अनोखी पहल : शादी के कार्ड में देवी-देवताओं की जगह छपवायी बहुजन समाज के नायकों की तसवीर

By Prabhat Khabar Digital Desk
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इलाहाबाद :इन दिनों एक शादी का कार्ड सोशल मीडिया पर खासा वायरल हो रहा है. यह कार्ड है लखनऊ विश्‍वविद्यालय के शोध छात्र सुरेश यादव सत्यार्थी का. इस कार्ड की खासियत ये है कि इस पर देवी-देवताओं की तसवीर की जगह बहुजन समाज के नायकों बिरसा मुंडा, पेरियार रामास्वामी, बाबा साहब अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, पेरियार ललई सिंह यादव और वीपी मंडल की तसवीर छपी है.

सुरेश के मित्र रवींद्र सिंह ने इस शादी के कार्ड को अपने फेसबुक वाल पर पोस्‍ट किया. उन्‍होंने लिखा कि कौन कहता है आसमान मे सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो.... उन्‍होंने लिखा कि हम सब जिस पारिवारिक और सामाजिक परिवेश से आते है वह घोर ब्राह्मणवादी और परम्परानिष्ठ होता है. ऐसे माहौल मे पारिवारिक अग्रजों नाते-रिश्तेदारों और गांव के बुजुर्गों के मानस मे गहरे पैठे परम्परावादी, ब्राह्मणवादी मूल्यों और मान्यताओं के विपरीत जाकर जनवादी और बहुजनी ढंग से सबकी उपस्थिति मे वैवाहिक कार्यक्रम करना एक बड़ी और नयी पहल कही जा सकती है.

इसी प्रकार बिहार के रोहतास जिला मुख्‍यालय सासाराम में एक विवाह के दौरान संविधान विशेषज्ञों ने संविधान पर चर्चा की. मोरसराय ग्राम के राजकुमार सिंह के पुत्र सुधांशु रंजन की शादी 21 मई को भवपोखर निवासी राजकुमार सिंह की पुत्री विभा सिंह से संपन्‍न हुई. इस शादी में एक अनोखी पहल शुरू की गयी. शादी के बाद रात के रात 10 बजे से 12 बजे तक संविधान विशेषज्ञों की टीम ने भारतीय संविधान पर चर्चा की. पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें...

रवींद्र ने लिखा है कि हम सब अपने घर से बाहर उच्च शिक्षा हेतु जब विभिन्न शहरों-महानगरों मे आते है तो यहां गांव की जड़ता के बरक्स कुछ न कुछ जुम्बिश दिखलायी पड़ती रहती है जिससे कुछ लोग अनायास ही आकर्षित/प्रभावित हो उससे जुड़ जाते है और पूरी ताकत से 'ब्राह्मणवाद की छाती पर..बिरसा..फूले.. अम्बेडकर' जैसे नारे लगाते और कमरों की दीवारों पर मार्क्स-लेनिन ,बिरसा-फुले-अम्बेडकर-पेरियार-ललई-मण्डल की फोटो चस्पा कर क्रांतिकारी और बहुजनवादी होने की खुशफहमी पाल लेते है.

अनोखी पहल : शादी के कार्ड में देवी-देवताओं की जगह छपवायी बहुजन समाज के नायकों की तसवीर

लेकिन घर जाने पर बरामदे मे टंगी हनुमान, लक्ष्मी, गणेश, विंध्याचल आदि की फोटो उतारने और दादा को विभिन्न कर्मकांडो को रोकने मे धुकधुकी छूट जाती है और सारी क्रांतिकारिता धराशाई हो जाती है. लेकिन भाईसुरेश 'सत्यार्थी' ने धारा के विपरीत जाकर 'जोखिम' लेने का निर्णय लिया और अपने विवाह-आमंत्रण पत्र मे किसी भी ब्राह्मणवादी शब्द (चिरंजीवी, आयुष्मती, शुभ-अशुभ, स्वर्गीय इत्यादि) और देवी-देवताओं के चित्र लगाने के बजाय अपनी विरासत और महान पूर्वजो बिरसा-फुले-अम्बेडकर-पेरियार रामास्वामी-पेरियार ललई-मण्डल- का स्मरण और नमन किया है.

और विवाह भी परम्परा से भिन्न और कर्मकांड से मुक्त करने का निश्चय किया है. दोनो पक्षो के वरिष्ठजनों को ब्राह्मण की गैरमौजूदगी मे लिखा-पढ़ी (कॉन्ट्रैक्ट) और जनवादी तरीके से दो-साथियों के संग रहने (जन्म-जन्मांतर की रूढ़ मान्यता को अस्वीकार करते हुए) का इरादा करना एक दुष्कर कार्य था लेकिन "दोनों साथियों" के दृढ़ इरादे के सम्मुख जीत अंततः' युवाओं' की हुई.

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