियों को मार गिराया.

जुलाई 2009 : लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी.

28 सितंबर 2010 : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद हाइकोर्ट को विवादित मामले में फैसला देने से रोकनेवाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया.

30 सितंबर 2010 : इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. पीठ ने विवादित भूमि को तीन भागों में बांटने का फैसला सुनाया. इलाहाबाद हाइकोर्ट ने बहुमत से फैसला किया कि विवादित भूमि, जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, को हिंदू गुटों को दे दिया जाये. वहां से रामलला की प्रतिमा नहीं हटायी जाये. वहीं, निर्मोही अखाड़े के कब्जे में रहे सीता रसोई और राम चबूतरा को निर्मोही अखाड़े के पास रहने का फैसला सुनाया. जबकि, विवादित भूमि के कुछ हिस्सों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं, इसलिए इस भूमि का एक-तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे देने का फैसला दिया. तीन जजों की पूर्ण विशेष पीठ का यह पूरा फैसला करीब दस हजार पन्नों में आया.

21 मार्च 2017 : राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश की है. चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा है कि अगर दोनों पक्ष राजी हो, तो वो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करने को तैयार हैं.

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