हेरा पंचमी पर जीवंत हुई मान-मनौवल की परंपरा, हरिभंजा में देर रात तक उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

Author Sachindra Dash|Edited by Sweta Vaidya
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हरिभंजा में मां लक्ष्मी की प्रतिमा को पालकी में लेकर जाते श्रद्धालु | Prabhat Khabar Network

हरिभंजा में मां लक्ष्मी की प्रतिमा को पालकी में लेकर जाते श्रद्धालु | Prabhat Khabar Network

खरसावां के हरिभंजा में हेरा पंचमी के अवसर पर रथ भंगिनी की रस्म श्रद्धा के साथ निभाई गई. महालक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ के प्रेम का यह अद्भुत दृश्य देखने उमड़ी भीड़.

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खरसावां. रथयात्रा महोत्सव के पांचवें दिन सोमवार की रात हरिभंजा में हेरा पंचमी के अवसर पर सदियों पुरानी रथ भंगिनी की परंपरा श्रद्धा, आस्था और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ निभाई गई. ओड़िशा के श्रीजगन्नाथ धाम पुरी की तर्ज पर आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान में देवी महालक्ष्मी के मान और भगवान जगन्नाथ के प्रति उनके प्रेम का भावपूर्ण प्रसंग सजीव हो उठा. परंपरा के अनुसार नाराज महालक्ष्मी ने प्रतीकात्मक रूप से भगवान जगन्नाथ के नंदिघोष रथ के पहिये की लकड़ी तोड़कर अपना मान प्रकट किया. इस अद्भुत धार्मिक आयोजन को देखने के लिए देर रात तक श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही.

रथ भंगिनी की रस्म ने दोहराया पौराणिक प्रसंग

हेरा पंचमी के अवसर पर श्री मंदिर परिसर स्थित लक्ष्मी मंदिर से मां महालक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा को आकर्षक पालकी (विमान) में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा के साथ गुंडिचा मंदिर लाया गया. वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठान के बाद देवी को भगवान जगन्नाथ के नंदिघोष रथ तक ले जाया गया. यहां विधि-विधान से पूजा संपन्न होने के बाद मां महालक्ष्मी की प्रतिमा को रथ पर स्थापित किया गया और रथ के पहिये की लकड़ी को प्रतीकात्मक रूप से तोड़ा गया. इसी धार्मिक परंपरा को रथ भंगिनी कहा जाता है. यह रस्म उस पौराणिक कथा का स्मरण कराती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ के समय पर श्रीमंदिर नहीं लौटने से नाराज देवी महालक्ष्मी उनके रथ को क्षति पहुंचाकर अपना मान प्रकट करती हैं. इस दौरान पूरा मंदिर परिसर 'जय जगन्नाथ' के जयघोष से गूंजता रहा.

अब बाहुड़ा यात्रा की तैयारियां तेज

धार्मिक मान्यता के अनुसार हेरा पंचमी के बाद भगवान जगन्नाथ की श्रीमंदिर वापसी की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. रथ भंगिनी के तीसरे दिन रथ को श्रीमंदिर की दिशा में मोड़ा जाता है, जिसे दक्षिणामुख संस्कार कहा जाता है. इसके बाद 24 जुलाई को बाहुड़ा रथयात्रा निकाली जाएगी, जिसकी तैयारियां मंदिर समिति और सेवायतों ने तेज कर दी हैं.

क्या है हेरा पंचमी की धार्मिक मान्यता?

हरिभंजा जगन्नाथ मंदिर के मुख्य सेवक विद्या विनोद सिंहदेव ने बताया कि हेरा पंचमी भगवान जगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी के दांपत्य प्रेम, मान-मनौवल और पारिवारिक भावनाओं का प्रतीक पर्व है. मान्यता है कि रथयात्रा के पांच दिन बाद भी भगवान के वापस नहीं लौटने पर देवी महालक्ष्मी क्रोधित होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं. भगवान से संवाद के बाद वे प्रतीकात्मक रूप से रथ को क्षतिग्रस्त कर अपना मान व्यक्त करती हैं और फिर अपने मंदिर लौट जाती हैं. यह परंपरा ओड़िया संस्कृति और श्रीजगन्नाथ परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे हरिभंजा में आज भी सदियों पुरानी परंपरा के अनुरूप श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाया जाता है.


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Sachindra Dash

लेखक के बारे में

By Sachindra Dash

शचिंद्र कुमार दाश प्रभात खबर के वरीय संवाददाता हैं और हिंदी पत्रकारिता में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वे झारखंड और ओडिशा की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, कानून-व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके साथ ही कला, भाषा, संस्कृति, आध्यात्म और समसामयिक विषयों पर लेखन में उनकी विशेष रुचि है। नई जानकारियां जुटाना और उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के साथ पाठकों तक पहुंचाना उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, खेल, पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति से जुड़े विषयों को समेटती है। शचिंद्र कुमार दाश ग्राउंड रिपोर्टिंग पर विशेष जोर देते हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचकर तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करते हैं।

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