सिंहभूम गज आरक्ष में 17 वर्षों में हाथियों ने 127 व भालुओं ने 11 लोगों की जान ली

Updated at : 02 Dec 2017 6:09 AM (IST)
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सिंहभूम गज आरक्ष में 17 वर्षों में हाथियों ने 127 व भालुओं ने 11 लोगों की जान ली

अनोखी वन्य जीव विविधता से भरा है पश्चिम सिंहभूम जिला वन क्षेत्र के जल स्रोतों को खेती के लिए किया अतिक्रमित चाईबासा : सिंहभूम गज आरक्ष अंतर्गत पश्चिमी सिंहभूम जिले में अनोखी जैव विविधता पायी जाती है. यह भारत का प्रथम गज आरक्ष है, जिसे 2001 में बनाया गया है. यह जिले के लगभग 40 […]

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अनोखी वन्य जीव विविधता से भरा है पश्चिम सिंहभूम जिला

वन क्षेत्र के जल स्रोतों को खेती के लिए किया अतिक्रमित
चाईबासा : सिंहभूम गज आरक्ष अंतर्गत पश्चिमी सिंहभूम जिले में अनोखी जैव विविधता पायी जाती है. यह भारत का प्रथम गज आरक्ष है, जिसे 2001 में बनाया गया है. यह जिले के लगभग 40 प्रतिशत भाग में वन क्षेत्र बिखरा हुआ है. जंगली हाथी व भालू इस जिले के सबसे मुख्य वन्य जीव हैं. मानव व्यवधान के कारण जंगली हाथी व भालू के वास स्थान नष्ट हो रहे हैं. विगत 17 वर्षो में जिले में हाथी ने127 व्यक्तियों की जान ली है. वहीं भालुओं ने 11 व्यक्तियों की जान ली है. अब तक हाथियों ने 59 व भालुओं ने 117 व्यक्तियों को घायल किया है. इसका कारण कुछ दशकों में यहां के वन क्षेत्रों में मानव व्यवधान का बढ़ना माना जा रहा है. वन क्षेत्र के जल स्रोतों को खेती के लिए अतिक्रमित किया गया है. इस कारण वन्य प्राणियों के प्राकृतिक वास स्थानों का ह्रास हुआ है.
प्राकृतिक वास स्थान, भोजन व जल स्रोतों समाप्त होने से वन्य प्राणी भोजन व जल की तलाश में वन क्षेत्रों के बाहर आ रहे हैं. वनों से बाहर आकर ये वन्य प्राणी मानवों के आवासीय क्षेत्र में व्यवधान उत्पन्न करते हैं. इससे मानव वन्य प्राणी द्वंद की समस्या उत्पन्न होती है. ग्राम व खेतों में आकर वन्यजीव जान-माल को क्षति पहुंचा रहे हैं. वन्य प्राणियों के प्राकृतिक वास स्थान के नष्ट होने से कई दुर्लभ प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है.
जंगली जानवरों द्वारा जान-माल की क्षति होने पर वन विभाग प्रभावित व आश्रितों को मुआवजा देता है. सरकार ने 18.9.2017 से मुआवजा दर बढ़ाया है. मृत्यु होने पर चार लाख रुपये, गंभीर घायल होने पर अधिकतम एक लाख रुपये व साधारण घायल होने पर अधिकतम 15 हजार रुपये के मुआवजा का प्रावधान है. इसके अतिरिक्त घर, अनाज व फसल की क्षति होने पर भी मुआवजा मिलता है.
वन विभाग का मानना है कि प्राकृतिक वास स्थानों में भोजन एवं पानी की उपलब्धता होने पर वन्य प्राणियों को वन क्षेत्र के भीतर ही रोकने में सहायता मिलेगी. इससे मानव-वन्य प्राणी द्वन्द को कम किया जा सकेगा.
वनों से प्राप्त हो सकता है पौष्टिक भोजन का विकल्प
वनों से विभिन्न प्रकार के फल-फूल, साग-सब्जी, मशरूम, कंद आदि प्राप्त होते हैं, जो पौष्टिक होने के साथ सर्वसुलभ भी हैं. सदियों से यहां के ग्रामीण इन्हे परंपरागत रूप से प्रयोग करते आ रहे हैं. इनका संवर्धन करने से ये पौष्टिक आहार का महत्वपूर्ण विकल्प सिद्ध हो सकते हैं.
तितलियों की 71 व पक्षियों की 60 प्रजातियां
यहां के वन क्षेत्र वन्य जीवों से परिपूर्ण हैं. यहां जंगली हाथी, जंगली भालू, बार्किंग डियर (कोटरा), सियार, जंगली बिल्ली, माउस डियर, इन्डियन जायंट गिलहरी, इन्डियन जायंट फ्लाइंग गिलहरी सहित 28 से अधिक प्रजातियों के स्तनधारी प्राणी पाये जाते हैं. यहां 60 से अधिक प्रकार के पक्षी, लगभग 7 प्रकार के सापों की प्रजातियां, उभयचर प्राणियों की 08 प्रजातियां तथा तितलियों की 71 से अधिक प्रजातियां भी पायी जाती हैं. इसके अतिरिक्त हजारों प्रजाति के पेड़-पौधे भी पाये जाते हैं. इनमें से वन्य प्राणियों की कई प्रजातियां दुलर्भ भी हैं. जो मात्र कुछ स्थानों में ही मिलती हैं.
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