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3 वर्ष की फसल बीमा का भुगतान कर सूबे को सूखाग्रस्त घोषित करे सरकार: चंपई

Updated at : 14 Aug 2019 5:48 AM (IST)
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3 वर्ष की फसल बीमा का भुगतान कर सूबे को सूखाग्रस्त घोषित करे सरकार: चंपई

सरायकेला :राज्य सरकार किसानों को पिछले तीन साल की फसल बीमा राशि का भुगतान करते हुए सूबे को अकाल क्षेत्र घोषित करें ताकि सुखाड़ का सामना कर रहे यहां के किसानों को राहत मिल सके. उक्त बातें पूर्व मंत्री सह सरायकेला विधायक चंपई सोरेन ने सरायकेला परिसदन में पत्रकारों से बात करते हुए कही. विधायक […]

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सरायकेला :राज्य सरकार किसानों को पिछले तीन साल की फसल बीमा राशि का भुगतान करते हुए सूबे को अकाल क्षेत्र घोषित करें ताकि सुखाड़ का सामना कर रहे यहां के किसानों को राहत मिल सके. उक्त बातें पूर्व मंत्री सह सरायकेला विधायक चंपई सोरेन ने सरायकेला परिसदन में पत्रकारों से बात करते हुए कही.

विधायक ने कहा कि आशीर्वाद योजना के नाम पर राज्य सरकार किसानों को ठगने का काम कर रही है. योजनाओं का फायदा उठाकर सरकार इस विस चुनाव में वोट हासिल करना चाह रही है, जबकि असल में भाजपा सरकार किसानों की विरोधी है. विगत चार वर्ष में सिंचाई की एक भी योजना क्रियान्वित नहीं की गयी है.
पानी के अभाव में किसानों के खेत सूख गये हैं. धान की फसल मवेशी चर रहे हैं. विधायक सोरेन ने कहा कि राज्य सरकार पहले किसानों को विगत तीन वर्ष की फसल बीमा राशि का भुगतान करे, इसके बाद राज्य को अकाल क्षेत्र घोषित करते हुए राहत कार्य चलाये. भाजपा की सरकार आगामी चुनाव को देखते हुए किसानों को दो दो हजार देकर ठगने का काम कर रही है, परंतु किसान जागरूक है और आगामी विस चुनाव में भाजपा सरकार को उखाड़ फेकेंगे.
15 अगस्त के बाद हल-बैल के साथ जिला मुख्यालय का होगा घेराव
विधायक ने कहा कि जिला को अकाल क्षेत्र घोषित करने की मांग को लेकर 15 अगस्त के बाद हजारों की संख्या में किसान हल-बैल के साथ जिला मुख्यालय का घेराव करेंगे. इसके बाद भी सरकार अकाल क्षेत्र घोषित नहीं करती है तो रांची में हल-बैल के साथ घेराव किया जायेगा. विधायक ने कहा कि जिला मुख्यालय घेराव कार्यक्रम को लेकर तैयारी शुरू कर दी गयी है.
स्वतंत्रता दिवस के बाद सरकार को 10 दिनों की मोहलत दी गयी है. अगर अकाल क्षेत्र घोषित नही किया गया तो घेराव किया जाएगा. विधायक ने राज्य सरकार पर किसानों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि पहले किसानों को प्रोत्साहन राशि मिलती थी, वैकल्पिक खेती का व्यवस्था होती थी अब वह भी नहीं किया जा रहा है.
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