नयी पुनर्वास नीति का ट्रेड यूनियन और विस्थापित करेंगे विरोध, कहा-नौकरी नहीं तो जमीन भी नहीं देंगे

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नयी पुनर्वास नीति का ट्रेड यूनियन और विस्थापित करेंगे विरोध, कहा-नौकरी नहीं तो जमीन भी नहीं देंगे

बड़ा सवाल यह है कि अगर यह नीति इतनी ही अच्छी है तो इससे वर्तमान में और भविष्य में प्रभावित होने वाले लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं. दूसरा सवाल यह भी है कि जब सरकार के पास पहले से पुनर्वास नीति थी तो अचानक से नयी नीति की जरूरत क्यों आ पड़ी?

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कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने 17 जनवरी को एनएलसी इंडिया लिमिटेड की नयी पुनर्वास और पुन:स्थापना (आरएंडआर) नीति का शुभारंभ किया. इस मौके पर उन्होंने कहा कि खदान के लिए जमीन देने वाले प्रभावित ग्रामीणों को निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के आधार पर मुआवजा दिया जायेगा. उन्होंने यह बात भी कही कि आरएंडआर पाॅलिसी में विस्थापितों के लिए अधिक सुविधाएं हैं.

नयी नीति की जरूरत क्यों

लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि अगर यह नीति इतनी ही अच्छी है तो इससे वर्तमान में और भविष्य में प्रभावित होने वाले लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं. दूसरा सवाल यह भी है कि जब सरकार के पास पहले से पुनर्वास नीति थी तो अचानक से नयी नीति की जरूरत क्यों आ पड़ी? इन तमाम सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि नयी पुनर्वास नीति में क्या खास है. तो अभी तक जो बात उभकर सामने आयी है उसके अनुसार आरएंडआर पाॅलिसी की खास बातें इस प्रकार है-


आरएंडआर पाॅलिसी की खास बातें

  • जमीन के बदले अब ग्रामीणों को नौकरी नहीं मिलेगी

  • मुआवजे के रूप में शहरी क्षेत्र के लोगों को जमीन देने पर प्रति एकड़ 75 लाख रुपये मिलेंगे

  • ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को प्रति एकड़ 40 लाख रुपये

  • जमीन देने वालों को रोजगार ना देकर 20 साल तक के लिए 7000-10,000 रुपये मासिक सहायता मिलेगी

तमिलनाडु के एनएलसी इंडिया लिमिटेड में लागू होगी पाॅलिसी

कोयला क्षेत्र से जुड़े लोगों को कहना है कि अभी यह पुनर्वास नीति तमिलनाडु के एनएलसी इंडिया लिमिटेड के लिए लायी गयी है, लेकिन कुछ समय बाद यह नीति पूरे कोल इंडिया पर लागू हो सकती है. एनएलसी इंडिया लिमिटेड लिग्नाइट कोयले का खनन करने वाली नवरत्न कंपनी है. यह लिग्नाइट कोयले की सबसे बड़ी खदान है.

आरएंडआर पाॅलिसी से विस्थापितों को सिर्फ नुकसान

आरएंडआर पाॅलिसी पर बात करते हुए लखन लाल महतो, महामंत्री, युनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन (एटक) ने कहा कि यह एक ऐसी नीति है जिससे विस्थापितों को सिर्फ और सिर्फ नुकसान ही होगा. विस्थापित जमीन देकर अपने जीविकोपार्जन का साधन सरकार को सौंप देते हैं और उसके बदले अगर उन्हें नौकरी ना मिले और मुआवजा भी ढंग से ना मिले तो कोई विस्थापित अपनी जमीन नहीं देगा.

ग्रामीण क्षेत्र के निर्धारित मुआवजा बहुत कम

शहरी क्षेत्र के लिए 75 लाख का मुआवजा और ग्रामीण क्षेत्र के लिए 40 लाख का मुआवजा बिलकुल तर्कसंगत नहीं है और हम इसका विरोध करते हैं और हमने इसका विरोध शुरू कर दिया है क्योंकि आज नहीं तो कल यह नीति पूरे कोल इंडिया पर लागू हो जायेगी. विस्थापित अगर जमीन नहीं देंगे तो कोल इंडिया पर भी इसका असर पड़ेगा. 2022-23 में कोल इंडिया को एक हजार मिलियन टन कोयला का उत्पादन करना था, लेकिन वह जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण ऐसा नहीं कर पायी और अब 2024-25 के लिए यह लक्ष्य निर्धारित किया है.

औद्योगिक वातावरण अशांत होगा

वहीं विस्थापितों के नेता काशीनाथ केवट ने कहा कि आरएंडआर पाॅलिसी की वजह से देश में औद्योगिक वातावरण अशांत हो जायेगा. इस पाॅलिसी का झारखंड सहित पूरे देश में विरोध होगा, जिसका असर औद्योगिक वातावरण पर पड़ना तय है.

आरएंडआर पाॅलिसी को अभी लाना गैरजरूरी कदम

काशीनाथ केवट का कहना है कि आरएंडआर पाॅलिसी को अभी लाना सरकार का बहुत ही गैरजरूरी कदम है, साथ ही यह गैरकानूनी भी है. हम विस्थापित इसका विरोध करते हैं. अगर विस्थापितों को जमीन के बदले नियोजन नहीं मिलेगा तो वे जमीन क्यों देंगे? हम नियोजन नहीं तो जमीन नहीं की नीति पर काम करेंगे.

नौकरी नहीं तो जमीन नहीं

अभी कोल इंडिया दो एकड़ जमीन पर नौकरी देती है, लेकिन अगर नौकरी नहीं होगी तो कोई व्यक्ति और परिवार अपने जीविकोपार्जन का साधन सरकार को क्यों सौंपेगा. सरकार ने शहरी क्षेत्रों के लिए 75 लाख रुपये प्रति एकड़ मुआवजे की बात की है और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 40 लाख. इतने पैसे में जमीन नहीं दी जा सकती है.

बाजार मूल्य से चार गुना मिलता है मुआवजा

सरकार अभी जिस नियम के तहत जमीन का दर तय करती है अगर उसे ही सही माने तो ग्रामीण इलाकों में भी तीन-चार लाख रुपये प्रति डिसमिल से कम पर जमीन नहीं मिलती है. चूंकि बाजार मूल्य से चार गुना मुआवजा देना होता है, तो उस लिहाज से एक एक��़ जमीन की कीमत 12 करोड़ हो जाती है और सरकार बात कर रही है, 75 लाख और 40 लाख की. इतने में विस्थापित अपनी जमीन कतई नहीं देंगे.

कोलयरी का विस्तार ठप हो जायेगा

अगर ग्रामीण जमीन नहीं देंगे तो कोलयरी का विस्तार नहीं होगा और कोयले के उत्पादन पर इसका प्रभाव पड़ेगा. कोल इंडिया अभी ही जमीन की कमी से जूझ रही है, क्योंकि विस्थापितों के साथ जिस तरह का अन्याय हुआ है वे अपनी जमीन अब कोल इंडिया को देना नहीं चाहते हैं. जमीन देने वालों को सात से 10 हजार मासिक देने की बात भी आरएंडआर पाॅलिसी में सामने आयी है. लेकिन क्या आज के समय में कोई व्यक्ति अपने परिवार का पालन-पोषण इतने में कर सकता है? यह राशि मिनिमम वेज से भी कम है. इसलिए हम इसका पुरजोर विरोध करते हैं.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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