हृदय से भगवान को देखें और अनुभव करें
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 16 Feb 2025 11:05 PM
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Birsa Munda
पूज्य इंद्रेश जी ने सूरदास जी की भक्ति, गोवर्धन की महिमा का किया बखान
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श्रीमदभागवत कथा : पूज्य इंद्रेश जी ने सूरदास जी की भक्ति, गोवर्धन की महिमा का किया बखान
रांची़
टाटीसिलवे के इइएफ मैदान में चल रही श्रीमदभागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन पूज्य इंद्रेश जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की लीला, गिरिराज गोवर्धन महिमा, गो सेवा, मनुष्य ईर्ष्या, पर्यावरण संरक्षण पर विशेष प्रकाश डाला़ भक्तों ने भजन-कीर्तन के माध्यम से ठाकुर जी की महिमा का रसास्वादन किया़ श्री इंद्रेश जी ने कहा कि जिस तरह सूरदास, ठाकुर जी के दर्शन हृदय से करते थे, हमें भी बाहरी दुनिया से हटकर, हृदय से भगवान को देखना और अनुभव करना चाहिए. पूज्य महाराज जी ने बताया कि महाकवि सूरदास जी जन्म से ही नेत्रहीन थे, लेकिन श्री वल्लभाचार्य की कृपा से उन्हें अलौकिक दृष्टि प्राप्त हुई. वे ठाकुर जी की लीलाओं का इतना सजीव वर्णन करते थे कि देखने वाले भी चकित रह जाते. कथा में सूरदास जी का यह प्रसिद्ध पद भी सुनाया. ”आज हरि देखे नंगम नागा, मोतन माले गले और साजा”… अर्थात महाराज जी ने बताया कि सूरदास जी के भजन केवल संगीत नहीं थे, बल्कि भक्तिभाव से ओत-प्रोत आत्मदर्शन थे. वे अपने हृदय में श्रीकृष्ण को साक्षात देखते और ऐसा भावमय वर्णन करते, जैसा कोई नेत्रवाले भी नहीं कर सकते. महाराज जी ने गोवर्धन पर्वत के पूजन और गो सेवा की महत्ता बतायी. कहा कि श्रीकृष्ण केवल पूजा से प्रसन्न नहीं होते, बल्कि जब हम प्रकृति, गो माता और जीव-जंतुओं की रक्षा करते हैं, तभी वे सच्चे अर्थों में कृपा करते हैं. उन्होंने भक्तों को गो-सेवा और वृक्षारोपण का संकल्प दिलाया. कहा कि प्रकृति की रक्षा करना भी ईश्वर की पूजा के समान है. उन्होंने श्रद्धालुओं को कम से कम एक पेड़ लगाने और गो सेवा को अपनाने का संकल्प दिलाया.जीवन में ईर्ष्या का त्याग जरूरी
महाराज इंद्रेश जी महाराज ने भक्तों से जीवन में ईर्ष्या का त्याग करने को कहा. उन्होंने ईर्ष्या की चिकित्सा सबसे पहले करने की बात कही. जब ईर्ष्या घटेगी, तो जीवन के सभी दुख भी स्वतः कम हो जायेंगे. महाराज जी ने समझाया कि यदि किसी के धन, सौंदर्य या प्रतिष्ठा को देखकर मन में ईर्ष्या उत्पन्न होती है, तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति ठाकुर जी से दूर हो रहे हैं. इसलिए मन को शुद्ध रखने के लिए ईर्ष्या का परित्याग करना आवश्यक है. उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्ममंथन करने की सलाह दी. महाराज जी ने कहा कि जब ईर्ष्या पूरी तरह समाप्त हो जायेगी, तभी यह समझना कि कथा सुनना सफल रहा है. उन्होंने हमेशा एक ही भाव मन में रखने की बात कही कि तेरा मंगल, मेरा मंगल, सबका मंगल होय रे… जब सभी के मंगल की कामना की जायेगी, तो ठाकुर जी का आशीर्वाद भी अवश्य प्राप्त होगा.शिविर में 12 लोगों ने किया रक्तदान :
श्रीमदभागवत कथा के दौरान थैलेसिमिया पीड़ित मरीजों की मदद के लिए रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया है. कथा के दूसरे दिन 12 लोगों ने रक्तदान किया. शिविर 22 फरवरी तक प्रतिदिन कथा स्थल पर लगाया जायेगा. शिविर का समय दोपहर तीन बजे से शाम सात बजे तक चलेगा.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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