Bhubaneswar News: कुदोपाली पर आधारित पुस्तक विश्व मंच पर ओडिशा की वीरता को नयी पहचान दिलायेगी : धर्मेंद्र प्रधान

Updated at : 11 Jan 2026 12:15 AM (IST)
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Bhubaneswar News: कुदोपाली पर आधारित पुस्तक विश्व मंच पर ओडिशा की वीरता को नयी पहचान दिलायेगी : धर्मेंद्र प्रधान

Bhubaneswar News: ‘कुदोपाली की गाथा: 1857 की अनकही कहानी’ का 10 भाषाओं में विमोचन केंद्रीय मंत्री ने किया.

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Bhubaneswar News: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को भारत मंडपम में नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 का उद्घाटन किया. इस वर्ष के मेला में ओडिशा के 1857 के संग्राम के एक अब तक कम चर्चित अध्याय ‘कुदोपाली’ को विशेष रूप से प्रमुखता दी गयी है.

ओड़िया, अंग्रेजी और हिंदी समेत अब 13 भाषाओं में पुस्तक उपलब्ध

इस अवसर पर कुदोपाली के संघर्ष पर आधारित एक विशेष वीडियो का प्रदर्शन किया गया. साथ ही ‘द सागा ऑफ कुदोपाली: द अनसंग स्टोरी ऑफ 1857’ पुस्तक का स्पेनिश सहित 10 क्षेत्रीय भाषाओं में विमोचन किया गया. श्री प्रधान और अन्य अतिथियों ने इस पुस्तक को स्पेनिश, बंगाली, पंजाबी, असमिया, मलयालम, उर्दू, मराठी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु समेत कुल 10 भाषाओं में जारी किया. यह पुस्तक पहले ही ओड़िया, अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है और अब कुल 13 भाषाओं में उपलब्ध है. विशेष रूप से स्पेनिश जैसी अंतरराष्ट्रीय भाषा में इसका विमोचन ओडिशा के इतिहास को यूरोपीय पाठकों तक पहुंचाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.

53 स्वतंत्रता सेनानी को मिली थी वीर गति, चार को दी गयी थी फांसी

केंद्रीय मंत्री श्री प्रधान ने कहा कि 30 दिसंबर, 1857 को कुदोपाली के रणक्षेत्र में 53 स्वतंत्रता सेनानी वीर गति को प्राप्त हुए थे. बाद में चार अन्य सेनानियों को फांसी दी गयी थी. इस प्रकार कुल 57 वीर स्वतंत्रता सेनानियों ने बलिदान दिया. उन्होंने कहा कि आज की यह पहल कुदोपाली के अब तक उपेक्षित इतिहास और वीर सेनानियों के बलिदान को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की दिशा में एक सशक्त प्रयास है. इस पुस्तक का विमोचन भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को वैश्विक मंच पर एक नयी पहचान प्रदान करेगा. श्री प्रधान ने यह भी कहा कि इस पहल से नयी पीढ़ी को अपनी मातृभूमि के शौर्य, बलिदान और संघर्ष के बारे में जानने का अवसर मिलेगा.

कुदोपाली के वीरों ने ब्रिटिश शासन को कर दिया था हतप्रभ

श्री प्रधान ने कहा कि संबलपुर का कुदोपाली केवल एक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक उज्ज्वल प्रतीक है. 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान ओडिशा की यह धरती ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक अपराजेय संघर्ष की साक्षी बनी थी, जो अब वैश्विक मंच पर एक नयी पहचान पाने जा रही है. 30 जुलाई 1857 को हजारीबाग जेल से मुक्त होने के बाद वीर सुरेंद्र साए संबलपुर लौट आये थे. जनसमर्थन के बल पर उन्होंने ब्रिटिश विरोधी ‘उलगुलान’ (गुरिल्ला युद्ध) की रणनीति तैयार की. संबलपुर से मात्र चार मील दूर स्थित कुदोपाली को स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना प्रमुख केंद्र बनाया था. इसकी पहाड़ी भौगोलिक स्थिति के कारण वहां से शत्रु की गतिविधियों पर नजर रखना आसान था. 17 दिसंबर, 1857 को ब्रिटिश सेना के पहले हमले को स्वतंत्रता सेनानियों ने पहाड़ियों से विशाल पत्थर लुढ़काकर विफल कर दिया. इस विजय ने ब्रिटिश शासन को पूरी तरह हतप्रभ कर दिया. इसके बाद ब्रिटिश सेना ने पीछे हटने का नाटक करते हुए एक षड्यंत्र रचा. जैसे ही सेनानी पहाड़ी से नीचे उतरे, वे अचानक हमले का शिकार हो गये. इस संघर्ष में सुरेंद्र साए के चौथे भाई छबिल साए वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गये. कुदोपाली की धरती पर कुल 57 वीर सपूतों ने बलिदान दिया. यह घटना स्वतंत्रता संग्राम को कमजोर करने के बजाय और अधिक तीव्र कर गयी, जिसका प्रतिशोध बाद में पहाड़श्रीगिड़ा के युद्ध में लिया गया.

वीर सुरेंद्र साए थे ऐतिहासिक संघर्ष के मुख्य नायक

श्री प्रधान ने कहा कि संबलपुर के इस ऐतिहासिक संघर्ष के मुख्य नायक वीर सुरेंद्र साए थे, जिनके नेतृत्व में पूरे क्षेत्र में ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनआंदोलन ने जोर पकड़ा. इस आंदोलन को सशक्त बनाने में सुरेंद्र साए के अन्य भ्राता उदंत साए तथा उनके चाचा बलराम सिंह ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. कुदोपाली की धरती को अपने रक्त से सींचने वाले 57 वीर सपूतों में कुलाबीरा जमींदार के पुत्र कृष्णचंद्र सिंह नायक, संघर्ष सेनापति श्रीकृष्ण बेहेरा और पतरापाली के गउंतिया बलभद्र दास बिर्तिया जैसे प्रमुख नाम शामिल थे. इन वीर पुत्रों के सामूहिक त्याग और बलिदान ने कुदोपाली को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक पवित्र रक्ततीर्थ के रूप में मान्यता दिलायी है.

लंबे समय तक लोकगीतों तक सीमित रहा इतिहास, अब मिलेगी नयी वैश्विक पहचान

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लंबे वर्षों तक यह इतिहास केवल स्थानीय लोकगीतों तक ही सीमित रहा. अब आइसीएचआर (भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद) और नेशनल बुक ट्रस्ट के प्रयासों से यह विस्मृत गाथा ‘द सागा ऑफ कुदोपाली’ पुस्तक के माध्यम से 13 भाषाओं में प्रकाशित होकर वैश्विक पहचान प्राप्त कर रही है. इसके साथ ही कुदोपाली में एक भव्य शहीद स्मारक के निर्माण की योजना भी बनायी गयी है, जिसे भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में देखा जा रहा है. इस नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेला में कतर के संस्कृति मंत्री एआर बिन हमद बिन जासिम बिन हमद अल थानी, भारत में कतर के राजदूत एचजे अल जाबिर तथा स्पेन के संस्कृति मंत्रालय की डायरेक्टर जनरल ऑफ बुक्स मारिया जोसे गालवेज सहित कई विशिष्ट अतिथियों ने उपस्थित रहकर भारत की इस वीरतापूर्ण संघर्ष गाथा को सम्मान दिया.

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BIPIN KUMAR YADAV

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